क्रांति १८५७
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यह वेबसाईट इस महान राष्ट्र को सादर समर्पित।

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झांसी की रानी का ध्वज

स्वाधीन भारत की प्रथम क्रांति की 150वीं वर्षगांठ पर शहीदों को नमन
वर्तमान भारत का ध्वज
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क्रांति १८५७
 

प्रस्तावना

  रुपरेखा
  1857 से पहले का इतिहास
  मुख्य कारण
  शुरुआत
  क्रान्ति का फैलाव
  कुछ महत्तवपूर्ण तथ्य
  ब्रिटिश आफ़िसर्स
  अंग्रेजो के अत्याचार
  प्रमुख तारीखें
  असफलता के कारण
  परिणाम
  कविता, नारे, दोहे
  संदर्भ

विश्लेषण व अनुसंधान

  फ़ूट डालों और राज करो
  साम,दाम, दण्ड भेद की नीति
  ब्रिटिश समर्थक भारतीय
  षडयंत्र, रणनीतिया व योजनाए
  इतिहासकारो व विद्वानों की राय में क्रांति 1857
  1857 से संबंधित साहित्य, उपन्यास नाटक इत्यादि
  अंग्रेजों के बनाए गए अनुपयोगी कानून
  अंग्रेजों द्वारा लूट कर ले जायी गयी वस्तुए

1857 के बाद

  1857-1947 के संघर्ष की गाथा
  1857-1947 तक के क्रांतिकारी
  आजादी के दिन समाचार पत्रों में स्वतंत्रता की खबरे
  1947-2007 में ब्रिटेन के साथ संबंध

वर्तमान परिपेक्ष्य

  भारत व ब्रिटेन के संबंध
  वर्तमान में ब्रिटेन के गुलाम देश
  कॉमन वेल्थ का वर्तमान में औचित्य
  2007-2057 की चुनौतियाँ
  क्रान्ति व वर्तमान भारत

वृहत्तर भारत का नक्शा

 
 
चित्र प्रर्दशनी
 
 

क्रांतिकारियों की सूची

  नाना साहब पेशवा
  तात्या टोपे
  बाबु कुंवर सिंह
  बहादुर शाह जफ़र
  मंगल पाण्डेय
  मौंलवी अहमद शाह
  अजीमुल्ला खाँ
  फ़कीरचंद जैन
  लाला हुकुमचंद जैन
  अमरचंद बांठिया
 

झवेर भाई पटेल

 

जोधा माणेक

 

बापू माणेक

 

भोजा माणेक

 

रेवा माणेक

 

रणमल माणेक

 

दीपा माणेक

 

सैयद अली

 

ठाकुर सूरजमल

 

गरबड़दास

 

मगनदास वाणिया

 

जेठा माधव

 

बापू गायकवाड़

 

निहालचंद जवेरी

 

तोरदान खान

 

उदमीराम

 

ठाकुर किशोर सिंह, रघुनाथ राव

 

तिलका माँझी

 

देवी सिंह, सरजू प्रसाद सिंह

 

नरपति सिंह

 

वीर नारायण सिंह

 

नाहर सिंह

 

सआदत खाँ

 

सुरेन्द्र साय

 

जगत सेठ राम जी दास गुड वाला

 

ठाकुर रणमतसिंह

 

रंगो बापू जी

 

भास्कर राव बाबा साहब नरगंुदकर

 

वासुदेव बलवंत फड़कें

 

मौलवी अहमदुल्ला

 

लाल जयदयाल

 

ठाकुर कुशाल सिंह

 

लाला मटोलचन्द

 

रिचर्ड विलियम्स

 

पीर अली

 

वलीदाद खाँ

 

वारिस अली

 

अमर सिंह

 

बंसुरिया बाबा

 

गौड़ राजा शंकर शाह

 

जौधारा सिंह

 

राणा बेनी माधोसिंह

 

राजस्थान के क्रांतिकारी

 

वृन्दावन तिवारी

 

महाराणा बख्तावर सिंह

 

ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव

क्रांतिकारी महिलाए

  1857 की कुछ भूली बिसरी क्रांतिकारी वीरांगनाएँ
  रानी लक्ष्मी बाई
 

बेगम ह्जरत महल

 

रानी द्रोपदी बाई

 

रानी ईश्‍वरी कुमारी

 

चौहान रानी

 

अवंतिका बाई लोधो

 

महारानी तपस्विनी

 

ऊदा देवी

 

बालिका मैना

 

वीरांगना झलकारी देवी

 

तोपख़ाने की कमांडर जूही

 

पराक्रमी मुन्दर

 

रानी हिंडोरिया

 

रानी तेजबाई

 

जैतपुर की रानी

 

नर्तकी अजीजन

 

ईश्वरी पाण्डेय

 
 
1857 के महासमर का उद्देश्य था स्वधर्म और स्वराज्य

 

रचनाकार- विनायक दामोदर सावरकर
संदर्भ - पाथेय कण (हिंंदी पत्रिका)
दिनांक 16 अप्रैल (संयुक्तांक) 2007
अंक : 1, पेज न.11

'1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' क्रांतिकारियों के लिये गीता की तरह थी। इसके अंग्रेजी के तीसरे संस्करण का प्रकाशन स्वयं शहीदे आजम भगत सिंह ने करवाया था। उनके युग के प्रत्येक क्रांतिकारी के लिये इसका अध्ययन आवश्यक था। प्रस्तुत लेख इसी अनुपम ग्रंथ के प्रथयम अध्याय की संक्षिप्त प्रस्तुति है

श्रीमान के.एल.चतुर्वेदी
सम्पादक, पाथेय कण

यदि कोई फूस की साधारण सी कुटिया भी बनाता है तो उसका भार वहन करने हेतु भी एक सदृढ़ स्तम्भ की आवश्यकता होती है। इस सामान्य सत्य के प्रत्येक अशिक्षित व्यक्ति भी भली भांति परिचित है। परन्तु इस सामान्य व्यावहारिक ज्ञान की उपेक्षा कर जब कोई लेखक प्रचण्ड क्रांति-रचना के इतिहास को लिखते समय, इस बात की उपेक्षा कर देता है कि क्रांति के इस भव्य भवन का निर्माण किस आधार पर हुआ था अथवा यह कहने का प्रयास करता है कि भारत की 1857 की क्रांति का पावन मन्दिर किसी घास के तिनके के समान तुच्छ अधिष्ठान पर अधिष्ठित था, वह या तो मूर्ख है अथवा यह भी सम्भव है कि ऐसा इतिहास लेखक ताश के पत्तों के गुलाम के समान आचरण करता है। अतः यह निश्चित तथ्य है कि इस श्रेणि के व्यक्ति इतिहास-लेखन जैसे पावन कार्य का दायित्व निभाने के सर्वथा अयोग्य है।

मूल तत्त्वों की खोज आवश्यक

ऐतिहासिक क्रांति के इतिहास लेखकों को उस क्रांति के परस्पर असंबद्ध प्रतीत होने वाले प्रश्नों अथवा उनके अद्भूत रूप से स्तंभित होकर ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए, अपितु उनके संबंध में शोध करना चाहिए और यह शोध कार्य उस क्रांति के मूल तत्त्वों की खोज कर लेने तक अबाध गति से जारी रखना चाहिए। उन्हीं तत्वों की दूरबीन को हाथ में लेकर उसके माध्यम से ही उस क्रांति के विस्तीर्ण प्रदेश का निरीक्षण करना चाहिए। इस रीति से उस क्रांति का अवलोकन करते ही असंबद्ध लगने वाले अनेक तत्व परस्पर पूर्णतः संबद्ध दिखाई देने लगते हैं, वक्र रेखाएं सरल प्रतीत होंगी और जो रेखाएँ सरल प्रतीत हो रही थीं वे वक्र लगेंगी। अन्धकार में प्रकाश प्रतिबिम्बित होगा औैर जिससे इस दृष्टि से अध्ययन के पूर्व प्रकाश का आभास होता है वह वास्तविक अंधकार स्पष्ट हो जाएगा। जिन्हें निम्न घटनाए माना जाता रहा वे ही उच्चतम घटनाओ के रूप में स्पष्टतः उभर जाएंगी और जो घटनाएं पहले महान लगती थीं वे नितान्त सामान्य सी प्रतीत होंगी। विद्वूपता में सुरूपता और सुरूपता में ही विद्वूपता दृष्टिगोचर होगी, अपेक्षित अथवा अनपेक्षित किसी भी रूप में क्यों न हो, किन्तु क्रांति का वास्तविक और स्पष्ट ऐतिहासिक रूप उभर आएगा।

किन्तु हिन्दुस्तान में 1857 ई. में हुई महान और प्रचण्ड क्रांति का इतिहास इस शास्त्रीय पद्धति से किसी भी स्वदेशी अथवा विदेशी ग्रन्थकार ने नहीं लिखा। अतः उस क्रांति के संबंध में लोगों में विलक्षण व भ्रामक दृष्टि का सृजन हुआ है। इस भ्रमोत्पादन का संपूर्ण दायित्व अंग्रेज लेखकों पर ही आता है। उनमें से कुछ ने तो घटनाओं का विवरण मात्र ही दिया हौ और इस क्रांति के संबंध में अन्य कोई जानकारी प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं किया। परन्तु अनेक लेखक ऐसे भी हैं जिन्होंने इस क्रांति का इतिहास पक्षपात और दुष्ट बुद्धि से प्रवृत्त होकर लिखा है। उनके पूर्व धारणाओं से बोझिल मन और दृष्टि ने उन्हें इस क्रांति के मूल तत्वों को या तो देखने ही नहीं दिया अथवा उन्होंने इन्हें देखकर भी अनदेखा और जानकर भी अनजाना किया है।

अंग्रेज हित साधन

क्या कोई विचारवान व्यक्ति यह कह सकता है कि सन् 1857 ई. सरीखी प्रचण्ड क्रांति उसे प्रज्जवलित करने वाले किसी सिद्धान्त के बिना ही हो गई थी? क्या पेशावर से कलकता पर्यन्त उठी प्रचण्ड लहर, बाढ़ सा विकराल रूप लेकर अपनी इस प्रचण्ड शक्ति से किसी न किसी वस्तु को डुबा देने के संकल्प के बिना ही प्रवाहित हो उठी थी? दिल्ली के प्रचण्ड घेरे, कानपुर का महान नरमेघ, साम्राज्य का ध्वजोत्तोलन एवं उस ध्वज को फहराते रखने के लिए संग्राम करते-करते अनेक शूरवीरों का आत्माहुति देना और इसी प्रकार के अनेक स्फूर्तिदायक कृत्या क्या एक अत्यन्त ही स्फूर्तिदायक साध्य के अभाव में संभव हो सकते थे? ग्रामों में हटवाड़े में लगने वाला बाजार किसी विशिष्ट उद्देश्य को दृष्टिगत रखे बिना नहीं लग पाता। तब फिर हम यह कैसे मान सकते हैं कि जिस बाजार को लगाने की तैयारी वर्षों तक चली थी और जिसकी दुकानें पेशावर से कलकत्ता तक के प्रत्येक रणक्षेत्र में सजी थी, जिन पर राजधानियों और राज्य सिंहासनों का लेन देन हो रहा था, जिन दुकानों पर चलने वाली रक्त और मांस पिण्ड ही एकमात्र वैध मुद्रा थी, वह बाजार बिना किसी उद्देश्य के ही सजा था और बंद हो गया था। नहीं नहीं यह बाजार निरूद्देश्य ही नहीं लगा था और न ही बिना किसी उद्देश्य के ही इसकी दुकानें बन्द हुई थीं। अंग्रेज लेखकों ने इस तथ्य की सदैव उपेक्षा की है, इसलिए नहीं कि इस तथ्य का निर्धारण करना कठिन था, अपितु उन्होंने इसकी उपेक्षा इसलिए की है कि इस सत्य को स्वीकार करना उनके अपने हितों के विपरीत सिद्ध होता।

चाटुकारिता

किन्तु इस दुर्लक्ष्य से भी अधिक भ्रान्तिपूर्ण एवं 57 के इस क्रांति युद्ध के स्वरूप को भी सर्वतोपरि भ्रष्ट करने वाली जो दूसरी युक्ति अथवा चूक विजातीय एवं उनके नितांत हीन चाटुकार भारतीय इतिहासकारों ने की है, वह यह है कि इसका एक मात्र कारण कतिपय लोगों द्वारा फैलाई गई कारतूसों संबंधी भ्रान्त धारणा थी। अंग्रेज इतिहास से प्रेरणा लेने वाले और अंग्रेजों से धन प्राप्त करने वाले एक भारतीय लेखक ने कहा है मूर्ख लोग इस अफवाह के कारण ही पागल हो गए थे कि कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का उपयोग किया जा रहा है। क्या किसी ने यह भी पूछा कि यह अफवाह सत्य है? एक व्यक्ति ने कहा और दूसर ने उस पर विश्वास कर लिया। दूसरा बिगड़ा तो तीसरा भी बिगड़ उठा, अंध परम्परा चालू हो गई और अविचारी तथा मूर्खों का समूह एकत्रित हो गया तथा विद्रोही की अग्नि प्रज्वलित हो उठी।

कारतूसों की बात पर लोगों ने अंधानुकरण करते हुए विश्वास किया अथवा नहीं, इस पर बाद में चर्चा करेंगे। परन्तु अंग्रेज साहित्यकारों द्वारा प्रस्तुत विवरण का गहन अध्ययन करने वाला कोई भी व्यक्ति इस निष्कर्ष पर तो अवश्य ही पहुँच जाएगा कि इस क्रांति का सम्पूर्ण दायित्व इस कारतूसों सम्बन्धी अफवाह पर डलाने का भरसक प्रयत्न किया गया है। अतः ऐसे दुष्ट बुद्धि किंवा मंद-बुद्धि लोगों ने यदि क्रांति के पुरोधाओं को विचारहीन मूर्खों का समाज कहा है तो इसमें आश्चर्य का कोई कारण नहीं है। यदि घ् 57 की क्रांति की ज्वाला का विस्फोट केवल कारतूसों के कारण ही हुआ था तो नानासाहब, दिल्ली के बादशाह, झांसी की रानी अथवा रूहेलखण्ड के खानबहादुर खाँ ने इसमें योगदान क्यों दिया था? ये तो निश्चित रूप से ही अंग्रेजी सेना में नौकरी करने को नहीं जाने वाले थे, न ही उन्हें इस बात के लिए विवश किया जा रहा था कि वे अपने दांतों से इन कारतूसों को तोड़ें। यदि कारतूसों मात्र से ही इस क्रांति का अग्निपुंज दहका होता तो अंग्रेज गर्वनर जनरल द्वारा इनकी वापसी के आदेश का प्रसारण होते ही क्रांति की इस ज्वाला पर पानी पड़ जाना चाहिए था। उसने तो उन्हें यह भी अनुमति दे दी थी कि वे स्वतः ही कारतूसों का निर्माण कर लें। किन्तु ऐसा करने के स्थान पर, वे रणभूमि में युद्ध करने के लिए कृतसंकल्प होकर उतर पड़े। केवल सिपाही ही नहीं अपितु सहस्त्रों शान्तिप्रिय नागरिक और राजा महाराजा भी उठे, जिनका सेना से प्रत्यक्ष तो क्या अप्रत्यक्ष रूप से भी कोई संबंध नहीं था। अतः यह सुस्पष्ट है कि ये प्रासंगिक कारण नहीं थे, जिनसे प्रेरित होकर सैनिक उठे, असैनिक उठे तो राजा और रंक दोनों ने ही क्रांति की दुंदुभी बजा दी, हिन्दू और मुसलमान दोनों ही क्रांति यज्ञ में समिधा समर्पित करने हेतु सन्नबद्ध हो गए।

अवध भी कारण नहीं

क्रांति के यज्ञ के प्रज्जवलित होने के सम्बन्ध में जितनी भ्रान्त धारणा यह है कि इसका कारण कारतूसों में चर्बी होने की अफवाह का प्रसारण था उतना अयथार्थ यह करना भी है कि इसका कारण अवध के राज्य को अंग्रेजों द्वारा हड़प होने लेना था। इस क्रांति के समरांगण में तो अनेकों ही ऐसे लोग भी सिर हथेली पर रखकर अवतरित हुए थे जिनको इस संबंध में कोई रूचि नहीं थी कि अवध के राज्य सिंहासन पर कौन आसीन होता है? तब इस युद्ध के मूल में कौन से कारण थे? अवध के नवाब तो स्वयं कलकत्ता के दुर्ग में बन्दी थे और अंग्रेज इतिहासकारों का यह भी कथन है कि उनकी प्रजा उनके कुशासन से नितांत दुखी थी। तब फिर ऐसा क्यों हुआ कि तालुकेदार और सिपाही नहीं अपितु उसकी प्रायः सम्पूर्ण प्रजा ही उसके लिए तलवार म्यान से खींचकर रण-भूमि में उतर पड़ी।

चर्बी वाले कारतूस और अवध के सिंहासन का हड़प लिया जाना तो केवल अस्थायी और निमित्त कारण मात्र थे। इन कारणों को ही वास्तविक कारण जता देने से तो हमें इस महान क्रांति की वास्तविक भावना को समझने में सहायता प्राप्त नहीं हो सकती। यदि हम इन निमित्त कारणों को ही वास्तविक कारण मान लेंगे तो इसका यही तात्पर्य होगा कि इन कारमों के अभाव में क्रांति की ज्वाला धधक ही नहीं सकती थी। इसका तो यह अर्थ होगा कि कारतूसों संबंधी धारणा के प्रसारण और अवध की सत्ता के अधिग्रहण के अभाव में क्रांति का यह यज्ञ प्रज्जवलित ही नहीं हो सकता था। इससे अधिक मूर्खतापूर्ण तथा भ्रान्त अन्य कोई सिद्धान्त निरूपित नहीं नहीं किया जा सकता। इसका कारण यह है कि यदि चर्बी वाले कारतूसों संबंधी धारणा प्रसारित न होती, तब भी क्रांति का यह तत्त्व किसी अन्य माध्यम से से अभिव्यक्त होता और उसमें भी इसी प्रकार की क्रांति की ज्वाला धधक उठती। यदि अवध का राज्य न भी हड़पा जाता तो इस हड़पने के सिद्धान्त का प्रकटीकरण किसी अन्य राज्य की समाप्ति के रूप में प्रकट हुआ होता। जिस भांति फ्रांस की राज्य क्रांति के वास्तविक कारण मूल्यवृद्धि, बैस्टाइल अथवा सम्राट का पेरिस त्याग और शानदार भोज ही नहीं थे। उनसे क्रांति की कतिपय घटनाओं पर तो प्रकाश पड़ता है किन्तु सम्पूर्ण क्रांति का दिग्दर्शन नहीं हो पाता।

दिव्य तत्व

राम-रावण संघर्ष में सीताहरण भी तो निमित्त मात्र ही था। इस संग्राम के वास्तविक कारण तो बडे ही गहन थे। तब, फिर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि इस क्रांति के वास्तविक कारण और तत्व कौन से थे? वे तत्व और सिद्धान्त क्या थे जिनसे प्रेरित होकर सहस्त्रों नरवीरों ने अपनी तलवारें म्यान से बाहर खींचकर स्वतन्त्रता लक्ष्मी का जय जयकार किया था और जिनसे प्रभावित होकर उन्होंने रणभूमि में रक्तस्नान किया था? निस्तेज हुए राजमुकुटों को सतेज बनाने वाले और मूलुण्ठि पड़े हुए ध्वजों का पुनः उत्तोलन करने वाले ये तत्व कौन से थे जिनसे प्रेरणा ग्रहण कर वर्षानुर्ष सहस्त्रों व्यक्तियों ने अपने उष्ण रक्त से अभिषेक करते रहने की अखण्ड परम्परा का पुनीत प्रारम्भ किया था। जिसके लिए मौलवियों ने फतवे दिये थे तो विद्वानों ब्राह्मणों ने शुभाशीर्वाद और जिनकी सफलता के लिए दिल्ली की मस्जिदों व काशी के मन्दिरों में ऊँचे स्वरों से परम पिता परमात्मा से प्रार्थना की गई थी, जिनकी प्राप्ति के लिए श्रीमत् हनुमान ने कानपुर के रणांगण में हुंकार भरी थी तो झांसी की महारानी ने शुंभ-निशुंभ के रक्त से सनी अपनी पुरानी प्रसिद्ध तलवार को पुनः म्यान से बाहर निकला लिया था?

वस्तुतः 1857 के इस स्वातन्त्र्य संग्राम को प्रदीप्त करने वाली दिव्य तत्त्व थे स्वधर्म व स्वराज्य। अपने प्राणप्रिय धर्म पर भयंकर, विधातक व नितान्त कपट-पूर्ण आक्रमण हो रहे हैं, इस तथ्य को समझकर ही स्वधर्म रक्षण हेतु 'दीन-दीन' की गर्जना आरम्भ हुई थी। अपने निसर्ग प्रदत्त स्वातन्त्र्य को कपटपूर्ण ढंगों से छीने जाने के प्रयासों और राजकीय दासता की लोह श्रृंखलाओं को प्रिय मातृभूमि के कंठ में डाले जाने के विधातक प्रयत्नों को असफल कर स्वराज्य प्राप्ति की पावन इच्छा की पूर्ति हेतु इस दास्य श्रृंखला पर किये गये प्रचण्ड प्रहार ही इस क्रांति का मूल थे। स्वधर्म-प्रीति और स्वराज्य-प्रीति के ये तत्व हिन्दुस्तान के इतिहास में जितनी उदात्तता सहित अभिव्यक्त हुए हैं, उतने अधिक तो किसी देश के इतिहास में परिलक्षित नहीं होते।

पुरजा-पुरजा कट मरे

स्वराज्य के लिए हिन्दुस्तान ने कौन से प्रयास नहीं किए, स्वधर्म की रक्षार्थ इस भारत भूमि ने कौन सा ऐसा दिव्य व्रत है, जिसे अंगीकार नहीं किया? सूरा सोहि जानिए जो लड़े धर्म के हेतु। पुरजा पुरजा कट मरे तवहु न छोड़े खेत (गुरू गोविन्द सिंह), इसी रीति का परिपालन करते हुए स्वधर्म हेतु रणांगण में शरीर के टुकड़-टुकड़े हो गये, फिर भी रणस्थल से पग पीछे न धरा, ऐसे प्रसंगों से तो भारत भूमि का पावन इतिहास परिपूर्ण है।

इन परम्परागत और दिव्य तत्वों के संचार के जितने स्वर्णासर 1857 ई. में उपलब्ध हुए थे, उससे पूर्व उतने कभी नहीं हो पाए थे। इन विशिष्ट कारणों ने नितान्त ही आश्चर्यनजक रूप से किंचित मात्र प्रस्फुटित हुई मनोवृत्ति को विलक्षण चेतना प्रदान की। जनता स्वधर्म व स्वराज्य के लिए सशस्त्र और सुसज्जित हो उठी। दिल्ली के सम्राट ने जो घोषणापत्र प्रस्तुत किया था उसमें उन्होंने कहा था-हे हिन्द भूमि के सपूतों, यदि हम संकल्प कर लेंगे तो शत्रु को क्षण भर में नष्ट कर सकते हैं। हम शत्रुओं का नाश कर अपने प्राणप्रिय धर्म एवं स्वदेश को पूर्ण रूपेण भय मुक्त कर लेने में सफलता प्राप्त कर लेंगे।

ऐसे क्रांतिकारी समर से अधिक पावन विश्व में और कौन सा युद्ध हो सकता है जो इस वाक्य में प्रतिपादित सिद्धान्तों को लेकर लड़ा गया था कि अपने स्वराज्य और स्वदेश को, जो हमें प्राणों से भी अधिक प्रिय है, भय मुक्त करो? 1857 की क्रांति का बीज इसी महान और प्रेरक विचार में सन्निहित है जो दिल्ली के राजसिंहासन से गुंजित हुआ था। यह सिद्धान्त था स्वधर्म और स्वदेस की रक्षा का सिद्धान्त।

क्रांतिकारियों की उपरोक्त ओजपूर्ण घोषणाओं को देखकर भी जो इस क्रांति के तत्व रत्नों को नहीं

समझ सकता, वह या तो मन्द बुद्धि है अथवा भ्रमितमति। ईश्वर प्रदत्त अधिकारों की रक्षार्थ संघर्ष करना मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य है, यही समझ कर अपने स्वधर्म और स्वराज्य के लिए भारतीय वीरों ने अपनी तलवारें म्यानों से बाहर खीचीं थी।

दोनों परस्पर पूरक

परन्तु क्या ये दोनों तत्त्व परस्पर विरूद्ध अथवा विभिन्न समझे जाते थे? स्वधर्म और स्वराज्य इन दोनों का कोई पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है, ऐसी धारणा पौर्वत्यों की तो कभी भी नहीं रही। जिस प्रकार मैजिनी का कथन था कि स्वर्ग और भूतल में कोई बहुत दूर का अन्तर नहीं है अपितु ये दोनों एक ही वस्तु के दो कोण हैं, उसी भांति पौर्वत्य मन में भी सदा उक्त परिपक्व धारम और विश्वास रहा है। इस स्वधर्म की कल्पना भी स्वराज्य से भिन्न नहीं है, ये दोनों ही साध्य और साधन के रूप में परस्पर संगल्न हैं। स्वधर्म के अभाव में स्वराज्य भी त्याज्य है और स्वराज्य के न होने पर स्वधर्म भी त्याज्य है और स्वराज्य के न होने पर स्वधर्म भी बलहीन होता है। स्वराज्य रूपी लौकिक सामर्थ्य की तलवार स्वधर्म के पारलौकिक साध्य के लिए सतत् सधी रहनी चाहिए। पौर्वात्य मन की यह धारम इतिहास में पग-पग पर प्रतिबिम्बित हुई है। पूर्वी देशों के इतिहास में सभी क्रांतियों ने धार्मिक रूप लिया है, किंबहुना धार्मिक पवित्रता व धर्मसंलग्तना के अभाव में प्रचण्ड क्रांति का उद्भव ही सम्भव नहीं है, यही साक्षी पूर्वी देशों का इतिहास प्रस्तुत कर रहा है। इनका बीज ही धर्म के विश्व-व्यापक स्वरूप में निहित है। हिन्दुस्तान के इतिहास में आज पर्यन्त अखण्ड रूप से व्यक्त हो रहा स्वराज्य व स्वधर्म का साधन और साध्य भी अभिव्यक्त हुआ था, इसमें आश्चर्य की तो कोई बात ही नहीं है।

स्वधर्म के लिए उठो और स्वराज्य की स्थापना करो, इस तत्त्व ने भारत के इतिहास में कितने दैविक चमत्कार किए हैं? श्री समर्थ स्वामी रामदास ने भी 250 वर्ष पूर्व मराठों को यही आह्वान दिया था

"धर्मासाठी मरावें। मरोनी अवध्यांसि मारावें।
मारिता मारिता ध्यावें। राज्य आपुले।।"

(अपने धर्म के लिये प्राण दो। अपने धर्म के लिये शत्रुओं का वध करो, चाहे तुम प्राण ही क्यों न छोड़ रहे हो। इस प्राकर युद्ध करो और वध करो तथा अपने राज्य की स्थापना करो।)

वस्तुतः सत्तावन के क्रांतिसमर का यही तात्विक कारण था। इस क्रांतियुद्ध के स्पष्ट मनःशास्त्र था, जिस दूरबीन से इस युद्ध के स्पष्ट तथा सत्य स्वरूप के दर्शन होते हैं, वह यही दूरबीन थी। स्वराज्य और स्वधर्म की स्थापना के जिन पावन उद्देश्यों के लिए यह क्रांतिसमर छेड़ा था उनकी पावनता को इस युद्ध में मिली पराजय भी भंग नहीं कर पाइ। गुरू गोविन्द सिंह के प्रयत्न सफल नहीं हो पाए थें किन्तु इस असफलता पर भी अनेक दिव्य जीवन और महिमा में तो कोई न्यूनता नहीं आ पाई। 1848 ई. की इटली की क्रांति साफल्यमण्डित नहीं हुई, केवल इसीलिए तो उस क्रांति के पुरोधाओं के पुण्यतत्व में कोई न्यूनता नहीं आ गई थी।

अठारह सौ सत्तावन भूमिका

भूमिका लेखक- स्वर्गीय अबुल कलाम आजाद
पुस्तक- अठारह सौ सत्तावन
लेखक- सुरेन्द्र सेन
पब्लिकेशन डिवीजन
सूचना एवं प्रसार मन्त्रालय
भारत सरकार

लगभग पाँच वर्ष हो चूके हैं, जब भारतीय ऐतिहासिक आलेख आयोग (इंडियन हिस्टॉरिकल रिकार्ड्स कमीशन) के वार्षिक अधिवेशन में मैंने उसके सदस्यों का ध्यान 1857 के महान विद्रोह का नया इतिहास लिखने की आवश्यकता की ओर आकर्षित किया था। इस विद्रोह को आम तौर पर "सिपाही-ग़दर" भी कहा जाता है। मैं यह जानता था कि इस विषय पर बहुत-से लोगों ने काफ़ी अध्ययन किया है। अगर हम केवल मान्यता प्राप्त इतिहासज्ञों की कृतियों को लें, तब भी इस विद्रोह पर लिखी हुई पुस्तकों की संख्या सैकड़ों में होगी। इतने पर भी मैंने यह अनुभव किया कि इस संघर्ष पर अभी तक निरपेक्ष भाव से कोई इतिहास नहीं लिखा गया है। प्रायः ये सभी पुस्तकें एक ही दृष्टिकोण से लिखी गई हैं, अर्थात् ब्रितानियों के दृष्टिकोण से।

इस महान संघर्ष के रूप और विस्तार के बार में बहुत समय तक भारत में और भारत से बाहर भी एक विवाद चलता रहा। इस संघर्ष के संबंध में लिखी गई प्रायः सभी पुस्तकों में यह कहा गया कि भारतीय सेना ने तत्कालीन सरकार के विरूद्ध विद्रोह किया था। उनमें यह स्वीकार किया गया है कि कुछ भारतीय रियासतें भी इस विद्रोह में शामिल हो गई थीं, लेकिन वे ऐसी रियासतें थीं, जिन्हें लार्ड डलहौज़ी ने अपने अधिकार में ले लिया था। इसलिए उनमें रोष था। ब्रिटिश सरकार ने देश के शासक के रूप में इस विद्रोह को दबा दिया और शांति स्थापित की।

इन अनेक पुस्तकों में से एक ने भी 1857 की घटनाओं को किसी दूसरे दृष्टिकोण से प्रस्तुत नहीं किया। यह उल्लेखनीय है कि ईस्ट इंडिया कंपनी का कानूनी अधिकार केवल इतना था कि वह राजस्व के मामले में बंगाल, बिहार और उड़ीसा में मुग़ल बादशाह के दीवान या एजेंट के रूप में काम करे। कंपनी ने जो क्षेत्र अपने अधिकार में लिए थे, वे उसने सेना के ज़ोर से जीते थे, लेकिन कहीं भी उसने बादशाह की सत्ता को चुनौती नहीं दी थी। जब सेना ने कंपनी का अधिकार मानने से इन्कार कर दिया तो कंपनी ने बादशाह से कहा की वह अपना अधिकार पुनः स्थापित करे। इसलिए यह विवादपूर्ण प्रश्न है कि क्या भारतीय सेना के विद्रोह को देश की शासन-सत्ता को विद्रोह मात्र माना जाए? यह भी उल्लेखनीय है कि जहाँ बहुत से लेखकों ने अपनी पुस्तकों में भारतीयों द्वारा युरोपीय पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों पर किए गए अत्याचारों का विस्तार से वर्णन किया है, वहाँ दूसरी और बहुत कम लेखक ऐसे है, जिन्होंने ब्रितानियों द्वारा भारतीयों पर किए गए वैसे ही अत्याचारों की चर्चा की हैं।

मैं समझता हूँ कि इस विद्रोह के संबंध में बीसवीं सदी के शुरू में प्रकाशित तीन जिल्दों वाला इतिहास विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह इतिहास शाही आलेख विभाग (इम्पीरियल रिकार्ड्स डिपार्टमेंट) में विद्यमान सरकारी काग़ज़-पत्रों के आधार पर लिखा गया था। वह विभाग अब भारत का राष्ट्रीय आलेख संग्रहालय (नेशनल आकॉइव्ज ऑफ इंडिया) कहलाता है। अब यह एक आम प्रथा है कि लगभग 50 साल बीत जाने पर सरकारी काग़ज़ पत्र गवेषणा करने वालों को अध्ययन के लिए दिए जाते हैं। ब्रिटेन ने नेपोलियन के साथ हुए युद्धों के बारे में आलेख या काग़ज़-पत्र गवेषकों को देने का जो निर्णय किया था, उसी ये यह प्रथा चली है। युरोप के अधिकांश देशों ने यही प्रथा अपनाई है। 1607 में भारतीय विद्रोह के पचास वर्ष पूरे हुए और इसलिए शायद तत्कालीन भात सरकार ने यह अनुभव किया कि उन सरकारी कागज-पत्रों के आधार पर एक इतिहास लिखा जाए, जो उन दिनों गवेषणा करने वालों के लिए उपलब्ध किये जाने वाले थे।

यह इतिहास यद्यपि सरकारी कागज-पत्रों के आधार पर लिखा गया है, किन्तु इसमें भी संघर्ष का वर्णन उसी भावना से किया गया है, जिससे अन्य ब्रिटिश लेखकों ने किया है। इस इतिहास में केवल एक नई बात है। लेखक ने स्पष्ट रूप से कहा कि अवध में हुइ संघर्ष में राष्ट्रीय क्रांति के बीज मौजूद थे. कँपनी ने अवध को उन्हीं दिनों एक भारतीय राजा से अपने अधिकार में ले लिया था और लोगों में इस बात का रोष था। इसलिए उन्हें उस कम्पनी का विरोध करना उचित लगा, जिसने अवध को अनुचित रूप से हथिया लिया था। अवध में विद्रोह के राष्ट्रीय रूप का उल्लेख करना कोई नयी खोज नहीं थी, इसलिए लेखक को वही बात दोहराने में कोई कठिनाई नहीं हुई, जो लार्ड कैनिंग पहले ही मान चुके थे। लेखक ने यह भी कहा है कि कुछ हद तक वजह से विद्रोह को दबाने के बाद अवध के ताल्लुकेदारों से नर्मी का व्यवहार किया गया।

जैसा में पहले कह चुका हूँ, मैंने यह अनुभव किया कि 1857 के आन्दोलन का एक नया और निरपेक्ष इतिहास लिखने का समय अब आ गया है। 1954 की शरद ऋतु में फिर मुझे इस बात का ध्यान आया और मैंने यह अनुभव किया कि इस विद्रोह की शताब्दी के अवसर पर, उथल-पुथल करने वाली तत्कालीन घटनाओं का एक नया और अधिकृत विवरण प्रस्तुत करना उचित होगा। तथाकथित गदर में सबसे पहले गोलियाँ 10 मई, 1857 को चलाईं गई थी। इस संघर्ष का विस्तृत निकालने का 10 मई, 1957 से अच्छा और कोई अवसर नहीं हो सकता।

मैं यह समझता हूँ कि जो घटनाएं लोगों की भावनाओं की पहले इतना अधिक भड़का चुकी हैं, उनका निरपेक्ष विवरण लिखना कितना कठिन काम है। व्यक्तिगत, जाती या राष्ट्रीय भावना से प्रभावित होने कारण किसी भी व्यक्ति के लिए सन्तुलन कायम रखना आसान काम नहीं है। फिर भी अगर वह सही अर्थ में इतिहासज्ञ है, तो उसे निरन्तर इस प्रकार का सन्तुलन बनाये रखने का प्रयत्न करना चाहिए। मैं यह भी मानता हूँ कि भारत को स्वतंत्रता मिलने से पहले इस विद्रोह का निरपेक्ष लिखना अधिक कठिन था। आज दो कारणों से यह कार्य अधिक सम्भव प्रतीत होता है। जिन घनाओं का हमें अध्ययन करना है, वे 100 साल पुरानी चुकी हैं। उस समय ताजी घटनाओं के बार में जो तीव्रता थी, वह अब कुछ समाप्त हो चुकी है। बीच में इतना अधिक समय निकल जाने के कारण अब हम तटस्थ भाव से उन लोगों के कार्यकलाप का अध्ययन कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त अब इन पुरानी घटनाओं से राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति भी नहीं होती। भारत और ब्रिटेन की राजनीतिक समस्या सुलझायी जा चुकी है। यह कार्य आपसी बातचीत और समझौते से हुआ है, जिससे दोनों देशों में मैत्री की नयी भावना पेदा हुई है। पहले भारत और ब्रिटेन के सम्बन्धों में कटुता थी, वह अब नहीं है। अब ऐसा वातावरण बन गया है कि 1857 के संघर्ष के दोनों पक्षों की त्रुटियों की निन्दा या प्रशंसा किये बिना निष्पक्ष और तटस्थ रूप से उस समय की घटनाओं का अध्ययनम किया जा सकता है।

यह ध्यान रखने कि बात है कि उन दिनों किसी भी भारतीय ने ऐसा कुछ नहीं लिखा, जो संघर्ष का भारतीय दृष्टिकोण से लिखा गया विवरण माना जा सके; लेकिन अगर हम इस पर विचार करें, तो हमें कोई आश्चर्य की बात दिखाई नहीं देगी। हम जानते हैं कि इस संघर्ष को बहुत शक्ति से दबाया गया था। कई साल तक देश में आतंक का वातावरण रहा। सैकड़ो को बिना मुकदमा चलाये फांसी दे दी गयी' उत्तर भारत का शायद ही कोई ऐसा इलाका बचा था, जहां फाँसी के खम्भों से झूलती हुई लाशों लोगों को सरकार की प्रतिहिंसा की याद न दिलाती हों। ऐसे समय में किसी भी भारतीय ने स्वतन्त्रय रूप से 1857 की घटनाओं के बार में कुछ कहने या लिखने कि हिम्मत नहीं की, सिर्फ कुछ ऐसे भारतीयो का लिखा हुआ विवरण मिलता है, जो सरकारी कर्मचारी थे या सरकार के समर्थक थे। लेकिन स्वतन्त्र और स्पष्ट रूप से लिखने का साहस किसी को भी न हुआ।

मिर्ज़ा मैनुद्दीन के उदाहरण से यह पता चलता है कि उन दिनों भारतीय कितने आतंकित थे। विद्रोह के दिनों में वह दिल्ली की बस्तियों में पुलिस सब-इंस्पटेकर था वह ईरान भाग गया और दो साल बाद लौटा। उसने विद्रोह के दिनों से सर थियोफिलस मेटाकाफ़ की जान बचायी थी। सर थियोफिलस के कहने पर उसने अनुभवों का एक विवरण लिखा था, लेकिन उसने मेटकाफ को अपनी पाण्डुलिपि इस शर्त पर दी थी कि वह उसके जीते जी प्रकाशित न की जाएगी। उसकी किताब में सरकार के विरूद्ध एक शब्द भी नहीं है। उसमें सिर्फ यह लिखा है कि उस काल में उसने खुद क्या किया। तब भी वह इतना अधिक आतंकित था कि उपर्युक्त शर्त पर ही वह सर थियोफिलस मेटकाफ को पाण्डुलिपि देने को राजी हुआ। मेटकाफ ने अपना वचन निभाया और मैनुद्दीन की मृत्यु का समाचार सुनने के बाद ही उसने उस पुस्तक का ब्रिटिशी अनुवाद तैयार किया। फिर भी वह पुस्तक मेटाकाफ़ के जीवनकाल में प्रकाशित न हो सकी।

प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता है कि इस विद्रोह के जिम्मेदार कौन लोग थे। कुछ लोगों का कहना है कि एक संगठित दल ने इसकी योजना बनायी और उसी के अनुसार आन्दोलन चलाया गया। मैं इस कथन को ठीक नहीं मानता। संघर्ष के दौरान और उसके तत्काल बाद के वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने विद्रोह के मूल कारणों की बड़ी सावधनी से जांच-पड़ताल की। लार्ड सैलिसबरी ने हाउस आफ़ कामन्स में कहा कि मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि इतना व्यापक और शक्तिशाली आन्दोलन सिर्फ चर्बी वाले कारतूस को लेकर ही उठा। उन्होंने यह विश्वास प्रकट किया कि विद्रोह का ऊपर से जो कारण दिखायी देता था, उसके अलावा भी कोई कारण अवश्य था। भारत सरकार और पंजाब सरकार ने इस प्रश्न के अध्ययन के लिए कई आयोग और बोर्ड नियुक्त किये। उन दिनों जो किस्से और अफवाहें प्रचलित थीं, उन सबका बड़ी सावधानी से अध्ययन किया गया। एक किस्से में कहा गया था कि चपातियों के जरिये जगह-जहग सन्देश पहुंचाये जाते थे। किसी की यह भविष्यवाणी थी कि भारत में ब्रिटिश शासन सिर्फ सौ वर्ष तक चलेगा और प्लासी की लड़ाई के सौ साल बाद, यानी जून 1857 में, उसका अन्त हो जाएगा। काफी देर तक और काफी गहराई में जाकर जांच करने पर भी इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला कि यह विद्रोह पहले से आयोजित था या सेना और भारतीय लोगों ने कम्पनी के शासन को उखाड़ फेंकने का षड्यन्त्र रचा था। चिरकाल से मेरा यही विश्वास है, और हाल भी गवेषणाओं से कोई ऐसे तथ्य प्रकाश में नहीं आये, जिनके कारण ममुझे अपने विचार बदलने पड़ें।

जब बहादुरशाह पर मुकदमा चलाया जा रहा था, तो उसमें यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया कि वह पूर्व आयोजित षड्यन्त्र में शामिल था। जो प्रमाण प्रस्तुत किया गया उससे मुकदमे पर विचार करने वाले ब्रिटिश अफ़सरों तक की तसल्ली न हो पायी। वह ऐसा था कि कोई साधरण ज्ञान वाला व्यक्ति भी उसे बेकार का प्रमाण मानेगा। वास्तव में इस मुकदमे से यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिशों की तरह ही बहादुरशाह को भी इस विद्रोह पर आश्चर्य था।

इस सदी के शुरू में कुछ भारतीयों ने इस संघर्ष के बारे में लिखा था। अगर सच कहा जाए, तो यह मानना होगा कि उनकी पुस्तकें इतिहास नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रचार मात्र हैं। ये लेखक यह सिद्ध करना चाहते थे कि यह विद्रोह ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध भारत के बड़े-बड़े लोगों द्वार आयोजित स्वातन्त्र्य संग्राम था। उन्होंने कुछ लोगों को युद्ध के आयोजक सिद्ध करने की भी कोशिश की है। यह कहा गया है कि अन्तिम पेशवा बाजीराव के उत्तराधिकारी नानासाहब विद्रोह के संचालक थे और उन्होंने सभी भारतीय सैनिक ठिकानों से सम्पर्क स्थापित किया था। इसके प्रमाण के रूप में उनका कहना है कि नाना साहब मार्च और अप्रैल, 1857 में लखनऊ और अम्बाला गये थे और मई, 1857 में संघर्ष शुरू हो गया। इसे पुष्ट प्रमाण नहीं माना जा सकता। नानासाहब विद्रोह से कुछ समय पहले लखनऊ और अम्बाला गये थे, सिर्फ इसी तथ्य से यह प्रमाणित नहीं हो सकता कि उन्होंने उसका आयोजन किया।

जब हम यह देखते हैं कि कुछ इतिहासज्ञों ने अवध के बजीर अली नक़ी ख़ां को प्रमुख षड्यन्त्रकारी कहा है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके अनुमान किनेत निराधार हैं। जिस कीसी ने भी अवध का इतिहास पढ़ा है, वह इस कथन को हास्यास्पद ही कहेगा। अली नक़ी ख़ां, ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गुर्गा था। वाजिद अली शाह को स्वेच्छा से अपना राज्य छोड़ने के लिए राजी करने के प्रयत्न में ब्रिटिशों का इसी व्यक्ति पर विश्वास था। ब्रिटिश रेज़िडेंट जनरल ऊटरम ने अली नक़ी ख़ां से कहा था कि अगर वह इस काम में सफल हो जाएगा, तो उसे बहु इनाम दिया जाएगा। अली नक़ी ख़ां ने इसके लिए इतनी ज्यादा कोशिक की कि वाजिद अली शाह की माता के मन में यह डर पैदा हो गया कि कहीं वह किसी चाल से वाजिद अली शाह को मरवा न दे। इसलिए उसने सरकारी मुहर अपने कब्जे में कर ली और उसे जनानखान में रखा और यह आदेश दे दिया कि वह मुहर उसके हुक्म के बिना बाहर न जाने पाये। लखनऊ में लोग इन सब तथ्यों को अच्छी तरह जानते हैं और अली नक़ी ख़ां को देशद्रोही मानते हैं। यह कहना कि इस संघर्ष के पीछे इस तरह के व्यक्ति का बड़ा हाथ था, बिल्कुल बेकार-सी बात मालूम पड़ती है।

यह भी कहा गया कि मुंशी अज़ीमुल्ला ख़ा और रंगो बापूजी ने विद्रोह की योजनाएँ बनायी थीं. अज़ीमुल्ला खां, नानासाहब का प्रतिनिधि था, जिसे उन्होंने यह बकालत करने के लिए लन्दन भेजा धा कि बाजीराव को मिलने वाली पेन्शन नानासाहब को मिले। भारत लौटते समय वह तुर्की गया था, जहां पर क्रिमिया की लड़ाई के मैदान में उमरपाशा से मिला। इसी तरह सतारा को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने के डलहौज़ी के निर्णय के खिलाफ अपील करने के लिए रंगो बापूजी लन्दन गया था।

इस उद्देश्यों से उनके लन्दन जाने के ही यह समझा जाता है कि वे षड्यन्त्र में शामिल थे। फिर भी यह स्पष्ट है कि इस तरह के अनुमानों को प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके अलावा अगर उन्होंने लन्दन में इन विषयों पर बातचीत की थी, तो भी उन्हें विद्रोह के आयोजक कहना तब तक उचित नहीं माना जा सकता, जब तक कि हम भारत की घटनाओं में उनके योग को सिद्ध न कर सकें। उसके इस तरह के योग का कोई प्रमाण नहीं मिलता और प्रमाण के बिना हम इन्हें विद्रोह के आयोजक नहीं मान सकते। कानपुर के पास बिठूर को जीतने के बाद, ब्रितानियोंें ने नानासाहब के सभी कागज-पत्र अपने हाथ में ले लिये। अज़ीमुल्ला ख़ां के कागज-पत्र भी ब्रिटिशों के हाथ में आ गये। इन कागजों में उमरपाशा के नाम एक पत्र भी था, जो कभी भेजा नहीं गया, लेकिन इसमें यह बताया गया था कि भारतीय सैनिकों ने ब्रितानियोंें के विरूद्ध विद्रोह कर दिया है। इस पत्र से तथा अज़ीमुल्ला ख़ां के और किसी कागज से जरा भी यह पता नहीं चलता कि उसने कभी भारतीय विद्रोह की योजना बनायी हो।

उपलब्ध प्रमाण के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि 1857 का विद्रोह सावधानी से बनाई गई किसी निश्चित योजना पर आधारित नहीं था और न उसके पीछे बड़े-बड़े चतुर आयोजक थे। हुआ यह था कि 100 वर्षों में लोग कम्पनी के शासन से विमुख हो गये थे। शुरू में कम्पनी नवाबों या बादशाह के नाम पर काम चलाती रही, इसलिए काफी समय तक तो भारतवासी यही नहीं समझ सके कि अधिकार किसी विदेशी के हाथ में चला गया है और वे अपने ही देश में गुलाम बन गये हैं। लेकिन जब लोगों को वस्तुस्थिति का पता चला गया तो विद्रोह का वातावरण बनने लगा। इसलिए जब विद्रोह हुआ तो कुछ व्यक्तियों या गुटों के षड्यन्त्र के कारण नहीं, बन्लिक जनता के बढ़ते हुए असन्तोष के कारण हुआ।

अगर यह पूछा जाए कि भारतवासियों का यह विद्रोह लगभग 100 वर्ष तक क्यों रूका रहा, तो उसका उत्तर इन तथ्यों के से मिल सकेगा। भारत में जिस तरह ब्रिटिश सत्ता कायम हुई, उस तरह इतिहास में और कोई सत्ता कायम नहीं थी। उन्होंने देश को जीत कर अपने अधिकार में ही नहीं किया बल्कि वे धीरे-धीरे अपने पैर जमाते जले गये और खुद इस देश के लोगों ने उनकी मदद की। भात में ब्रिटिशों ने अपनी सत्ता ब्रिटेन की सरकार के नाम पर नहीं जमायी, इसलिए लोगों से उनके कार्यों का सह मन्तव्य छिपा रहा। अगर भारत के मामलों में शुरू से ही ब्रिटेन की सरकार के नाम से सीधा हस्तक्षेप हुआ होता, तो भारतीय यह समझ जाते कि एक विदेश शक्ति देश में प्रवेश कर रही है। ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक व्यापारी कम्पनी थी, इसलिए लोग यह नहीं समझ सके कि वह शासन जमा लेगी। यही कारण था की कम्पनी के प्रतिनिधि जिस तरह अपना काम कर सके, उस तरह ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि न कर पाते। ब्रिटेश की सरकार के प्रतिनिधि को राजा-महाराजों और मुगल दरबार के स्थानीय अधिकारियों की खुशामद, मिन्नत और चापलसी करने में कुछ संकोछ होता, लेकिन कम्पनी के प्रतिनिधियों में ऐसी कोई बात नहीं थी। वे छोटे से छोटे अधिकारी की भी उस तरह खुशामद करते थे, जिस तरह भारतीय व्यापारी करते थे। घूषखोरी और भ्राष्टाचार करते हुए उन्हें इस बात का डर नहीं था कि उसके लिए उनकी अपनी सरकार उन्हें कुछ कहेगी।

यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत समय तक कम्पनी ने अपने नाम से कार्रवाई नहीं की। उसने हमेशा अपने हित-साधन के लिए किसी स्थानीय सरदार की आड़ ली। इस तरह कम्पनी ने दक्षिण के कर्नाटक के नवाब की मांगो का समर्थन करके, वहां मजबूती से अपना पैर जमाया। इसी तरह, बंगाल में उसने मुर्शिदाबाद के नवाब नाज़िम के नाम पर काम चलाया। बंगाल का शासन अनपे हाथ में आ जाने के बाद भी, कम्पनी ने उस पर अपनी प्रभुसत्ता का दावा नहीं किया। क्लाइव ने बादशाह से दीवानी अधिकार मांगे थे और कई दशकों तक कम्पनी बादशाह के एजेंट के रूप में ही काम करती रही। सिर्फ इतना ही नहीं, कम्पनी दूसरे सूबेदारों और प्रान्तों के गवर्नरों के ही ढंग से काम करती रही। प्रान्तों के इन गर्वनरों की अपनी महुरें होती थीं, लेकिन वे हमेशा अपने को मगुल बादशाह का सेवक बताते थे। कम्पनी के गर्वनर-जनरल की भी अपनी महुर थी, लेकिन वह अपने को दिल्ली के बादशाह, शाह-आलम का सेवक कहता था। दूसरे गर्वनर और सूबेदार बादशाह से मिलने गये, उन्होंने उसे नज़राने दिया और बदले में बादशाह नें उन्हें पुरस्कार दिया। गर्वनर जनरल भी बादशाह के पास गया और 101 गिन्नियां नज़र कीं, उसके बदले में बादशाह ने उसे खिलअत और पदवियां दीं। गर्वनर जनरल अपने सब सरकारी कागज पत्रों मे यह पदवियां भी लिखता था। इस तरह बादशाह की प्रभुसत्ता का दिखावा कायम रखा गया। बहुत समय तक लोग यह नहीं समझ सके कि कम्पनी धीरे-धीरे इस देश की असली शाक बनती जा रही है।

यह क्रम 19वीं सदी के लगभग दूसरे दशक तक चलता रहा। तब तक कम्पनी का शासन सतलज तक फैल गया था। तत्कालीन गर्वनर-जनरल, लार्ड हेस्टिंग्स ने यह अनुभव किया कि अब धीरे-धीरे बादशाह की सत्ता को त्यागने और अपना सिक्का जमाने का समय आ गया है। इस दिशा में उसने बादशाह से पहली मांग तो यह की कि उसे बादशाह से बातचीत करने समय बैठने की अनुमति दी जाए। दूसरे उसने नज़राजने की छूट भी मांगी। बादशाह ने ये दोनों बातें नामूंजर कर दीं और कुछ समय तक गर्वनर-जनरल ने अपनी इन मांगो पर जोर नहीं दिया।

तब कम्पनी ने ऐसे राज्यों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया, जो दिल्ली के अधीन नहीं थे। इस तरह उसने बादशाह की प्रतिष्ठा कम करने का प्रयत्न किया। हैदरबाद के निज़ाम से कहा गया कि वह अपने आपको राजा घोषित कर दे। निज़ाम इसके लिएराजी न हुए लेकिन अवध के नवाब-वज़ीर को यह बात जँच गयी। इस अवध बादशाह के साम्राज्य का एक प्रान्त न रह कर एक अलग राज्य बन गया और उसने बादशाह की सत्ता त्याग दी।

सन् 1835 तक कम्पनी अपने को इतना शक्तिशाली समझने लगी कि उसने बादशाह का नाम हटाकर अपने सिक्के चलाने शुरू कर दिये। बहुत-से लोगों को इससे धक्का लगा। तब उन्होंने समझा कि कम्पनी सिर्फ व्यापारी या बादशाह की एजेंट न रहकर, वास्तव में भारत के विशाल भू-क्षेत्र की शासक बन गयी है। 1835 में ही फारसी की जगह ब्रिटिशी को दरबार की भाषा बनाने का भी निश्चय किया गया। इन सब बातों का काफी असर पड़ा और लोग कम्पनी की बदली हुई स्थिति को समझ गये। इस तथ्य का पता लगाने पर उनके मन में बड़ी उथल-पुथल मची और इसका असर सिर्फ नागरिकों पर ही नहीं, बल्कि सशस्त्र सैनिकों पर भी पड़ा।

उस समय के एक प्रतिष्ठित ब्रिटिश असैनिक अधिकारी ने जो अध्ययन किया था, उससे हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि 1840 से पहले के दशक में देश की क्या स्थिति थी। फ्रेडिक जान शोर, सर जान शोर का पुत्र और उसने बंगाल प्रेसीडेंसी के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में पुलिस, राजस्व और न्यायिक विभागों में कई पदों पर काम किया। उसने कलकत्ते के एक दैनिक "इण्डिया गजट" में छद्मनाम से एक लेखमाला लिखी और बाद में, 1837 में, "नोट्स आन इण्डियन अफ़ेयर्स" नामक पुस्तक में उन्हें प्रकाशित कर दिया। शोर के उन लेखों से हमें लोगों की मनःस्थिति का ठीक से पता चलता है। उसने जगह-जगह पर यह कहा है कि यद्यपि ऊपर से सब कुछ शान्त था, लेकिन अन्दर-अन्दर आग सुलग रही थी और सिर्फ एक चिंगारी ही उसे एक भयंकर ज्वाला में बदल देने के लिए काफी थी। इसी असन्तोष ने बाद में 1857 में विद्रोह का रूप धारण किया।

यह बढ़ता हुआ असन्तोष दो बातों की वजह से और भी तीव्र हो गया, जिन्हें 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण कहा जा सकता है। पहली बात तो उत्तर-पश्चिमी प्रान्त (बाग में आगरा और अवध) के लेफ्टिनेंट गर्वनर श्री थामसन द्वारा चलाई गयी नयी नीति थी। पहले कम्पनी ऐसे जमींदारों का एक वर्ग कायम रखने या बनाने की नीति के पक्ष में थी, जो स्वाभाविक रूप से सरकार के पक्षपाती हों। लेकिन थामसन का विचार कुछ और ही था। उसका विश्वास था कि बड़े-बड़े जमींदारों से कम्पनी को खतरा पैदा हो सकता है, इसलिए उसका विचार था कि जमींदार एक वर्ग के रूप में कायम न रहें और सरकार को रैयत से सीधा सम्पर्क स्थापित करना चाहिए। इस नयी नीति के परिणामस्वरूप कम्पनी ने जमींदारों की जमींदारियों खत्म करने और काश्तदारों को सीधे अपने अधीन करने का हर सम्भव प्रयत्न किया।

दूसरी मुख्य बात डलहौज़ी की वह नीति थी, जिसके अनुसार वह एक के बाद दूसरी भारतीय रियासत को ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल करता गया। उस जमाने में भारत में सामन्तशाही का अन्तिम दौर था। उस सामान्त प्रणाली में लोगों की वफादारी अपने जमींदार या राजा के प्रति रहती थी। लोगों में राष्ट्र या देश के प्रति वफादारी की भावना नहीं थी। जब लोगों ने देखा कि एक के बाद दूसरी भारतीय रियासतें खत्म हो रही हैं और जमींदारों का वर्ग भी समाप्त किया जा रहा है, तो उन्हें एक बड़ा धक्का-सा लगा। उन्होंने अनुभव किया कि आखिरकार अब कम्पनी अपने असली रूप में आ रही है और भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन के रूप को ही बदल रही है। जब कम्पनी ने अवध को अपने अधिकार में लिया, तो असन्तोष की भावना अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गयी। अवध रियासत 70 साल से कम्पनी के प्रति वफादार थी। इस दौरान उसने एक बार भी कम्पनी के हितों के खिलाफ कोई काम नहीं किया था। लेकिन इतने पर भी जब वहां के राजा को गद्दी छोड़ने पर मजबूर किया गया और कम्पनी ने रियासत को अपने अधिकार में ले लिया तो लोगों को बड़ा जबर्दस्त धक्का लगा।

अवध राज्य को समाप्त करने का असर इसलिए ज्यादा हुआ क्योंकि बंगाल-सेना के अधिकांश सैनिक वहीं के थे। उन्होंने बड़ी वफादारी से कम्पनी की सेवा की और देश के विभिन्न क्षेत्रों में कम्पनी का प्रभुत्व बढ़ाने में उनका बड़ा योग था। उन्होंने अचानक यह अनुभव किया कि उनकी सेवा और बलिदान के द्वारा कम्पनी ने जो प्रभुत्व स्थापित किया है, उसी से उनके अपना राजा का राज्य समाप्त कर दिया गया है। निस्सन्देह 1856 में जब अवध को हस्तगत किया गया, तभी से आम सैनिकों में और खास तौर पर बंगाल-सेना के सैनिकों में विद्रोह की भावना पैदा हुई। तभी से वे यह सोचने लगे कि कम्पनी के शासन का अन्त करना चाहिए। विद्रोह के दिनों में लारेन्स तथा अन्य लोगों ने आम सैनिकों की भावनाओं का पता लगाने कि कोशिश की थी. वे लोग इस मत के पक्ष में काफी प्रमाण छोड़ गये हैं। चर्बी के कारतूस का मामला सेना के असन्तोष का कोई नया कारण नहीं था, बल्कि उसने दबे हुए असन्तोष को उभार दिया था।

शुरू में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय भावनाओं का काफी ध्यान रखा। उसने भारतीय भावना का आदर किया और उच्च वर्ग के लोगों का काफी ख्याल रखा। गवर्नर जनरल की परिषद् के सदस्यों के यहां वह रिवाज था कि वे राजे-महाराजों को ही नहीं, बल्कि किसी भी उच्च सामाजिक स्थिति के भारतीय को दरवाजे तक छोड़ने जाते थे। जब कम्पनी ज्यादा शक्तिशाली हो गयी, तो उसका रूख बदला और भारतीय भावनाओं के प्रति उसका धयान कम होता गया। यह सोचे बिना नये कानून बना दिये गये कि भारतीयों पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी। यह मानना होगा कि प्रायःकम्पनी

अज्ञानवश ऐसा करती थी, जान-बूझ कर नहीं। एक परिषद् की सहायता से गवर्नर-जनरल कम्पनी कार्य संचालित करता था। उस परिषद् में सिर्फ ब्रिटिश ही थे। वास्तव में कम्पनी यह सोच भी नहीं सकती थी कि उस परिषद् मे कोई भारतीय होना चाहिए। इसके अलावा कोई ऐसी प्रतिनिधि संस्था भी नहीं थी, जिससे कम्पनी को लोगों की भावना का पता चल सके। इन परिस्थितियों में कम्पनी के पास लोगों की इच्छा जानने का कोई तरीका नहीं था। इस तरह कम्पनी और उसके प्रजा जनों के बीच का अन्तर बढ़ता गया।

1857 के विभिन्न विवरणों को पढ़ने के बाद पाठक कुछ निष्कर्षों पर पहुंचे बिना नहीं रह सकता। स्वभावतः यह प्रश्न उठाता है कि क्या यह विद्रोह केवल राष्ट्रीय भावनाओं के उभरने के कारण ही हुआ? अगर राष्ट्रीयता का अर्थ हम आधुनिक दृष्टि से समझें तो इसका उत्तर 'हां' नहीं हो सकता। इसमें कोई शक नहीं है कि लोगों ने देश-प्रेम की भावना से प्रेरित होकर ही विद्रोह में हिस्सा लिया था। लेकिन ये भावनाएँ इतनी तीव्र नहीं थीं कि इनसे विद्रोह भड़क उठता। लोगों को विद्रोह के लिए उभारने में देशभक्ति के साथ-साथ धार्मिक भावना भी काम कर रही थी। चर्बी वाले कारतूसों के बारे में प्रचार, इसका सिर्फ एक उदाहरण है। अपने विदेशी शासकों के विरूद्ध उठ खड़े होने से पहले सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को और तरह से भी ठेस पहुंची थी।

यह आरोप भी निराधार है कि कम्पनी ने हिन्दू सैनिकों के धार्मिक विश्वासों पर आधात पहुंचाने के लिए आटे में गाय की हड्डियों का चूरा मिलाया। आज कोई भी समझदार आदमी इस आरोप का स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन उस सयम यह

झूठी खबर खूब फैली और बहुत से सैनिकों को इस पर विश्वास भी हो गया तथा वे कम्पनी के खिलाफ भड़क उठे।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीयों को पश्चिमी ढंग की शिक्षा देने का निश्चय किया और इस कार्य के लिए कालेज और स्कूल खोले। यह कार्य मुख्ततः उन भारतीयों के कहने पर किया गया, जिनके विचार कुछ ज्यादा उन्नत थे। लेकिन आम लोगों ने इसका मतलब यह लगाया कि भारतीयों को ईसाई बनाने के लिए यह सब किया जा रहा है। स्कूलों और कालेजों के अध्यापकों को "काला पादरी" कहा जाता था और धृणा की दृष्टि से देखा जाता था। आज कोई भी व्यक्ति पश्चिमी ढंग की शिक्षा के लिए किये गये इन कार्यों को विद्रोह का एक कारण नहीं मानेगा।

ज्यों-ज्यों मैं 1857 की घटनाओं के बार में पढ़ता हूं, त्यों-त्यों मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचता जाता हूं कि उस समय भारतवासियों का राष्ट्रीय चरित बहुत गिर गया था। विद्रोह का संचालन करने वाले नेता कभी भी एक दूसरे से सहमत नहीं होते थे। उनको एक दूसरे से ईर्ष्या भी और वे एक दूसरे के खिलाफ चालें चलते रहते थे। उन्हें इस बात को कोई ध्यान नहीं था कि उनकी इस फूट का सामान्य उद्देश्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सही बात यह है कि बहुत हद तक इस व्यक्तिगत ईर्ष्या-द्वेष के कारम ही भारीतयों की हार हुई।

बख़्त ख़ां, जिसने संघर्ष के अन्तिम दौर में दिल्ली में विद्रोहियों की कमान संभाली थी, एक ईमानदार व्यक्ति थे। वह सच्चे दिल से जीतने की कोशिक कर रहे थे, लेकिन दूसरे सैनिक नेताओं ने उन्हें हराने की कोशिश की। जब वह लड़ने के लिए मैदान मे आए, तो उन्हानेें उन्हें मदद नहीं दी। लखनऊ मे भी यही हालत थी। रेज़िडेंसी के चारों तरफ भारतीय सैनिकों का घेरा पड़ा हुआ था, लेकिन सैनिक यह समझते थे कि रेज़िड़ेंसी जीत लेने के बाद अवध की रानी की सरकार को उनकी जरूरत नहीं रह जाएगी। उनका विचार था कि जब तक यह संघर्ष चलेगा, तभी तक उनकी आवश्यकता रहेगी। इसलिए उन सैनिकों ने विजय प्राप्त करने की कभी कोशिश नहीं की।

इसके मुकाबले दूसरी तरफ ब्रिटिश़ अपनी साम्राज्ञी के प्रति वफादारी से लड़े। ब्रिटिश़ पुरूषों और औरतो ने यह समझ लिया कि राष्ट्रीय विपत्ति आयी है और जीवित रहने तथा विजय पाने के लिए उन्हें जी-जान से लड़ना चाहिए।

यह भी उल्लेखनीय है कि कुश सम्माननयी व्यक्तियों को छोड़कर-जिनमें अहमदउल्ला और तात्या टोपे सर्वप्रमुख थे-अधिकांश नेताओं ने व्यक्तिगत कारणों से इस संघर्ष में हिस्सा लिया। जब तक उनके व्यक्तिगत हितों को ठेस नहीं पहुंची, तब तक उन्होंने ब्रितानियोंे का विरोध नहीं किया। विद्रोह शुरू हो जाने के बाद भी नानासाहब ने कहा था कि अगर डलहौज़ी के निर्णय बदल दिये जाएं और उसकी मांग पूरी कर दी जाएं, तो वह समझौता करने को तैयार है। झांसी की रानी भी अपनी शिकायतें थी, लेकिन एक बार युद्ध में शामिल होने के बाद वह फिर कभी पीछे नहीं हटी और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसने अपना जीवन बलिदान कर दिया।

जब विद्रोह के नेताओं की यह हालत थी, तो जनता की हालत का अन्दाजा लगाना मुश्किल नहीं है। आम तौर पर लोग संघर्ष के दर्शक मात्र रहते थे और मौके पर वे जिस पक्ष को अधिक शक्तिशाली पाते, उसी के पक्ष में हो जाते थे। तात्या टोपे की जो हालत हुई, उसी से यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि लोगों का रूख क्या था। जब वह अन्तिम रूप से हार गया तो उसने नर्मदा पार करके मध्यप्रदेश में जाने का निश्चय किया। उसे विश्वास था कि मराठा क्षेत्र में पहुंचने पर लोगों की उसे पूरी सहायता मिलेगी। असाधारण साहस और दृढ़ता से उसने पीछा करने वालों को चकमा दे कर नर्मदा पार कर भी ली। लेकिन, दूसरे किनारे पर पहुंचने के बाद किसी भी गांव ने उसे आश्रय नहीं दिया। सब उसके खिलाफ हो गये और फिर उसे भागकर जंगल में शरण लेनी पड़ी। अन्त में उसी के तथाकथित मित्र ने उसे सोते हुए धोखा दिया।

महान विद्रोह के दिनों में किये गये अत्याचारों के सम्बन्ध में भी यहां कुछ कहना अनुचित न होगा। ब्रिटिश़ लेखकों ने कई जगह विस्तार से भारतीय सैनिकों तथा उनके नेताओं के बहुत से पाशविक कृत्यों का वर्णन किया है। खेद के साथ यह मानना पडेगा कि इनमें कुछ आरोप सही हैं। दिल्ली, कानपुर या लखनऊ में यूरोपीय औरतों और कहीं कहीं बच्चों की भी हत्या के लिए कोई सफाई पेश नहीं की जा सकती। नाना साहब ने जनरल ह्वीलर को जो वचन दिया था, उसको तोड़ने की जिम्मेदारी सम्भवतः उन पर नही डाली जा सकती। वास्तव में सैनिक उनके नियंत्रण में नहीं रहे थे और वे अपनी मन-मानी कर रहे थे। ब्रिटिश़ इतिहासज्ञों ने यह स्वीकार किया है कि एक बच्चे की लाश को पानी में उतराते हुए देख कर नाना को धक्का लगा था। जो भी हो, ये अपराध उन्हीं भारतीय सिपाहियों ने किये थे, जो नानासाहब के अधीन होने का दावा करते थे। इसके अलावा हैवलाक के पहुंचने से पहले ही मारे गये बन्दियों की खास जिम्मेदारी नाना पर थी। कहा जाता है कि ब्रितानियोंे ने इलाहाबद में जो अत्याचार किये थे, उसकी प्रतिक्रिया के रूप में उन्होंने उन बन्दियों को मरवा दिया था। लेकिन एक गलती से दूसरी गलती का औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। इन निरीह बन्दियों की हत्या का जिम्मेदार नाना को ही ठहराना होगा।

अगर काले कारनामों ने भारतीयों के नाम धब्बा लगाया तो ब्रितानियोंें का नाम भी उज्जवल नहीं रहा। ब्रिटिश़ इतिहासज्ञ आम तौर पर अंग्रज़ों द्वारा किये गये अत्याचारों को छोड़ गये हैं, लेकिन कुछ ने बदले के रूप में किये गये इन भयंकर अपराधों की निन्दा की है। हडसन का नाम भीषण अत्याचारों का प्रतीक बन गया था। नील को इस बात का गर्व था कि उसने सैकड़ौ भारतीयों को बिना मुकदमा चलाये मरवा दिया। इलाहाबाद के आसपास शायद ही कोई ऐसा पेड़ बचा हो, जिस पर किसी न किसी अभागे भारतीय की लाश न लटकी हो। हो सकता है ब्रिटिश़ बहुत उत्तेजित हो गये हों, लेकिन भारतीय भी उत्तजेति थे। अगर बहुस ते भारतीयों के कृत्य माफ नहीं किये जा सकते, तो बहुत से ब्रितानियोंें के अपराध भी अक्षम्य थे। मुसलमान सरदारों को जीते जी सूअर की खाल में सी दिया और सूअर का मांस जबर्दस्ती उनके मुंह में ठूंस दिया गया। हिन्दुओं को मौत का डर दिखाकर गाय का मांस खाने को बाध्य किया गया। जख्मी बन्दियों को जिन्दा जला दिया गया। ब्रिटिश़ सैनिकों ने अभागे गांववालों को अपने कब्जे में करके, उन्हें इतनी यातनाएं दीं कि वे मर गये। कोई भी राष्ट्र या व्यक्ति इतने भयंकर अत्याचार करके अपने को सभ्य नहीं कह सकता।

1857 के विद्रोह की अस्पष्ट कहानी से दो तथ्य स्पष्ट रूप से ज्ञात होते हैं। पहला यह कि उस समय भारत में हिन्दू और मुसलमानों में बहुत एकता थी और दूसरा यह कि लोग मुगल बादशाह के प्रति बहुत वफादार थे।

यह आन्दोलन 10 मई, 1857 को शुरू हुआ और करीब दो साल तक चलता रहा। इस दौरान दोनों तरफ के लोगों ने बहुत से उज्जवल कार्य भी किये और काले कारनामे भी। दोनों तरह से उदाहरण मिलते हैं- शानदार वीरता के भी और अविश्वसनीय अत्याचार के भी। इस सम्पूर्ण अवधि का हमें एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता, जिससे यह ज्ञात हो कि कहीं साम्प्रदायिक झगड़े हुए। सभी भारतीय, चाहे मुसलमान हों या दिन्हू, हर बात को एक ही दृष्टिकोण से देखते थे और घटनाओं को एक ही ढंग से आंकते थे।

नेताओं को साम्प्रदायिक एकता कायम करने के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ा। इस बात को कोई भी उल्लेख नहीं मिला कि 1857 के नेताओंने हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए कहीं प्रयत्न किया हो। सदियों तक इकट्ठे रहने के परिणामस्वरूप हिन्दू और मुसलमानों के स्थायी मैत्री सम्बन्ध हो गये थे। इसलिए किसी खास कार्य के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता की अपील करने की कोई आवश्यकता नहीं हुई। जब यह ध्यान में आता है कि उस समय लोगों में कितनी ज्यादा उत्तेजना थी, तो साम्प्रदायिक झगड़ों का अभाव और भी अधिक महत्त्वपूर्ण दिखायी देता है। स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि अंग्रज़ों के शासन के पहले भारत में हिन्दू-मुस्लिम-समस्या नाम की कोई चीज नहीं थीं।

1857 से भी पहले ब्रितानियोंें ने "फूट डाल कर शासन करने" का तरीका अपनाने की कोशिश की थी। यह ठीक है कि ब्रिटेन की सरकार ने भारत का शासन के चलाने की कोई जिम्मेदारी नहीं ली थी, लेकिन 100 वर्ष पहले की प्लासी की लड़ाई के समय से ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में स्थायी रूप से जम गयी थी। इन वर्षों में ब्रिटिश़ अफसर प्रायः भारतीय सम्प्रदायों के मतभेदों को बढ़ाने का प्रयत्न करते रहे। कम्पनी के डायरेक्टरों के पत्रों में बार-बार यह कहा गया कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अन्दर जरूर डालना चाहिए। वे समझते थे कि मुसलमानों की वफादारी पर कोई विश्वास नहीं किया जा सकता।

टाड की "एनाल्स आफ़ राजस्थान" और उनकी "हिस्ट्री आफ़ इण्डिया" में इलियट की भूमिका से यह स्पष्ट हो जाता है कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी हिन्दू और मुसलमानों में फूट पैदा करना चाहती थी। ये दो व्यक्ति ईस्ट इण्डिया कम्पनी के उच्च अधिकारी थे और इन्होंने उन हिन्दू इतिहासज्ञों की निन्दा की है, जिन्होंने मुसलमान राजाओं की प्रशंसा की। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि हिन्दू इतिहासज्ञ मुसलमान शासक की न्यायप्रियता और निष्पक्षता की प्रशंसा क्यों करता है।

टाड के "एनाल्स" में मध्य युग के इतिहास के सम्बन्ध में ऐसा बहुत-सी बातें हैं जिनसे हिन्दू और मुसलमानों की एकता पर आघात पहुंचता है। जब भी किसी घटना के सम्बन्ध में दो मत हुए, तो उन्होंने उस मत पर जोर दिया, जिससे हिन्दू और मुसलमानों के सम्बन्ध बिगड़ें। फिर भी 1857 की घटनाओं से यह सिद्ध होता है कि उनकी ये कोशिशें सफल नहीं हुईं। हिन्दू और मुसलमानों में भाई-चारे और परस्पर सहानुभूति की ऐसी भावना पैदा हो गयी थी कि उसने 100 वर्ष तक फूट डालने के इन प्रयत्नों का मुकाबला किया। यही कारण था कि 1857 के संघर्ष ने राष्ट्रीय और जातीयरूप धारण किया, साम्प्रदायिक नहीं। स्वातन्त्र्य संग्राम में हिन्दू और मुसलमानों ने कंधे भिड़ा कर काम किया। उनका उद्देश्य ब्रिटिश शासन से मुक्ति पाना था।

एकता की यह भावना सेना में ही नहीं, बल्कि आम लोगों में भी थी। यद्यपि ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जब ब्रिटिश़ अफसरों ने साम्प्रदायिक मतभेद पैदा करके भारतीय पक्ष को कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन धार्मिक आधार पर किसी झगड़े का उल्लेख नहीं मिलता।

भारत ने 1857 कठिनाइयों को संगठित रूप से झेला। तब क्या कारण है कि कुछ ही दर्शकों में साम्प्रदायिक मतभेद भारतीय राष्ट्रीयता के मार्क का रोड़ा बन गये? भारतीय इतिहास में यह एक दुःख का विषय है कि यह समस्या दिन-प्रति-दिन गम्भीर होती चली गयी और अन्त में साम्प्रदायिक आधार पर देश का बटवारा करके ही इसका समाधान किया जा सका।

सन् 1857 के बाद ब्रितानियोंें ने जो नीति अपनायी, उसी से इस बात का जवाब मिल जाता है। जब ब्रितानियों ने देखा कि कठिनाई के दिनों में भी हिन्दू और मुसलमान एक रहे, तो उन्होंने यह समझ लिया इन दोनों में फूट डाल कर ही शासन कायम रखा जा सकता है। ब्रितानियोंें के तत्कालीन पत्र-व्यवहार को पढ़ने से यह निष्कर्ष और फी पुष्ट हो जाता है। विद्रोह के दमन के बाद सेना का जिस ढंग से पुनर्गठन किया गया, उससे भी यह बात स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाती है। न केवल सेना का लड़ाकू और गैरलड़ाकू जातियों के आधार पर विभाजन किया गया, बल्कि उसका नये ढंग से ऐसा पुनर्गठन किया गया जिससे वे संगठित रूप से विद्रोह न कर सकें। ऐसी कार्रवाई की गयी कि भविष्य में हिन्दू और मुसलमान मिल कर कोई काम न कर सकें। आम जनता में भी फूट डालने की ऐसी नीति अपनायी गयी, जिससे धीरे-धीरे हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे के खिलाफ होते गये। जो भी मौका आया, इन दोनों के मतभेद बढ़ाने की ही कोशिश की गयी। लार्ड राबर्ट्स की आत्मकथा से यह स्पष्ट हो जाता है कि सेना में इस सिद्धान्त के अनुसार किस प्रकार काम हुआ।

विद्रोह के दिनों की दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि किस तरह मुसलमान और हिन्दू दोनों दिल्ली और बहादुरशाह को अपना मानते थे। दिल से सब लोग इस बात से सहमत थे कि सिर्फ बहादूरशाह को भी भारत का बादशाह होने का अधिकार है। याद रहे, शुरू में सेना के जिन लोगों ने विद्रोह में भाग लिया, उनमें अधिकांश हिन्दू थे। जब 10 मई को उन्होंने मेरठ में विद्रोह किया, तो उनका पहला नारा "दिल्ली चलो" था। यह नारा किसी विचार-विमर्श के बाद नहीं, बल्कि सामान्य सैनिकों की स्वाभाविक हार्दिक इच्छा के फलस्वरूप उठाया गया। जहां-जहां छावनियों में विद्रोह हुआ, हर जगह यह बात हुई। जो सेना दिल्ली नहीं पहुंच सकती थी, उसने भी मुगल बादशाह के प्रति वफादारी की घोषणा की।

कानपुर में नानासाहब ने विद्रोह में प्रमुख भाग लिया। उन्होंने भी अपने आपको पेशवा घोषित किया। मराठों और मुगलों के पुराने झगड़े को भूलकर उन्होंने बिना किसी संकोच के अपने आपको मुगल दरबार का सूबेदार या गर्वनर कहा। उन्होंने कहा कि असली शासक दिल्ली का बादशाह है। सिक्के भी बादशाह के नाम के थे और सब आदेश बादशाह के नाम से ही दिये जाते थे. नानासाहब ने कुछ ऐसे आदेश हैदराबाद-दकन के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। हर आदेश दिल्ली के बादशाह के नाम से जारी किया गया। मुगल दरबार के रिवाज़ के मुताबिक तारीख भी पहले हिजरी और उसके बाद संवत् के रूप में दी गयी है।

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि 1857 में बहादुरशाह सिर्फ एक कठपुतली ही तरह ही था। उसका शासन दिल्ली के किले की चहारदीवारी तक ही सीमित था। दिल्ली शहर का काफी हिस्सा भी उसके नियंत्रण से बाहर था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी उसे एक लाख रूपया महीना अनुदान देती थी और उसी पर उसकी गुजर होती थी। यही नहीं उससे एकदम पहले के पूर्वज भी नाममात्र के शासक थे। उनके पास न सेना थी और न खजाना। न उसको कोई प्रभाव था, न शक्ति। सिर्फ एक यही बात उसके पक्ष में थी कि वह अकबर और शाहजहां के वंशज थे। बहादुरशाह के प्रति भारत के लोगों की वफादारी इसीलिए थी कि वह महान मुगलों के वंशज थे। भारत के लोगों के दिलों पर मुगल दरबार का ऐसा प्रभाव था कि जब यह प्रश्न उठा कि ब्रितानियोंें से शासन की बागडोर कौन ले, तो हिन्दू और मुसलमानों ने एक मत से बहादुरशाह को ही चुना। इससे यह ज्ञात होता है कि बाबार द्वारा स्थापित और अकबर द्वारा संगठित मुगल साम्राज्य की जड़ें भारत में कितनी गहरी चली गयी थीं। भारतवासी मुगलों को विदेशी शासक नहीं, बल्कि अपने ही बादशाह मानते थे।

 

भारत के लिए यह दुर्भाग्य की बात थी कि बहादुरशाह एक प्रतीक के रूप में भी शासन चलाने के लिए उपयुक्त नहीं थे। वह इतने कमजोर थे कि न वह सैनिकों को अपने नियंत्रण में रख सकते थे, न अपने सरदारों को। उनकी इन व्यक्तिगत कमियों के बावजूद किसी ने उनके स्थान पर किसी दूसरे के बारे में नहीं सोचा। अन्त तक सैनिक और जनता बहादुरशाह को ही अपना बादशाह मानती रही। सितम्बर, 1857 में ब्रितानियोंें ने फिर दिल्ली को अपने कब्जे में कर लिया। उस समय बख़्त ख़ां ने बहादुरशाह को यह समझाने की कोशिश की कि अभी मौका है, रूहेलखण्ड और अवध अब भी यहा से गये नहीं हैं। लेकिन बादशाह मौके का फायदा न उठा सके और फिर असफल रहे। इसके अलावा, ब्रितानियोंें को देशद्रोही इलाही बख़्श का सहयोग मिल गया था, जिसने बाहदुरशाह को वहीं रहने के लिए राजी कर लिया। अन्त में बहादुरशाह गिरफ्तार कर लिए गए, और यही राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध का अन्त था।

जनवरी, 1955 में मैंने यह निश्चय किया कि 1857 के भारतीय संघर्ष का एक नया इतिहास तैयार करने का काम एकदम शुरू हो जाना चाहिए। यह बात मेरे मेन में स्पष्ट थी कि संघर्ष का यह सच्चा इतिहास होना चाहिए और घटनाओं का इसमें निष्पक्ष उल्लेख होना चाहिए। यह भी कि इतिहास केवल तथ्यों पर आधारित हो और किसी भी तरह की भावनाओं से प्रभावित न हो। मैंने इस कार्य के लिए प्रख्यात भारतीय इतिहासज्ञ, डॉ. सुरेन्द्र नाथ सेन को आमंत्रित किया और भारतीय ऐतिहासिक आयोग की वार्षिक बैठक में इसकी घोषणा भी कर दी। इस विषय में सब आलेख उनके लिए उपलब्ध करने के अलावा, उन्हें लन्दन के इण्डिया आफिस से भी आवश्यक तथ्य और आंकड़े एकत्रित करने की सुविधा दी गयी। मैंने इस बात की भी स्वीकृति दी कि वे स्वयं लन्दन जाएं और वहां उन ऐतिहासिक आलेखों को देखे, जो अन्यथा उन्हें न मिल सकते।

भारत सरकार के कहने पर डॉ. सेना ने जो कार्य किया, वह इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत है। मैंने सिर्फ यही आदेश दिया था कि वे एक सच्चे इतिहासज्ञ के दृष्टिकोण से पुस्तक लिखें। इसके अलावा उनके कार्य में हस्तक्षेप करने या उनके निष्कर्षों को प्रभावित करने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया। इसलिए घटनाओं के चयन और व्याख्या की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर है। भारत सरकार इस पुस्तक में व्यक्ति किये गये उनके किसी मत से किसी भी तरह बंधी हुई नहीं है।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई हि डॉ. सेन ने इस विषय को निरपेक्ष और निर्लिप्त भाव से प्रस्तुत किया है। उन्होंने न किसी की निन्दा की है औ न किसी से साहनुभूति प्रकट की है; उन्होंने संघर्ष में भाग लेने वाले ब्रितानियोंें और भारतीयों को सच्चे ऐतिहासिक दृष्टिकोण से आंका है। हो सकता है, मैं उनके सब कथनों से सहमत न होऊं, लेकिन जिस निरपेक्ष भाव से उन्होंने यह कठिन कार्य किया है, उसकी मैं प्रशंसा करता हूं।

भारत मे 1857 का महा संघर्ष : मिथक और यथार्थ ( सारांश )

डॉ. सतीश चन्द्र मित्तल
प्रोफ़ेसर इतिहास विभाग
मोबाईल न.-9319480430
पता-6/1277-ए.माधव नगर
सहारनपुर-247001 (यू.पी.)

1857 का महा संघर्ष विश्‍व इतिहास की महानतम् घटना है। इससे पूर्व किसी भी योरपिय साम्राज्य अथवा एशिया के किसी भाग मे इतना बडा संघर्ष न हुआ था। इस संघर्ष मे योरपिय साम्राज्य के सबसे बडे राज्य, इंग्लैण्ड को भारत ने विशालतम् चुनौती दी।

यह संघर्ष भारतीय वीरो के बलिदान का स्मारक है। इस संघर्ष मे तीन लाख से अधिक भारतीय शहीद हुए, इस संघर्ष मे भारत के सभी समुदायो वर्गो तथा जातियो ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। सिपाहियो के साथ किसानो, कारीगरो, दलितो, वनवासियो व नगर वासियो ने सभी ने भाग लिया। इन सभी ने मिलकर ब्रिटिश साम्राज्य की जडो को हिला दिया था।

इस महान संघर्ष को भारतीय राष्ट्रवाद की आधार शिला भारतीय इतिहास का परिवर्तन बिन्दु, तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी की अपराधिक तथा अत्याचारी की शताब्दी (1757-1857) के घ्अपमानजनक विरोध की अभिव्यक्ति' कहा जा सकता है।

1857 के इस महान संघर्ष के स्त्रोत प्रचुर मात्रा मे प्राप्त है। इसके अलावा तत्कालिन पार्लियामेन्टरी कार्यवाहिया, व्यक्तिगत कागजात, डायरिया, तथा अतुल पत्र व्यवहार प्राप्त है। जैलो के रिकोर्डस सेना के रिर्कोड्स न्यायिक व कोर्ट मार्शल्स के फै़सले जो इस राष्ट्रीय संघर्ष के मूल कारणो, स्वरुप इसकी व्यापकता तथा विशालता, इसकी गतिविधियो तथा क्रूर अत्याचारो एवं दमन चक्र पर प्रकाश डालते है।

1857 का महा संघर्ष प्रयाप्त साधनो तथा तथ्यो के होने के पश्चात भी अनेक मिथको से घिरा हुआ है। उदाहरणत: इस महान घटना की मूल प्रेरणा क्या थी? इसका विस्तार तथा प्रभाव किस क्षेत्र तक सीमित था? क्या यह सिपाही विद्रोह मात्र था? क्या यह संघर्ष अचानक हुआ अथवा पूर्व नियोजित था? इसकी असफ़लता के क्या कारण थे? इसके दूरगामी परिणाम क्या हुए? क्या तांत्या टोपे को वास्तव मे फ़ांसी हुई थी? क्या पंजाब इस संघर्ष मे शांत रहा? दक्षिण भारत की क्या भूमिका थी ? आदि अनेक प्रश्न प्रचलित मिथको के कारण प्रश्नवाचक चिन्ह बने हुए है।

यदि उपरोक्त मिथको के कुछ मुद्दो पर आलोचनात्मक ढं्‌ग से व्याख्या की जाये तथा उनका विश्लेषण किया जाये, तो संघर्ष के अनेक आयामो की सही तस्वीर सामने आ जाती है। यदि इस महान संघर्ष की कारण मीमांसा की जाये, तो अन्य कारणो के साथ , इसकी मूल प्रेरक कारण भारतीयो द्वारा दीन तथा धर्म की रक्षा तथा भारतीयो द्वारा फ़िरंगीयो को इस देश से बाहर खदेडने के लिये किया गया संघर्ष कहा जा सकता है। शायद इन्ही दो प्रेरक तत्वो के आधार पर प्राय: भारत के सभी समुदाय, वर्ग तथा जातियो ने एकत्रित होकर अंग्रेजो से भयंकर संघर्षकिया था।

भारत को जबरदस्ती ईसाई देश बनाने तथा यहा ईसाईयत की जडे जमाने के प्रयास मे चार्ल्स ग्रान्ट तथा विलियम विल्वर फ़ोर्स ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । 1793, 1813 तथा 1833 के चार्टर ऐक्ट्स मे ईसाइ प्रचार के लिये नयी धाराए जोडी गई। तत्कालीन दस्तावेजो से ज्ञात होता है, ईसाईयत का प्रचार खुले रुप से, मनमाने ढंग से होने लगा।

ब्रिटिश सैनिक अधिकारी सैनिक ट्रेनिंग के साथ ईसाइयत की शिक्षा तथा धर्म परिवर्तन मे सक्रिय रुप से लग गये। बैरकपुर छावनी के कमाण्डर, कर्नल व्हीलर, मेजर एडवर्ड, यहाँ तक की कम्पनी के बोर्ड आफ़ डाइरेक्टर्स के अध्यक्ष आर.डी.मंगल्स के वक्त्तव्यो से यह स्पष्ट हो जाता है।

भारत के ब्रिटिश प्रशासको ने इस प्रकार के नियम बनाये जिसमे ईसाईकरण को प्रोत्साहन मिले। लार्ड ड्लहौजी ने जहां हिन्दू उत्तराधिकरी नियम मे परिवर्तन किया वहा लार्ड कैनिग्ंा ने भारतीय सैनिको के लिये कठोर नियम बनाये। मंदिर तथा मस्जिदों की जायदादं पर कर लगाये ।

भारत को जबरदस्ती ईसाई देश बनाने के प्रयास का खुलासा देश विदेश के अनेक पत्र पत्रिकाआंे ने किया। ब्रिटेन के अलावा तत्कालीन इटली फ़्रांस तथा अमेरिका की पत्र पत्रिकाए इसके बारे मे आवश्यक जानकारी देते है। अंग्रेजी पत्रो ने ईसाईयो के क्रूर प्रचार को स्वीकार नही किया परन्तु बाद मे उन्हे मानना पडा। भारतीय अखबारों मे इसकी विस्तृत चर्चा रही।

भारत को ईसाई देश बनाने की प्रक्रिया से ब्रिटिश पार्लियामेण्ट मे भी इस पर चर्चा हुई। लार्ड पार्मस्टन, लार्ड एलनवरो, लार्ड शेफ़्टवरी, लार्ड मैकाले तथा लार्ड डिजरैली आदि प्रमुख ब्रिटिश सांसदो ने इस पर अपनी तीव्र प्रतिक्रियाए व्यक्त्त की । प्रधानमन्त्री पार्मस्टन ने तो इसे दैवीय पाप तक कहा। रानी विक्टोरिया ने भी अपने पत्रो द्वारा अपनी चिंता व्यक्त्त की।

भारतीय जन नेताओ जैसे नाना साहेब, तांत्या टोपे, रानी लक्ष्मी बाई, अजीमुल्ला खां, कंुवर सिंह, ने इसका खुला विरोध किया। बहादुरशाह जफ़र तथा लखनऊ की हजरत बेगम की घोषणाओ मे भी भारत मे ईसाईकरण की कटु आलोचना की गई।

संघर्ष का दूसरा मुख्य मिथक उसकी व्यापकता तथा विस्तार के सन्दर्भ मे है। अधिकतर ब्रिटिश इतिहासकारो ने संघर्ष का क्षेत्र आधुनिक उत्तर प्रदेश, दिल्ली तथा मध्य भारत का क्षेत्र बतलाया। अनेक भारतीय तथा वामपंथी इतिहासकार ने भी इसे ही सत्य मान लिया। परन्तु नवीनतम खोजे तथा शोध इसके विपरीत है। वस्तुत: यह महा संघर्ष समूचे भारत मे फ़ैला था। यह संघर्ष की गाथा त्रिपुरा, असम से लेकर पश्चिम मे गोवा तक तथा पंजाब से कन्याकुमारी तक फ़ैली थी। भारत का कोई भी क्षेत्र इससे अछुता न था । तत्कालीन पांडेचेरी मे फ़्रांसीसी बस्तियो तथा गोवा, दमन, दमू की पुर्तगाली बस्ती मे भी यह फ़ैला था। यहा तक की भूटान को भी इसने प्रभावित किया था। अत: उपरोक्त्त मिथक सर्वथा असत्य, तर्कहीन व तथ्यहीन है।

1857 के महा संघर्ष की आंशिक रुप से असफ़लता के भी अनेक मन गढ्न्त तथा परम्परागत् कारण बताये जाते है। प्रश्न है कि क्या शस्त्रो की कमी थी ? क्या क्रान्ति अनिश्चित समय पर भडक गई थी?

वस्तुतः उसकी असफ़लता का मुख्य कारण केन्द्रीय शासन का मजबूत न होना माना गया था। दिल्ली, जो भारत की राजनीति का केन्द्र था, वहा के शासक बहादुरशाह जफ़र के राजदरबारी , उनके अपने परिवार के लोग उसकी बात मानने को तैयार न थे। उनके परिवार के लोग ही उनको धोखा दे रहे थे। रज्जब अली, मुन्शी जीवन लाल, मिर्जा इलाही बख्श, हकीम एहसानुउल्ला खां, जहीरुद्दीन हुसैन इस प्रकार के अविश्‍वासी दरबारी थे। स्वयं उसकी पत्नी जीनत बेगम, अपने बेटे जवां बख्श के लिये अंग्रेजो के वार्तालाप कर रही थी।

यदि हम 1857 के संघर्ष की सफ़लताओ और इसके दूरगामी परिणामो की ओर दृष्टि करे तो इसने भारत मे अंग्रेजी साम्राज्य की जडो को हिला दिया। न केवल ईस्ट इण्डीया कम्पनी खत्म हो गई, बल्कि मुगल साम्राज्य सदा के लिये विनिष्ठ हो गया। भारत मे सीधे ब्रिटिश शासन का प्रारम्भ हुआ। भारत मे स्वधर्म का बोध तीव्र हुआ। भारत मे ईसाईकरण करने तथा भारत को एक ईसाई देश बनाने का स्वप्न समाप्त हो गया। रानी विक्टोरिया ने अपनी घोषणा मे भारत मे धार्मिक मामलो मे हस्तक्षेप न करने का आश्‍वासन दिया। इसके साथ अंग्रेजो ने भारत मे बसने का इरादा त्याग दिया। उन्होने अफ़्रीका, न्यूजीलैण्ड,आस्ट्रेलिया जैसे देशो मे अपने स्थायी निवास बनाये, परन्तु भारत के बारे मे उन्हे अपना विचार त्यागना पडा। 1857 के पश्चात संघर्ष समाप्त न हुआ बल्कि कूफ़ा आन्दोलन फ़डको का संघर्ष चापेकर बन्धुओ के बलिदान, सावरकर के कार्यो, विदेशो मे क्रान्तिकारी गतिविधियो, गदर पार्टी के आन्दोलन, भगत सिंह एवं उनके साथियो के बलिदान तथा सुभाष चन्द्र बोस जैसे क्रान्तिकारियो के कार्यो से आलोकित हुआ। जहां वीर सावरकर ने 1857 के संघर्ष को पहली बार जंग-ए-आजादी घोषित किया वही यह संघर्ष देश के नौजवानो के लिए संजीवनी बुटी बन गया, साथ ही अंग्रेजो के भूत की भंाति भय और आशंका का प्रतीक बन गया। लार्ड लिनलियगो जैसे भारत के वायसराय को 1942 की क्रान्ति भी 1857 के महा संघर्ष जैसी लगी, अतः 1857 का महान संघर्ष अत्यधिक व्यापक था, तथा इसके परिणाम दूरगामी सिद्ध हुए।

सिपाही विद्रोह या स्वाधीनता संग्राम?

 

संदर्भ : विचार दृष्टि (हिंदी पत्रिका)
रचनाकार : डॉ वरूण कुमार तिवारी
दिनांक : 9 अक्टूबर-दिसंबर 2007
अंक : 33, पेज न. 28

अठारह सौ सत्तावन का स्वतंत्रता संग्राम 15 अगस्त 1947 को हुए ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासन के अंत की पूर्व पीठिका थी। भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार के विरुद्ध 1857 के पूर्व से ही अनेक क्षेत्रों में विद्रोह हुए जिनमें सभी वर्ग, जाति, धर्म और पेशे के लोगों ने हिस्सा लिया। 1857 तक परिस्थितियाँ बारूद की ढेर बन गई थीं। जिसे केवल एक चिंगारी की ज़रूरत थी। अँग्रेज़ भारत में हमेशा विदेशी बने रहे और भारतीयों को तिरस्कार से देखते रहे। भारत के उच्च वर्ग के लोगों के साथ अँग्रेज़ अपमानजनक उदंडतापूर्ण व्यवहार करते थे। राज परिवारों में भी असंतोष व्याप्त था। डलहौज़ी की उग्र साम्राज्यवादी नीति के वे राज परिवार शिकार हुए। बनावटी कारणों पर देशी राज्यों को कंपनी राज्य में मिलाने एवं भारतीय नरेशों को पेन्शन एवं उपाधियों से वंचित करने के कारण देश में आतंक छा गया। अँग्रेज़ों के जटिल न्याय प्रणाली ने ग़रीबों के ऊपर जुल्म करने में धनी लोगों की सहायता की। कंपनी सरकार का उद्देश्य भारत को लूटना और इंग्लैंड को समृद्ध करना था।

जिन प्रदेशों पर अँग्रेजों का अधिकार हो गया, वहाँ के व्यापार पर उन्होंने एकाधिकार बना लिया और वहाँ के घरेलू उद्योग-धंधों को नष्ट कर डाला। वहाँ के लोगों की जीविका का आधार छिन गया। डलहौजी ने दक्षिण भारत की 20,000 जमींदारियाँ जब्त कर लीं। इस तरह जमींदार लोग भी दरिद्र हो गये। अँग्रेजों की भू-राजस्व नीति, भूमि संबंधी कानून तथा प्रशासन की शोषक प्रणालियों की नीति के किसान-भू-स्वामी बुरी तरह कर्ज में डूब गये।

ईसाई मिशनरियों के कारण लोगों में धर्म नष्ट होने का डर भी समा गया। ईसाई मिशनरी हिंदु तथा इस्लाम धर्म की आलोचना करते तथा भारतीयों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाते। स्पष्ट है कि ऐसे अनेक कारण थे जिससे देश में अँग्रेजों के विरूद्ध लगातार असंतोष फैल रहा था। चर्बी लगे कारतूसों की घटना ने सैनिकों में असंतोष को भड़काने के लिए आग में घी का काम किया। पहली बार एक नयी एन्फील्ड राइफल हिन्दुस्तानी सैनिकों को दी गई। इसके कारतूसों पर चिकनाई युक्त कागज होता था जिसे दाँतों के सहारे किनारी की ओर से काटना होता था। चिकनाई के लिए गाय या सूअर की चर्बी का प्रयोग किया जाता था। फलस्वरूप हिंदू और मुस्लमान सैनिक भड़क उठे और असंतोष की आग, जो 1857 के पहले से ही देश भर में सुलग रही थी, कारतूस की घटना ने उस आग में घी का काम कर दिया।

यह विद्रोह कलकत्ते के बैरकपुर से आरंभ हुआ। 29 मार्च को सिपाही मंगल पाण्डे ने अपनी सैनिक टुकड़ी के सिपाहियों को विद्रोह के लिए उकसाने का प्रयास किया और एक अँग्रेज सार्जेन्ट मेजर को घायल कर दिया। मंगल पांडे को गिरफ्तार कर 8 अप्रैल को फांसी दे दी गई। उन्हें फांसी देने के थोड़े दिनों बाद ही 10 मई 1857 को मेरठ के सैनिकों ने नये कारतूस दाँ से काटने से इनकार कर दिया जिसके कारण उन सैनिकों करा कोर्ट मार्श कर उन्हें जेल भेज दिया। इससे सैनिक उग्र हो उठे, जेल तोड़ डाले और दिल्ली जाकर शहर पर कब्जा करके मुगल सम्राट बहादुर शाह जफ़र को अपना सम्राट घोषित किया। लेकिन अँग्रेजों ने भीषण युद्ध और कुशल कूटनीति से दिल्ली को फिर अपने अधिकार में ले लिया और मेजर हडसन ने बहादुरशाह को बंदी बनाकर रंगून भेज दिया जहाँ 87 वर्ष की उम्र में 1863 ई. में उनकी मृत्यु हो गयी।

क्रांतिकारियों के दिल्ली विप्लव से समस्त उत्तर भारत में क्रांति की आग फैल गयी। अलीगढ़, इटावा, बरेली, मुरादाबाद, बदायूँ, आजमगढ़, गोरखपुर, जौनपुर, इलाहाबद और बिहार में क्रांति की बिगुल बज उठी। क्रांतिकारियों ने लखनऊ नगर पर कब्जा करके रसीस कद्र को अपना राजा घोषित किया। कानपुर में नाना साहब ने शहर पर कब्जा कर लिया, लेकिन एक माह बाद ही शहर पर अँग्रेजों का फिर से कब्जा हो गया। नाना साहब का संघर्ष जारी रहा। नाना साहब और मौलवी अजीमुल्ला ने देश भर के राजे और नबाबों को अँग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह में शामिल होने के लिए निमंत्रण भेजा। नवंबर में फिर एक बार कानपुर अँग्रेजों के हाथ से निकल गया। नवंबर क्रांति का नेतृत्व नाना साहब के सेनापति तात्या टोपे ने किया। अद्भूत पराक्रम से उन्होंने संघर्ष को आगे बढ़ाया। 1859 तक वे अँग्रेजों से लोहा लेते रहे। परंतु अलवर के जंगलों में एक रात एक विश्वासघाती देशवासी ने तात्या टोपे को सोते हुए पकड़वा दिया। 18 अप्रैल को उन्हें फांसी दे दी गई। 1857 की क्रांति की वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने बुंदेलखंड, ग्वालियर आदि जगहों पर अपनी अद्भूत रण कौशल से अँग्रेज सैनिकों के छक्के छुड़ा दिये और रणभूमि में लड़ते हुए वीरगति पाई। बिहार में जगदीशपुर के जमींदार वीर कुवर सिंह ने अँग्रेजों से घमासान युद्ध किया। बुढ़े होने के बावजूद अँग्रेजों से लगातार युद्ध करते हुए कई जगहों पर अंग्रेजों को मात दी। स्पष्ट है कि 1857 विद्रोह लखनऊ, कानपुर, दिल्ली से लेकर बिहार तक कई शहरों और क्षेत्रों में फैला था।

परंतु 1857 की क्रांति के स्वरूप के संबंध में विद्वानों के बीच मतैक्य नहीं है। कुछ लोग इसे मात्र सैनिकों का विद्रोह मानते हैं; परंतु अन्य इसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं। नेहरू के अनुसार, यह केवल एक सैनिक विद्रोह नहीं था, यह शीघ्र ही फैल गया तथा इसने जन-विद्रोह और भारतीय स्वाधीनता के संग्राम का रूप धारण कर लिया। लेकिन सर जॉन सीले के शब्दों में यह केवल सैनिक विद्रोह था। छ

यह एक निर्विवाद सत्य है कि 1757 के प्लासी के युद्ध और 1857 की क्रांति के बीच इतना कुछ घटा कि इसे मात्र घ् सिपाही विद्रोह ' कहना उचित नहीं है। सन्यासियों का विद्रोह, विजयनगरम् के राजा, उड़ीसा के जमींदारों, गुजरात के कोलियों, सौराष्ट्र के सरदारों, जबलपुर के बुंदेलों, आदिवासी कोलों, संथालों, मुंडाओं का विद्रोह तथा तमिलनाडु, आंघ्र, विलासपुर, महाराष्ट्र, कोल्हापुर, सतारा, पश्चिमी यु.पी., हरियाणा कित्तुर आदि स्थलों पर हुए विद्रोहों से इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि यह सिर्फ सिपाही विद्रोह नहीं था। इसमें राजे-रजबाड़े-नबाव तो थे ही, उसमें मजूदर थे, किसान थे, जमींदार थे, आदिवासी थे और महिलाएँ भी बड़ी संख्या में थीं ब्राह्मण और मुसलमान तो थे ही, अन्य जातियों के लोग भी कम नहीं थे। समभी जातियों के लोग जाति, मजहब, संप्रदाय, धर्म से ऊपर उठकर अपने देश के लिए ब्रिटिश शासक के विरूद्ध युद्ध की आग में कूदे थे। यह स्वाधीनता संग्राम हिंदु-मुस्लिम एकता की अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत करता है। ब्रिटिश प्रधान मंतिरी डिजरायली ने भी स्वीकार किया था कि 1857 का विद्रोह केवल सैनिक विद्रोह नहीं, बल्कि इससे कुछ और ज्यादा था। अभिनव भारत क्रांति संस्था के प्रमुख विनायक दामोदर सावरकर ने गुप्त रूप से ब्रिटिश लाइब्रे से प्राप्त तथ्यों के आधर पर घ् भारतीय स्वतंत्रता का युद्ध ' शीर्षक पुस्तक में इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ही स्वीकार किया। अशोक महेता ने भी अपनी पुस्तक में 1857 के विद्रोह की राष्ट्रीय विशेषताओं का उल्लेख किया है। लार्ड सेलिसबरी ने भी हाउस ऑफ कॉमन्स में कहा था कि, च् वह यह मानने को तैयार नहीं कि ऐसा व्यापक तथा शक्तिशाली आंदोलन चर्बीवाले कारतूस को लेकर हो सकता था। छ वस्तुतः विद्रोह की पृष्ठभूमि में कुछ अधिक बातें थी। भारत का आर्थिक शोषण कर इंग्लैंड को समृद्ध बनाने की ब्रिटिश नीति को भारतीय समझ गये थे और इसी का परिणाम था 1857 का विद्रोह।

यद्यपि यह सच है कि 1857 का विद्रोह एक सुव्यवस्थित रणनीति और राष्ट्रीय चेतना के तहत प्रारंभ नहीं की गया था फिर भी यह विदेशी सत्ता के विरूद्ध मुक्ति संघर्ष ही थी जिसने कम्पनी राज्य की नींव हिला दी और ब्रिटिश सरकार को एक सुसंगठित शासन व्यवस्था की स्थापना के लिए सोने को विवश कर दिया। फलस्वरूप भारतीय शासन ब्रिटिश पार्लियामेंट के हाथ में चली गई। गवर्नर जनरल को वाइसराय कहा जाने लगा। ब्रिटिश सैनिकों की संख्या बढ़ाकर भारतीय सैनिकों की संख्या घटा दी गई और तोपखाने अँग्रेज सैनिकों के हाथ में रखे गये। इस तरह 1857 की क्राति में भारतीयों को ज्यादा नुकशान ही हुआ परंतु राष्ट्रहीत में इसके कुछ लाभ भी हुए। इसने भारत को अनेक संघों से मुक्त कर दिया। ब्रिटिश सरकार देश की आंतरिक दशा को सुधारने के लिए विवश हो गयी। महारानी विक्टोरिया की ओर ए एक महत्त्वपूर्ण राजकीय घोषणा की गई जिसकी भाषा से उदार हृदयशीलता, न्यायप्रियता और मित्रता का आभास होता था।

इस महान क्राति के बाद ही देश में संवैधानिक विकास का सूत्रपात हुआ और धीरे-धीरे देशवासियों को शासन में भाग लेने का अधिकार भी दिया जाने लगा। सबसे बड़ी बात यह हुई कि इसके बाद देशवासियों की आँखे खुल गयीं। क्रांति के नेताओं के दुःखद अंत ने अनेक कवियों, नाटककारों, कहानीकारों तथा लेखकों को 1857 के महान क्रांतिकारियों को शहीद के रूप में चित्रित करने की प्रेरणा दी जिससे युवकों, देशभक्तों एवं राष्ट्रवादियों को प्रेरणा मिली।

यशस्विनी कवयित्री सुभद्रकुमारी चौहान की कविता घ् खूब लड़ी मरदानी वह तो झांसीवाली रानी थी ' , स्वाधीनता आंदोलन में पर्याप्त चर्चित रही। दिनकर ने लिखा- कलम आज उनकी जय बोल। जला अस्थियाँ बारी-बारी, जिसने छिटकायी चिनगारी, चढ़ गये जो बलिदेवी पर लिये बिना गरदन का मोल। ' 1857 के महान स्वतंत्रता सेनानी वीर कुंअर सिंह पर भोजपुरी के यशस्वी कवि चन्द्रशेखर मिश्रा द्वारा घ् कुअर सिंह ' शीर्षक के रचित एक महाकाव्य कृति है जिसमें पाठक-श्रोता को मुग्ध कर देने की शक्ति है। रमाशंकर सक्सेना कृत खंडकाव्य घ् मंगल पांडे ' मंगल पाण्डे के महान बलिदान पर एक अद्भूत कृति है जिसकी प्रशंसा डॉ. राम कुमार वर्मा महादेवी वर्मा आदि प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने की है। वृंदावन लाल वर्मा का उपन्यास घ् झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ' भी विशेष ख्याति प्राप्त कृति है। अठारह सौ सत्तावन में अँग्रेजी सेना से युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त करनेवाली रामगढ़ (म.प्र.) की रानी अवन्तीबाई पर केंद्रित वृंदावनाल वर्मा की औपन्यासिक कृति घ् रामगढ़ की रानी ' में रानी की शौर्यगाथा वर्णित है।

क्रांति के स्वरूप की समीक्षा

पुस्तक : 1857 के क्रांतिकारी
भाग : 1 पेज न. 86
लेखक : डॉ. शांति लाल नागोरी, डॉ. प्रणव देव
प्रकाशक : आर बी एस ए पब्लिशर्स

कुछ चुने हुए विचार

डा. वी. ए. स्मिथ -
यह वास्तव में सत्य है कि इस गदर को आधुनिक स्वतंत्रता का पहला प्रयास मानना एक महान अन्याय है, जबकि यह अपने राजनीतिक दृष्टिकोण से रूढिवादी भारत का अन्तिम प्रयास था।

के.एल.पन्निकर -
यह सच है कि जिन लोगों का राज्य छिन गया था, जिनकी पेन्शन बन्द कर दी गई थी वे ही इस विद्रोह के नेता थे, किन्तु क्रांति का उद्धेश्य अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालकर देश में एक राष्ट्रीय राज्य की स्थापना करना था। इस दृष्टिकोण से यह गदर या विपल्व न होकर राष्ट्रीय क्रांति थी।

थोम्पसन एवं गैरेट -
यह विद्रोह एक मध्यकालीन गृह युद्ध था।

डा. सुरेन्द्रनाथ सेन -
धर्म के लिए जो लडाई आरम्भ हुई वह स्वतंत्रता संग्राम के रूप में समाप्त हुई। इस संघर्ष को धर्मात्माओ का ईसाईयों के विरूद्ध युद्ध कहा जा सकता है।

डौडवेल -
यह एक भाग्यहीन दुर्घटना मात्र थी।

लाला लाजपतराय -
भारतीय राष्ट्रवाद ने इस आंदोलन को प्रोत्साहित किया जिसके चलते इसने राष्ट्रीय और राजनीतिक रूप धारण कर लिया।

इतिहासकार हैविन्सन -
जो क्रान्ति 1857 में भडकी, वह न तो गदर ही थी और न स्वतंत्रता संग्राम ही।

मौलाना आजाद -
मुझे इस बात में गम्भीर संदेह है कि योजना बनी और आंदोलन चला। वास्तविकता यह है कि विद्रोह बहादुरशाह के लिए उतना ही आश्चर्यजनक था, जितना अंग्रेजों के लिए।

अशोक मेहता -
1857 का विद्रोह सैनिक विद्रोह की अपेक्षा बढ-चढकर था। यह समाज रूपी ज्वालामुखी का ऐसा विस्फोट था, जिसमें बहुत सी शक्तियों ने निकलने का आर्ग प्राप्त किया। इस ज्वालामुखी के फटने के बाद संपूर्ण सामाजिक चित्र बदल चुका था। विद्रोह के चिन्ह गंभीर और चमकीले थे।

श्री वी.डी.सावरकर -
यह आन्दोलन केवल सैनिकों का विपल्व मात्र नहीं था। इस आंदोलन में धर्माध्यक्षों ने ही भाग लिया वरन जनता ने भी इसमें तीव्र गति से सहयोग दिया था; कानपुर के मजदूरों ने कारखाने छोड दिए थे। जनरल हैवलॉक को गंगा पार करने के लिए नावें नहीं मिली थी। मुगल सम्राट ने गौहत्या बन्द कर दी थी। ऐसी परिस्थिति में यह एक राष्ट्रीय आंदोलन था और क्योंकि विदेशियों को बाहर निकालकर देश को स्वतंत्र करना था, अत: यह देश का स्वतंत्रता संग्राम था।

प.जवाहरलाल नेहरू -
यह पुरानी व्यवस्था के ऊपर नयी व्यवस्था की जीत थी।

दादा भाई नौराजी -
भारतीय जनता ने न तो केवल इसमें भाग ही लिया, अपितु अधिकारियों के कहने पर वे अपितु अधिकारियों के कहने पर वे अंग्रेजी सरकार को सहायता देने के लिए भी पूरे तैयार थे। यह सिर्फ सैनिकों, मुसलमानों, व सामन्तों का विद्रोह था, आम जनता का नहीं।

डा. आर.सी.मजूमदार -
कुल मिलाकर इस निष्कर्ष से हटना कठिन है कि 1857 ई. में तथाकथित प्रथम स्वतंत्रता संग्राम न तो प्रथम, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था।

क्रांति १८५७

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