क्रांति १८५७
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झांसी की रानी का ध्वज

स्वाधीन भारत की प्रथम क्रांति की 150वीं वर्षगांठ पर शहीदों को नमन
वर्तमान भारत का ध्वज
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क्रांति १८५७
 

प्रस्तावना

  रुपरेखा
  1857 से पहले का इतिहास
  मुख्य कारण
  शुरुआत
  क्रान्ति का फैलाव
  कुछ महत्तवपूर्ण तथ्य
  ब्रिटिश आफ़िसर्स
  अंग्रेजो के अत्याचार
  प्रमुख तारीखें
  असफलता के कारण
  परिणाम
  कविता, नारे, दोहे
  संदर्भ

विश्लेषण व अनुसंधान

  फ़ूट डालों और राज करो
  साम,दाम, दण्ड भेद की नीति
  ब्रिटिश समर्थक भारतीय
  षडयंत्र, रणनीतिया व योजनाए
  इतिहासकारो व विद्वानों की राय में क्रांति 1857
  1857 से संबंधित साहित्य, उपन्यास नाटक इत्यादि
  अंग्रेजों के बनाए गए अनुपयोगी कानून
  अंग्रेजों द्वारा लूट कर ले जायी गयी वस्तुए

1857 के बाद

  1857-1947 के संघर्ष की गाथा
  1857-1947 तक के क्रांतिकारी
  आजादी के दिन समाचार पत्रों में स्वतंत्रता की खबरे
  1947-2007 में ब्रिटेन के साथ संबंध

वर्तमान परिपेक्ष्य

  भारत व ब्रिटेन के संबंध
  वर्तमान में ब्रिटेन के गुलाम देश
  कॉमन वेल्थ का वर्तमान में औचित्य
  2007-2057 की चुनौतियाँ
  क्रान्ति व वर्तमान भारत

वृहत्तर भारत का नक्शा

 
 
चित्र प्रर्दशनी
 
 

क्रांतिकारियों की सूची

  नाना साहब पेशवा
  तात्या टोपे
  बाबु कुंवर सिंह
  बहादुर शाह जफ़र
  मंगल पाण्डेय
  मौंलवी अहमद शाह
  अजीमुल्ला खाँ
  फ़कीरचंद जैन
  लाला हुकुमचंद जैन
  अमरचंद बांठिया
 

झवेर भाई पटेल

 

जोधा माणेक

 

बापू माणेक

 

भोजा माणेक

 

रेवा माणेक

 

रणमल माणेक

 

दीपा माणेक

 

सैयद अली

 

ठाकुर सूरजमल

 

गरबड़दास

 

मगनदास वाणिया

 

जेठा माधव

 

बापू गायकवाड़

 

निहालचंद जवेरी

 

तोरदान खान

 

उदमीराम

 

ठाकुर किशोर सिंह, रघुनाथ राव

 

तिलका माँझी

 

देवी सिंह, सरजू प्रसाद सिंह

 

नरपति सिंह

 

वीर नारायण सिंह

 

नाहर सिंह

 

सआदत खाँ

 

सुरेन्द्र साय

 

जगत सेठ राम जी दास गुड वाला

 

ठाकुर रणमतसिंह

 

रंगो बापू जी

 

भास्कर राव बाबा साहब नरगंुदकर

 

वासुदेव बलवंत फड़कें

 

मौलवी अहमदुल्ला

 

लाल जयदयाल

 

ठाकुर कुशाल सिंह

 

लाला मटोलचन्द

 

रिचर्ड विलियम्स

 

पीर अली

 

वलीदाद खाँ

 

वारिस अली

 

अमर सिंह

 

बंसुरिया बाबा

 

गौड़ राजा शंकर शाह

 

जौधारा सिंह

 

राणा बेनी माधोसिंह

 

राजस्थान के क्रांतिकारी

 

वृन्दावन तिवारी

 

महाराणा बख्तावर सिंह

 

ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव

क्रांतिकारी महिलाए

  1857 की कुछ भूली बिसरी क्रांतिकारी वीरांगनाएँ
  रानी लक्ष्मी बाई
 

बेगम ह्जरत महल

 

रानी द्रोपदी बाई

 

रानी ईश्‍वरी कुमारी

 

चौहान रानी

 

अवंतिका बाई लोधो

 

महारानी तपस्विनी

 

ऊदा देवी

 

बालिका मैना

 

वीरांगना झलकारी देवी

 

तोपख़ाने की कमांडर जूही

 

पराक्रमी मुन्दर

 

रानी हिंडोरिया

 

रानी तेजबाई

 

जैतपुर की रानी

 

नर्तकी अजीजन

 

ईश्वरी पाण्डेय

 
 

महाराष्ट्र

 

पुस्तक: - 1857 के स्वाधीनता संग्राम में दक्षिण भारत का योगदान
लेखक: - डॉ. वा. द. दिवेकर
अनुवादक: - डॉ. कैलाश शकर कुलश्रेष्ठ
प्रकाशन: - भारतीय इतिहास संकलन समिति, ब्रज प्रान्त

आधुनिक महाराष्ट्र के एक दर्जन से अधिक स्थानों पर सैनिक व स्थानीय व्यक्तियों ने इस सघंर्ष में भाग लिया। जहां समूचे दक्षिण भारत में नाना साहेब ने इस सघंर्ष का नेतृत्त्व किया वहां रंगाबापू गुप्ते महाराष्ट्र में इसके प्रमुख नायक थे। ये जैसा एस. एन. सेन ने गलत लिखा कोई च्चपरासीछ न थे बल्कि नायक 1840 में सतारा के राजा प्रतापसिंह के वकील के रुप में इंग्लैण्ड गये थे तथा 14 वर्षो बाद मुकद्दमे से निराश, परन्तु अंग्रेजों के विरुद्ध सघंर्ष की भावना से लौटे थे। उन्होंने अग्रेजों के विरू द्ध सतारा व कोल्हापुर में सेना भर्ती करवाई थी। सरकार ने उनको गिरफ़्तार किया।

पूना गतिविधि का केन्द्र था। नाना साहेब का वहां के व्यक्त्तियों से निरन्तर पत्र व्यवहार होता था। 22 मई 1857 को नगर की जामा मस्जिद में  अंग्रेजों के विरू द्ध, दिल्ली की भारतीय सेनाओं के लिये दुआयें की गई थीं। नाना साहेब के घोषणा पत्र की प्रतिलिपि ( मराठी भाषा में ) महाविद्यालय तथा वाचनालय में चिपकाई गई। कोल्हापुर में क्रमशः 12 जून, 13 जून, 23 जून व 2 अगस्त को सैनिक विद्रोह हुए। 2 अगस्त को 27 वीं पैदल सेना की पल्टन ने सैनिकों को निशस्त्र कर दिया गया। बम्बई की फ़ौजी पल्टन ने भी विद्रोह की तैयारी की। विद्रोह की तिथि पहले 30 अगस्त, लेकिन बाद में 15 अक्टूबर कर दी गई। योजक सैयद हुसैन व मंगल को पकड़कर सरे आम तोप से उडा दिया गया। इस भांति संघर्ष नासिक, रत्नगिरी, बीजापुर, औरंगाबाद, अहमदनगर आदि में हुए।


सतारा

रंगो बापू जी की सतारा में राष् ट्रव्यापी सशस्त्र संघर्ष की तैयारियाँ

दिसम्बर 1856

1854 : रंगो बापूजी इंग्लैंड से सतारा निराश लौटते हैं।
1855 : अक्टूबर-उनकी अपनी अंतिम प्रार्थना राज्यपाल मुंबई के समक्ष निवेदित।
1856 : दिसम्बर सेना के लिये मनुष्यों की भर्ती।
1857 : 10 जून - सतारा पर कूंच।
5 जुलाई - रंगो बापूजी का बचकर निकल जाना।
13 जुलाई - पंढरपुर पर आक्रमण।

10 फरवरी, 1818 को मराठों के अंतर्गत किला ब्रिटिश सेना को अर्पित कर दिया गया। 1835 से, सतारा के राजा प्रताप सिंह ने उसी वर्ष, ब्रिटिश शक्ति को उलट देने के लिये, अपने मंत्री गोविंद राव के माध्यम से ब्रिटिश पलटन के सतारा स्थित फौजियों से सीधे सम्पर्क साधकर, त्वरित शीघ्रता से योजना निर्माण प्रारम्भ कर दिया। 8 सितम्बर 1836 को, ब्रिटिश पलटन के दो सूबेदार शेख गुलाम सिंह और गुलज़ार मिस्सर वेष-परिवर्तन में राजा के पास बुलाये गये, जिन्होंने उन्हें अवगत करा दिया कि बलवे जो मुंबई और बेलगाँव में होने वाले हैं, उसके लिये संकेत मिल गये हैं तथा हैदराबाद आदि से सतारा को फौज का पदार्पण हो रहा है। 10 अक्टूम्बर 1836 को ब्रिटिश सरकार ने षडयंत्र की सीमाओं का पता लगाने और राजा के उनसे सम्पर्क का पता लगाने को आयोग बिठाया व आयोग ने ज्ञात किया कि प्रताप सिंह ने ब्रिटिश पलटन के भारतीय सिपाहियों को जाग्रत होने के लिये प्रार्थना करते हुये पत्र भेजे थे। आयोग के अनुसार योजना का जाल दिल्ली, ग्वालियर, नागपुर, हैदराबाद, मुंबई, बेलगाँव, गोआ आदि को अपने अंतर्गत लेने के लिये फैला हुआ था। प्रताप सिंह ने रूस तक से पत्र-व्यवहार की सोची थी। इससे पूर्व गोआ सरकार का प्रतिनिधि जिसका नाम 'ऐरकुलानों देतोरा' था वह आक्रमण और रक्षा शर्तों के आदान-प्रदान के लिये, पुर्तगाली सरकार से ब्रिटिश सरकार के विपरीत संधि के लिये सतारा गया था। इस प्रकार के आयोग के कार्यों के द्वारा रहस्य खुलने से ब्रिटिश सरकार ने 5 सितम्बर 1839 को प्रताप सिंह को राज्य से वंचित कर बनारस के लिये निर्वासित कर दिया और सतारा की गद्दी पर प्रताप सिंह के भाई शाहजी को बिठाया। प्रताप सिंह बनारस में 1847 में परलोक सिधार गये। शाहजी ने एक पुत्र को गोद लिया, नाम था 'बैंकोजी'। शाहजी की मृत्यु 5 अप्रेल 1848 को हो गई और 1 मई 1849 को सतारा का क्षेत्र दण्डाधिकरण स्वरूप ब्रिटिश सरकार को मिल गया ।

प्रताप सिंह के निर्वसन एवं पीड़ा पहुँचाने से जनता में गंभीर असंतोष उठ खड़ा हुआ और जिसके फलस्वरूप समस्त सतारा क्षेत्र में कराड के धारराव पंवार के नेतृत्व में उभार आ गया। नरसिंग पेटकर राज द्रोहियों के दूसरे नेता थे। रामचंद्र खण्डेराव साटवे ने 1840 में ब्रिटिश सेना पलटन के व्यक्तियों को जो पुणे में रह रहे थे, उकसाने का प्रयत्न किया ।

प्रताप सिंह के द्वारा रंगो बापूजी गुप्ते के पहले इंग्लैंड सतारा के अभियोग की वकालत करने के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने के लिये भेजा गया। वे वहाँ अधिकारी वर्ग के अनेक व्यक्तियों से तथा ब्रिटिश सांसदों से मिले। वहाँ 14 वर्ष तक रहने के पश्चात्, वे सतारा 1854 में निराश लौट आये। उनका इंग्लैंड अभियान असफल रहा। जब वे लौटे, प्रताप सिंह निर्वासित और अधिकार वंचित स्थिति में मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। सतारा क्षेत्र स्वत: दण्ड स्वरूप हड़प कर लिया गया। इस पर रंगो बापूजी ने दृढ़ निश्चय किया कि सतारा की गद्दी को सभी साधनों से प्राप्त करेंगे। उन्होंने नाना साहिब पेशवा से सम्पर्क स्थापित किये, जिसके स्वमेव प्रतिनिधि अजीमुल्लाह खाँ ने इसी प्रकार से सभी प्राप्य संवैधानिक साधनों से व्यर्थ प्रयत्न किये थे और इस प्रकार के शांतिपूर्ण साधनों से न्याय प्राप्ति की आशायें खो चुकी थी। रंगो बापूजी ने सतारा अभियोग के विषय में अपना अंतिम प्रार्थना पत्र 'लार्ड जॉन एलफिंस्टन' मुंबई के गर्वनर को भेजा जिसका कोई सकारात्मक प्रतिफल न निकला। जब वह इंग्लैंड से लौटे, वह ब्रिटिश शासन के विपरीत स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने की सोच रहे थे। लौटने के पश्चात् उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि इंग्लैंड के रूस से खींचें हुये संबंध, इस प्रकार से युद्ध छेड़ने के सुयोग्य अवसर प्रदान करता है। उसने यह भी स्वीकार किया कि दक्षिण के सारे लोगों की आँखें सतारा पर लगी हैं, तो सदियों युगीन मराठा शक्ति की गद्दी, स्वमेव ब्रिटिश की दासता से मुक्त होनी चाहिये ।

इसी मध्य, 1856 में अंताजी राजे शिर्के उपनाम (उर्फ) बुवा साहेब, सतारा पुलिस के प्रमुख, सतारा राज परिवार के सम्पर्क संघटन में तथा अन्य के साथ ब्रिटिश शक्ति को उखाड़ फेंकने के लिये 40, 000 रोहिलों को सतारा लाने की योजना निर्मित की। सामान्य विकास बलवा विकास के लिये शीघ्रति-शीघ्र दिसम्बर 1856 में सतारा। संघठित होने लगीं। इस प्रकार, इन प्रयत्नों से कुछ नेताओं की असफलताओं के कारण कुछ भी ठोस आधार प्राप्त न हो सका अथवा उसको दूसरू सैन्यदल उचित क्षण में प्राप्त हो जाता ।

दिसम्बर 1856 में रंगोजी ने रंगरूट भर्ती करना प्रारम्भ कर दिया। जैसे ही ब्रिटिश फौज की नियमित सेना में चर्बीयुक्त कारतूस का बाद में प्रयोग हुआ, भारतीय सिपाहियों की भावनाओं को उभारने के लिये अपील की गई। जब मान्गों, रामोशिसों, कोलियों तथा अन्य को स्वराज्य सेना के लिये भर्ती किया गया, तो कहा गया कि आर्ले की देवी नागाई देवी ने यह भविष्यवाणी की है कि उस वर्ष 1857 में ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध अवश्य ही बलवा होगा और मुंबई ब्रिटिश गर्वनर स्वयं सतारा की गद्दी के प्रति ईस्ट इंडिया कम्पनी के द्वारा मुंबई में किये गये अन्याय के प्रति आश्‍वस्त था और इस प्रकार रंगो बापूजी के उत्थान के पक्ष में था ।

अप्रैल-मई 1857 में रंगो बापूजी ने भारतीय सैन्य दलों को सतारा के अतिरिक्त कोल्हापुर, बेलगाँव और धारवाड़ में उत्तेजित करने का प्रबन्ध कर लिया। इस काल के मध्य छः सप्ताह के लिये वह स्वयं सतारा किले के पीछे पार्ली क्षेत्र में रहे और वहीं से कार्य संचालन किया। मई 1857 के अन्त तक हमले की सब तैयारियाँ पूर्ण होने वाली थीं। तब तक सुने हथियारों से सुसज्जित मनुष्यों का विशाल समूह एकत्रित कर लिया जो सतारा और भोर क्षेत्रों में अन्यत्र स्थानों पर छा गये। पन्त सचिव भोर के प्रमुख ने रंगो बापूजी को विभिन्न रूपों में सहायता प्रदान की। एक समय में सतारा यवेतश्वर और महाबलेश्वर पर तत्काल हमला करके सभी युरोपवासियों को उन स्थानों पर मार डालने की और सतारा के खजाने को कब्जा कर लेने की तथा उस शहर को हथियाने की योजना थी। रंगो बापूजी ने मनुष्यों में संदेश भिजवाने का प्रबंध कर लिया था कि भारत के अन्य भागों में स्वतंत्रता युद्ध चल रहा है ।

किसी प्रकार, मई 1857 में राष्ट्र संघटन सतारा में अभी युद्ध सामग्री की कमी थी, यद्यपि भोर में बड़ी मात्रा में बारूद, शीशा और तोप के गोले एकत्रित थे। दो हजार व्यक्ति हमले के परीक्षण के लिये प्रस्तुत थे। भोर के पन्त सचिव तथा कुछ अन्य प्रदेशों के प्रमुख इस योजना में संलिप्त थे। राजा प्रताप सिंह के परिवार के सदस्य, जो कि पुराने महल में रह रहे थे, इस योजना में निकटता से जुड़े थे। शाहू, प्रताप सिंह गोद लिया पुत्र और दुर्गसंग, वाला साहेब सेनापति सतारा की फौज के सेनानायक, का गोद लिया हुआ बेटा, आक्रमण का नेतृत्व करने वाले थे। अन्ताजी राजे शिर्के सतारा ब्रिटिश पुलिस के प्रमुख स्थानीय पुलिस को बलवे के दौरान नकारात्मक रखने वाले थे। इस बात के प्रबन्ध कर लिये गये थे कि सतारा जेल के फाटक प्रभावित रूप से खुले रखे जायें और 300 कैदियों को मारा जाने दिया जायें ।

10 जून, 1857 को सशस्त्र व्यक्ति भोर के समीप एक गाँव बागर बाड़ी में एकत्रित हुये जिन्होंने सतारा के लिये कूच किया। ब्रिटिश सैन्य दल सतारा में टिक गये और उन्हें आज्ञा दी गई कि वे उन्हें अवरुद्ध करें। मुठभेड़ में अनुसरिणित हुए देशभक्त दल के 13 व्यक्ति पकड़ लिये गये ।

12 जून को एक राजपूत "मानसिंह परदेशी" जो कि सतारा के न्यायाधीश की अदालत में सन्देश वाहक का कार्य करते थे, सतारा की नियत टुकड़ी को स्थानीय पैदल सेना क्षेत्र में इस दोषारोपण के साथ पकड़ लिया गया कि वह छावनी में विद्रोह करने का प्रयत्न कर रहे थे। ब्रिटिश मजिस्ट्रेट रोज ने विशेष आयोग के द्वारा उस पर मुकद्दमा चलाया और मृत्युदण्ड के घोषणा के पश्चात् 20 जून 1857 को उन्हे जन साधारण के समक्ष फांसी दी गई। उनकी गिरफ्तारी के तत्पश्चात् अत्यधिक जांच से ब्रिटिश हुकूमत ने सतारा में बलवे की योजना ढूंढ निकाली और एक विशाल जन समूह को जो इस योजना में निर्लिप्त थे गिरफ्तार कर लिया। 27 अगस्त 1857 को ब्रिटिश सरकार के द्वारा विशेष आयोग नियुक्त हुआ जो 17 व्यक्तियों पर मुकद्दमा चलाने के लिये बैठा जिन्होंने कि इस विद्रोह में अग्रिम रूप से भाग लिया था। अभियोग 7 सितम्बर तक चला और सभी सत्रहों व्यक्तियों को आरोपित किया गया और 8 सितम्बर 1857 को फांसी पर लटका दिया गया। आयोग ने फैसला सुनाने से पूर्व यह निरूपित किया कि 'विचारणीय विद्रोह वास्तविक रूप में, सामाजिक दूरदर्शिता की चेतावनी के कारण भी घटित नहीं हुई, जिसने अधिकारियों को सावधान कर दिया और चेतावनी के अगले दिन, एक षड़यंत्रकारी मानसिंह की गिरफ्तारी 12 जून को हुई। अभियोजन ने बहुत सारे गवाह (साक्ष) प्रस्तुत किये और उनमें से बहुतों ने षड़यंत्र में महत्तवपूर्ण भाग लिया था, बाद में कुछ व्यक्तियों बापू, सुजानियाँ और बाबुन पर चार्ल्स फोर्बस आयुक्त के समक्ष इस आरोप के साथ कि उन्होंने रंगो बापू जी गुप्ते और अन्य व्यक्तियों के साथ ईस्ट इंडिया कम्पनी की सरकार के विरुद्ध युद्ध रचने की साजिश की, विशेष कार्यवाही की गई। नवम्बर को फैसले के आधार पर तीनों को समुद्र पार जीवन निर्वसन की सजा सुना दी गई ।"

इसी मध्य सोमवार के दुपहर बाद (अपराह्न) 13 जुलाई 1857 को देश भक्त सैन्य बलों ने पंढपुर के 'मामलात दार' के कोषागार के कार्यालय पर हमला कर दिया जब वह जिले में था। इस उद्देश्य के साथ कि वे आगे मुंबई से पूर्वी जिले निजाम के क्षेत्र से लगते थे, हमला कर दिया। नागेश राघवेंद्र, पंढपरपुर के मामलातदार, और शेख कासिम व शेख हुसेन चपरासी हमले में मारे गये। 6 क्रांतिकारी नेताओं में से दो, जिन्होंने हमले किए थे, भिड़ंत में मारे गये। 30 जुलाई से 3 अगस्त 1857 तक सतारा का आयुक्त 'जॉन नगेन्ट' के अदालत में आक्रमणकारी अपराधी घोषित हुआ। उनमें से 6 को 4 अगस्त, 1857 को 7 बजे बन्दूक से उड़ा देने का मृत्यु दण्ड दिया गया; चार को समुद्र पार प्राकृतिक-जीवन भर देश निकाला दे दिया गया और एक 'कान्या येलू ' (माँग, आयु 50 वर्ष, पंढरपुर कुर्ती तालुके का मजदूर) छोड़ दिया गया ।

3 अगस्त 1857 को जे. एन. रोज ने अपने निर्णित फैसले के अन्त में यह निरुपति किया कि कैदी जिन्हें मृत्युदंड की सजा भुगतनी है, उन्हें बन्दूकों से उङा देना चाहिये क्योंकि प्राप्य फांसी की रस्सियाँ एक से अधिक अपराधियों को एक ही समय में लटकाने की क्षमता नहीं रखतीं और आवश्यकतानुसार माप के फंदे तैयार करनें में काफी परेशानी और देर होगी और देश की वर्तमान दशा में यह वांछनीय है कि दण्ड से प्रयुक्त होना चाहिये कि वह प्रभावशाली उदाहरण प्रस्तुत करें। बाद में हरिवीरु चह्वाण 8 मई 1858 को पकड लिया गया। कन्हैयालाल तथा अन्य के साथ मिलकर मामलतदार थाना पंढरापुर 13 जुलाई 1857 को हमला करने के अभियोग पर उसे लेफ्टीनेण्ट सेन्डफोर्ड प्रथम सहायक मजिस्ट्रेट सतारा 10 जुलाई 1858 को दोषारोपरण करके जीवन-पर्यन्त निर्वासित कर दिया।

एक प्रार्थना पत्र में जो फरवरी 1858 में ब्रिटिश सरकार को दिया गया। किसन सन्तुराम की माता भवानी बाई जिन्हें निवर्सित कर दिया गया था, व्यक्त किया गया, "मुझे व मेरे इकलौते बेटे को पुर्नस्थापित कीजिये, मुझे सहायता देने वाला कोई व्यक्ति नहीं है अथवा यह भी आप पर आधारित है कि मुंबई सरकार मुझे मेरे पुत्र के साथ भेज दे। मैं मृत्यु के समीप पहुँच रही हूँ। (मुंबई पी.डी.ग्रंथ 21, 1858 पृष्ठ 171) उनका प्रार्थना पत्र ठुकरा दिया गया। 6 अगस्त 1857 को ब्रिटिश हुकूमत के आदेश पर शाह प्रताप सिंह का गोद लिया पुत्र, राजसवाई प्रताप सिंह की विधवा, शाहु की सगी माता, वाला साहेब सेनापति व सतारा के फौज के सेनानायक के गोद लिये बेटे काका साहेब, प्रताप सिंह के चाचा गिरफ्तार कर लिये गये व एकांतवास के लिये (वूचर आइलैण्ड) मुंबई के बन्दरगाह में भेज दिए गए। 6 अगस्त की | प्रातःकालीन वेला में सतारा महल की तरफ तोपों के मुँह करने राज परिवार के बन्दियों को बन्द गाडियों में ले जाया गया। मार्च 1858 में उन्हें आगे करांची सिन्ध ले जाया गया, उसके बाद उन्हें केवल 1885 में 28 वर्ष के भयावने अवरोधित देशान्तरित जीवन के पश्चात् वेंकोजी, शाहजी का गोद लिया बेटा और प्रताप सिंह के भतीजे को पहले सूरत, अहमदाबाद, गुजरात 1859 में ले गया और उसके बाद 1860 में अहमदनगर जेल में भेजा गया जहाँ वह 1864 में मृत्यु को प्राप्त हो गए।

अगस्त 1857 में ब्रिटिश सरकार ने, जैसे अन्य जिलों के विषय में किया, आज्ञा दी कि सतारा जिले को शस्त्र विहीन कर दिया जाये। जून 1858 तक 32,000 से अधिक आग्नेयास्त्र जब्त कर लिये गये और सतारा जिलें में 130 तोपें नष्ट कर दी गई।

प्रमुख नेता
रंगो बापूजी गुप्ते-

1800 ई. के लगभग पैदा हुये, बापूजी रामाजी के सुपुत्र, प्रभु; (भोर में) कारी के निवासी; सर्वाधिक निस्वार्थ नेता जिन्होंने गद्दी को प्राप्त करने का अथक प्रयास किया; जून 1840 में लन्दन पहुँचे; इंग्लैंड में राजा सतारा के समक्ष तथा सांसदो के समक्ष अभियोग प्रस्तुत किया; विभिन्न स्थानों पर जनता को सम्बोधित किया परन्तु वे अपने उदे्‌दश्य में असफल रहे और 1854 में सतारा निराश वापिस लौट आये।

उनका लन्दन में अनेकों व्यक्तियों के द्धारा सम्मान किया गया और भारत आने के अवसर पर नवम्बर 1853 में उनका जन-साधारण के द्धारा सम्मान हुआ। लन्दन में इस अवसर पर एक चाँदी की पालकी उन्हें प्रदान की गई, इस आलेख के साथ सच्चे, आदरणीय सम्मान जनक राजमान्य राजश्री सतारा के रंगों बापूजी को एक यादगार जिस पर प्रसिद्ध व्यक्तियों के जैसे जोजफ ह्राम (सांसद) जॉन बाइट (सांसद), जार्ज थॉमसन, जॉन ब्रिग्स, मेजर जनरल आर.रार्वटसन, जेम्स ग्राँटडफ तथा अन्य के हस्ताक्षर थे। रंगो बापू जी भारत में संवैधानिक तरीकों से न्याय प्राप्त करने का समस्त विश्वास खोकर इस विचार के साथ भारत आ गये कि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम युद्ध प्रारंम्भ कर दिया जाये। मुंबई में 13 मार्च 1854 में उन्होने झाँसी और नागपुर के पतन के विषय में सुना। सतारा में 1854 में लौटने के पश्चात् उन्होने युद्ध के लिये मानव, धन और वस्तुयें एकत्रित करना प्रारम्भ कर दिया और ब्रिटिश भारतीय दलों को उत्तेजित करना प्रारम्भ कर दिया था जो सतारा, कोल्हापुर, बेलगाँव तथा धारवाड में बसे थे। जुलाई 1854 से दिसम्बर 1855 तक प्रच्छन्न रुप से उत्तरी भारत के विभिन्न स्थानों पर गये और नाना साहेब पेशवा, विठूर में तात्या टोपे से मिले और ब्रिटिश सरकार के विपरीत भविष्य के कार्यक्रम पर विचार किया। रंगो बापू के सतारा प्रमुख ने कुछ नाम सम्मिलित करना प्रारम्भ किया। 22वीं पैदल पलटन के दफेदार कार खनिज सतारा के जज की अदालत के मानसिंह, कराड के दौलत पवार, कोल्हापुर के तात्या फडनिस, रामोशीस के एक नेता सत्रू रामोशी, भोर के प्रमुख सीता राम के सुपुत्र तथा अन्य व्यक्ति के अतिथि-सत्कारक। उनके व्यक्तियों को अनेकों शहरों तथा ग्रामें का रंगरुट (व्यक्ति सिपाहियों) की फौजी भर्ती के लिये भ्रमण किया। सतारा से प्रारम्भ करके रंगो बापूजी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध राष्ट्रीय युद्ध छेडने के विषय में सोचा। उनके अपने दो भतीजों अतोंनी के यशवन्तराव देश पान्डे और वामन राव देशपान्डे के अन्तर्गत 500 मावलों की एक फौज को उत्तरी भारत में भेजा जिन्होंने दिल्ली के युद्ध में 1857 में भाग लिया। ले. ग्राण्ड जेकव ने यह निरुपित किया कि रंगो बापूजी ने सतारा की स्थिति का लाभ उठाया और नाना साहेब पेशवा के साथ जुडकर और 1857-58 में एक प्रतिनिधि शक्ति बनी।

जैसे ही विप्लव के लिये रंगो बापूजी की योजना 11 जून 1857 को ब्रिटिश सरकार को ज्ञात हुई, संघटन के कुछ नेता गिरफ़्तार कर लिये गये। बापूजी को भी पकड लिया गया, पहले उन्हें रत्नागिरी जेल में रखा गया, फिर काफी दूर ग्वालियर में भेज दिया गया, परन्तु रंगो बापूजी ने किसी प्रकार ग्वालियर जेल से 5 जुलाई 1857 में निकल भागने का प्रबंध कर लिया। ब्रिटिश सरकार ने उनको पकडवाने के लिये रू. 5000/- का इनाम घोषित किया परन्तु उनका कभी भी पता तक नहीं चला और कैसी भी निश्चितता के साथ आज तक ज्ञात नहीं हुआ कि उनका अन्त कैसे हुआ। कई वर्षों के पश्चात् भारत के विभिन्न भागों में, लोगों ने सोचा कुछ जानकार साधु-संयासी जिनके संदेह युक्त भूत था, तब तक के लिये 1857 के स्वतंन्त्रता संग्राम के नेता हो सकते थे। इस प्रकार विर्धव में एक संत वैरागी दरगाह के बाबा 1857 में दिनों के बृद्ध रंगो बापूजी ही थे। उनके पुत्र सीताराम ही इस अभियोग में पकडे गए और उन्हें फांसी दी गई यह अनुभव किया जाता रहा कि रंगो बापू जी बचने के बाद कदाचित् अपने मित्र मि. ब्राउन के पास मद्रास चले गये हों, जो तेलिचती के निवासी थे और जिनसे उन्होंने दो वर्ष, बाद एक पत्र भी प्राप्त किया था। परन्तु वे सब अनुभव और रहस्य थे जो शेष काल, आज तक अनिश्चित रहे, जैसा कि नाना साहब, पेशवा साहब अन्य संग्राम सेनानियों के साथ हुआ।

अन्य विशेष व्यक्ति
सीताराम रंगराव गुप्ते

आयु लगभग 31 सालः प्रभू, निवासी (भोर का) मौजा कारी। वह सतारा के समीप अहमदावाद के ग्राम में अपने पिता रंगो बापूजी के साथ रहे। इसके अतिरिक्त भोर तथा बोरेगाँव में भी निवास किया। संगठन में दूसरे नेता केशव नीलकण्ठ चित्रे उर्फ मामा, सीताराम की माता के चचेरे भाई, ताल्लुका महद दैवले के निवासी थे। सीताराम विप्लव की सामान्य प्रबंध के (निगरानी) प्रभारी थे। जब गिरफ़्तारियाँ हो रही थी, सीताराम, माड वलबंत पटेल, बोरेगाँव के हैवाती रामोशी के साथ भाग निकले और 20 जून 1857 को कोल्हापुर पहुँचे। उस स्थिति में भी तॉत्या फडनिस ने'गडकरियों' से सीताराम से विप्लव करने के लिये सहायता की प्रार्थना की। इसी दिन (20 जून 1853) को सीताराम तथा अन्य विप्लवी तात्या फडनिस के मकान से पकड लिये गये। सीताराम को 8 सितम्बर 1857 को फांसी दे दी गई।

मानसिंह
ये परदेशी राजपूत सतारा के न्यायाधीश की अदालत के खवरची, व रंगो बापूजी के घनिष्ट साथी (सहायक) थे। इन्हेंे 22वीं पैदल पलटन के जवानों को विप्लव हितार्थ जाग्रत करने के लिये नियुक्त किया गया था परंतु वह 12 जून 1857 को पलटन के लोगों को भडकने का प्रयत्न करते हुये, छावनी क्षेत्र में ही पकड लिए गए। उन्हेंे जन-साधारण के समक्ष 20 जून 1857 को फांसी पर चढा दिया गया। जब वह फांसी के मचान पर थे, बहुत ही प्रचंड रुप से ऊँची आवाज में मौजूद व्यक्तियों को उन्होंने सम्बोधित किया कि पूर्व की अपेक्षा अब ब्रितानियों का कम प्रभुत्व हो चुका है, हिन्दु एंव मुसलमानों की संतानें उठो, भारतीय इतिहास के इस मोड़ पर केवल दर्शनार्थी मत बनो।

शहीद

प्रथम : मानसिंह परदेशी- इन्हें (जनसाधारण के समक्ष) खुले आम सतारा में 20 जून 1857 को फांसी पर चढाया गया।
द्वितीय : पंढरपुर के कोषागार और मामलातदार के कार्यालय पर 13 जुलाई 1857 को आक्रमण हुआ। सतारा में 4 अगस्त 1857 को प्रात: 7 बजे मृत्यु दण्ड के स्वरुप, तोप से उडा दिया गया और उनकी जायदाद जब्त कर ली गई।
कन्हैयालाल जगन्नाथ मिश्र उर्फ पान्डे (कनौजी ब्राह्राण : आयु 28 वर्ष, व्यवसाय हथियार पहुँचाना, निजाम क्षेत्र में बुर्दापुर निवास स्थान)।
किशनलाल जगन्नाथ मिश्र उर्फ पान्डे
(कनौजी ब्राह्राण : आयु 26 वर्ष, शस्त्र-वाहक, निवासी बुर्दापुर)
इमराव तुलजाराम परदेशी
(राजपुर : आयु 20 वर्ष, सेवक, निवासी जोगाईचे, अम्बा)
सीताराम प्रसाद रामप्रसाद शुकुल
(कनौजी ब्राह्राण, आयु 21 वर्ष, सेवक, निवासी अक्कल कोट)
पीराजी अप्पा पवार
(मराठा, आयु 28 वर्ष, किसान, निवासी कुसुर जिला शोलापुर)

तृतीय राजद्रोह का मुकद्दमा:- यह विशेष अदालत के समक्ष चला जिसमें सी. फोर्वज अध्यक्ष तथा जी. मेल्कम एवं जे. रोज सदस्य के रूप में बैठे और सतारा में 27 अगस्त से 7 सितम्बर 1857 तक ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार के विरुद्ध युद्ध छेडने के अभियोजन के परीक्षण हेतु चली। सत्रह व्यक्तियों का अभियोगी परीक्षण हुआ। सभी को मृत्यु दंड सुनाया गया और सभी की जमीन-जायदाद छीन ली गई और 8 सितम्बर 1857 को गेंडामाल सतारा में फांसी दे दी गई।

फांसी की सजा के आदेश प्राप्त कर्ता :
नारायण, उर्फ नाना बापूजी पवासकर
(सुनार : फौज के लिये गोलियाँ के निर्माणकर्ता)
केशव उर्फ अण्णा मामा नीलकंठ चित्रे :
(रंगो बापूजी के साले)
शिवराम मोरेश्वर कुल्कर्णी, बहुश्रुत
(विप्लव के लिये माँगों का संघटक)
विछल कोण्डी वाकनिस
(रंगो बापू जी के सुपुत्र)

तोप द्वारा उडाये जाने के आदेश प्राप्तकर्ता :
मानोजी उर्फ बापू नारायण बाबर, उर्फ मान्डिरगे
सखाराम बलबंत चव्हाण
बाविया नाथिया गायकवाड, मांग
यज्ञ नायिका गायकवाड, मांग
राणेश सखाराम कारखानिस
माना उमाजी मडके

फौजी सिपाहियों की बन्दूकों से मारने के आदेश :
रामसिंह जी उर्फ रामसिंह, बापूजी चव्हाण
बाबिया रंगो शिरे तोडे, रामोशी
नामिया नायक चव्हाण
शिवा सोमाजी पटोले, रामोशी
पार्वती विठ्टोजी, उर्फ गणेश शालुका
पल्टू येशू घाटगे

गोपाल राव दलवी, खेड
(ब्रिटिश के चरा पकडे जाने पर जून 1857 में आत्म हत्या की।)
वेन्कोजी (राजा प्रताप सिंह का भतीजा)
(अहमद नगर जेल में 1864 में मृत्यु हुई)

कैदी
देशान्तरित
(अ) 6-8-1857 को करांची देशान्तरण
शाहू (राजा प्रताप सिंह के गोद लिए गए पुत्र)
राजस वाई (प्रताप सिंह की पत्नी)
गुणवन्डता वाई (शाहू की वास्तविक माता)
दुर्गा सिंह (वाला साहेब सेनापति सतारा के मुख्य नायक के गोद लिए गए पुत्र)
काका साहेब (सरदार अन्ताजी राजे शिरके)
सतारा के प्रमुख पुलिस अधिकारी)

(ब) वेन्कोजी (प्रताप सिंह के भतीजे जो 1859 में सूरत। अहमदाबाद को देशान्तरित किए गए, तत्पश्चात् अहमद नगर जेल में 1860 में भेज दिए गए, जहाँ वह 1864 में मर गए)

निर्वासित
(अ) जीवन पर्यन्त निर्वसन के लिये आदेशित, मामलात दार के कार्यालय तथा राजकीय कोषागार पर आक्रमण के कारण तथा 13-7-1857 को पंढारपुर की मारधाड के कारण)
किसन सन्तुरमा (कनौजी बाह्राण, आयु 16 वर्ष, अहमद नगर - सेवक)
कन्हैया बेलुदी (माँग)
धर्मात्मा सुमाना (बहरी, आयु 20 वर्ष नाई, पंढारपुर)
गणु बापू चव्हाण (रामोशी, आयु 25 वर्ष, किसान, मौजा गढेगाँव, तालुका पंढारपुर के चौकीदार)
यादव पटलू बागल (मराठा, 26 वर्ष, किसान, मौजा गढेगाँव, तालुका पंढारपुर)
हरी वीरु चल्हाल (रामोसी, आयु 30 वर्ष, मौजे वारकुट, तालुका खाटन, सतारा के चौकीदार)

जीवन पर्यंत निर्वसन आदेश- 7 नवम्बर 1857 को रंगो बापूजी द्वारा ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध युद्ध खडा करने के अभियोग में) बापू नारोजी थोरात (मराठा, आयु 30 वर्ष सतारा में अदालत के चपरासी) सुजन्य सत्रु (मांग, आयु 40 वर्ष, शिवन्दी चपरासी, सतारा जेल के समबद्ध) शेख अली (हवलदार 22वीं उत्तर भारत पलटन सतारा, श्री रंगपट्टन वाले)

अन्य कैदी
बाजीराव यशवन्त पोतनिस
(मुंबई में गिरफ़्तार किये गए तथा थाना जेल में कैद रखा गया-दिसम्बर 1857)
विष्णु स्वामी
(सतारा में गिरफ़्तार किये गए तथा थाना जेल में कैद रखा गया- अक्टूबर 1857)
चिमन मस्तान
(वेलदी के मुसलमान, सतारा में गिरफ़्तार किये गए तथा थाना जेल में कैद रखा गया)

अन्य सम्मिलित व्यक्ति

'सतारा अभियोजन 1857 में अभियोजक की तरफ से साक्षी :
साक्षियों ने भी रंगो बापूजी गुप्ते की विभिन्न प्रकार से सहायता की, जैसे पुरुषों एंव सामान का एकत्रीकरण, धन एकत्रित करना, गोलियाँ ढालने का कार्य, रहस्यपूर्ण योजनाओं को छिपाना आदि।
सखाराम दाजी काकडे (सतारा नाजिर के कार्यालय के लेखाकार)
हरी राधोजी देवरुखकर (सुनार - जकातवाडी, सातारा)
बाल कृष्ण वामन प्रधान (लेखाकार, परहुर - भोर)
कुशवा उर्फ कृष्णाजी दाजी प्रधान (रंगो बापूजी गुप्ते का रिश्तेदार, कृषक-भोर)
आत्माराम उर्फ अप्पा भट अैतवडेकर
(बाह्राण, साधु ; अैतवडे, वालवा वालुका,सतारा; गोली निर्माणकर्ता)
गोपाल रामचन्द्र रेगे (कृषक, केसई - सतारा)
अन्ता जी हरी क्षीर सागर (लेखाकार शिन्दे - भोर)
गणेश अनन्त गम्भीर (लेखाकार, मसूर-सतारा)
हैबाती साखू (रामोशी, भोरे गाँव, सतारा)
वेनकू बाबा शास्त्री नानडियोकर (साधु-सतारा)
बलवंत नारोजी जॉकर (कुन्वी, पाटिल भोरे गाँव, सतारा)
बाबा जी हरी राउत (कृषक धावडी, सतारा)
पीर खाँ चांद खाँ शेख (नेरे, सतारा)
राधो व्यकंटेश बहुश्रुत (लेखाकार, चेरे सतारा)
बाबा जी, बापूजी यादव (तामौली - पान विक्रेता - सतारा)
गंगा (मानसिंह (जिसे फांसी दी गई थी) की पत्नी सतारा)

 

कुछ अन्य व्यक्तियों के नाम जो सतारा क्षेत्र विप्लव में सक्रिय रुप में सम्मिलित रहे:
अप्पा फडनिस (सतारा)
अथा बन्जारी (बोरेगाँव)
बालाजी शिम्पी (दर्जी, मंगलवार पेठ, सतारा; रंगो बापूजी कुछ समय के लिये उनके पास ठहरे)
बलवन्त राव प्रभू (रंगो बापूजी के रिश्तेदार)
माऊ पटेल भोर के मुखिया, पन्त सचिव
दामोदर मल्हार दादे (फौजी भर्ती में सहायक ; सतारा)
दौलत हरी पावर (कराड)
गोसावी (सतारा; रंगो बापूजी उसके वाडे में ठहरे)
ज्योति न्हावी (सतारा; नाई)
केशव राव परसुराम किल्से (कोल्हापुर)
माल्या मांग (मांग नेता, ये सकामल्ली)
नाना रामोशी (कुन्डल)
रामा शिन्डे
शाम्वुली
सत्त् रामोश शेन्से बन्धुवर (भोर)
तॉत्या फडनिस (कोल्हापुर)
यादव (सतारा)

 

बम्बई सरकार का सतारा मजिस्ट्रेट के नाम पत्र दिनांक 30 मार्च, 1858; कृपया ध्यान रखें कि कोई सजा (निम्न के प्रति) फांसी में न परिणित कि जाय क्योंकि उनके बयान अन्यत्र भी लिये जा सकते है ;
नाथाजी भोसले
बलवंत राव पोतनिस
केशव विनायक किबे

 

रंगो बापूजी ने अपने दो भतीजों को, 500 फौजियों के साथ उत्तर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए भेजा था।
बलवंत राव गुप्ते देशपांडे
वामन राव देशपांडे (वामन राव 1926 में स्वर्ग सिधार गये)- सन् 1923 में 87 वर्ष की आयु में वामन राव ने प्रो. जी. जी. टिपानिस, अतौनी के समीप विले में यशवंत तथा वामन के द्वारा 1857 के स्वतंन्त्रता संग्राम में रंगो बापूजी द्वारा निदेशित, ली गई भागीदारी के विषय में साक्षात्कार दिया। मार्च 1926 के 'प्रवोधन' के एक अंक में साक्षात्कार पर आधारित एक लेख प्रकाशित हुआ था।)

6.फौजी भर्ती के स्थान - रंगो बापूजी चरा खडी की फौजी भर्ती के निम्न केंद्र :

येका मल्ली 

जकात वाडी

वाठार

फल्टन

वारधांगद 

पंढरपुर

कुल कदम

 बैलगाँव

यनेवडा

 शाहपुर

दियूर 

कालम्बी

अरावी 

कराड

अर्वूजावाज 

आर्ले

कोल्हापुर

 

स्त्रोत
मुंबई अभिलेखगार ग्रह पी. डी. ग्रंथ
1855 : ग्रंथ 100/1408 (रंगो बापूजी की बम्बई राज्यपाल को की गई अपील, अक्टूबर 1855)
1857 : ग्रंथ 25 पृ. 31,55,574 पे.
       ग्रंथ 26 पृ. 461 से 505
       ग्रंथ 29 पृ. 297 (सतारा राजद्रोह अभियोजन 1857)
       ग्रंथ 31 पृ. 561, 584
1858 : ग्रंथ 20 पृ. 21-29, 65-69
       ग्रंथ 21 पृ. 171
       ग्रंथ 24 पृ. 207
       ग्रंथ 25 पृ. 627-641
       ग्रंथ 28 पृ. 41-43
       ग्रंथ 30 पृ. 439-447
       ग्रंथ 32 पृ. 175-186
नामिलनाडू ग्रंथ रक्षा ग्रह, मद्रास न्यायिक प्रक्रिया स. 170 व 171 ; 24 मई 1862,
मुंबई जिला गजेटियर ग्र. 19: सतारा (बम्बई 1885)
गृ. 1 पृ. 55-63, 179-193.
गोखले-जागृत सतारा पृ. 23.
ठाकरे-रंगो बापूजी पृ. 208-568.
प्रवोधन-मार्च, 1926.

पुणे की स्थिति

मई 1857
   1857 : मई 22, नगर की जामा मस्जिद में युद्द में भारतीय पक्ष की जीत के लिए नमाज़।
   1857 : जून, सशस्त्र विप्लव के प्रयास विफल।
   1857 : जुलाई, पूना विद्यालय के शास्त्राशस्त्र विद्यालय के प्रशिक्षुओं द्वारा कोल्हापुर पलटन में उन्हें चर्बी युक्त कारतूसों की खेप की सूचना।
   1857 : सितम्बर, पेशवा सरकार की घोषणा-पत्रों की प्रतिलिपियाँ नगर में चिपकाई गई।
   1857 : मार्च 22, पुणे के वलबन्त राव भोंसले पुणे की स्थिति के विषय में कोल्हापुर सूचना भेजते हैं।


मराठा-पुणे संघटन राजनीतिक राजधानी के अंतिम प्रधानमंत्री पेशवा वाजीराव द्वितीय ने 3 जून 1818 में असीरगढ़ के उत्तर में ब्रिटिश फौजों के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया था; जहाँ से उन्हें कानपुर के विठूर, आजकल जो उत्तर प्रदेश में है देश निकाला दे दिया गया। यहाँ वह अपने पीछे अपने उत्तराधिकारी नाना साहब पेशवा को छोड़कर सन्. 1851 में मृत्यु प्राप्त हुए; जो अन्त में 1857 के स्वातन्त्र युद्ध के प्रमुख प्रणेता और अग्रणी नेता बन गए। इस प्रकार वाजीराव के द्वारा 1818 में ब्रिटिश सरकार के विपरीत खोया हुआ युद्ध उनके पुत्र द्वारा 1857 में कानपुर में पुर्नजीवित कर दिया गया।

पुणे में राजद्रोह के प्रयत्न लगभग ब्रिटिश शासन के प्रारम्भ से ही किये जाने लगे थे। पुणे जिले के दक्षिण में उमाजी नायक के नेतृत्व में 1826-1830 ई. विप्लव प्रारम्भ हो गया था; कोली के विप्लव 1839-1846 भाउ खरे, चीमाजी जाधव, नाना दरवारे के नेतृत्व में हुये, जो अधिक महत्तवपूर्ण थे। ये और इस प्रकार के अन्य विद्रोही आदि का एक विशेष राजीनितिक स्वरूप था। नेताओं ने यह घोषणा कर दी कि वे राज्याधिकार से वंचित पेशवा के आधार पर कार्य कर रहे हैं वे ब्रिटिश शासन से जहाँ कहीं भी लड़ सकते थे, लड़े। देशभक्त और राजकीय शक्तियों के मध्य एक मुठभेड़ में, ब्रिटिश सरकार ने 54 देशभक्तों पर अभियोग चलाया; राचन्द्र गणेश गोरे तथा अन्य एक कोली नेता को फाँसी पर लटका दिया और अन्य को विभिन्न कैदों की सजा हुई, जिनमें कारावास व समुद्रपार निर्वसन सम्मिलित था।

1844 में, ब्रिटिश विरोधी विप्लव पुणे क्षेत्र में दो भाइयों के द्वारा पूरित हुए- नाम थे, रघु माँगरे, तथा बापू माँगरे। उनके अनुयाइयों में विभिन्न जाति के लोग थे। बापू को ब्रितानियोंें ने 18 अगस्त 1845 को गिरफ्तार कर लिया। 1846 में तुकाराम तथा मनकाला, उमाजी नायक के दो पुत्रों को पकड़ लिया गया। 19 अप्रैल 1850 को उमा नायक के पुत्र पुनः पकड़े गए। चतुर सिंह जो निरन्तर ब्रिटिश सरकार से लोगों को 1818 के उनके शासन के प्रारम्भ से ही उन्हें परेशान कर रहे थे, अन्त में उनके द्वारा पकड़ ही लिए गए। इस प्रकार 1857 के विप्लव से पूर्व ही वहाँ ब्रिटिश विरोधी क्रान्ति निरन्तर चलती ही रहती थी। यद्यपि पुणे नगर ने स्वयं राजनीतिक महत्व पेशवा बाजीराव के विठूर में देश निकाले से प्राप्त कर ही लिया था। पुणे शहर के अन्तर्गत, मनुष्यों के मध्य एक महान हलचल, युद्ध के प्रारम्भ से मौजूद थी, जैसे कि युद्ध की खबरें विभिन्न क्षेत्रों में मराठी, अंग्रेजी समाचार पत्रों में उपस्थित हुई और मुह-बोली खबरें विभिन्न क्षेत्रों से बराबर पहुँचती रहीं।

शुक्रवार 22 मई 1857 को उदाहरण स्वरूप जफर मुल्ला, मोहम्मद हयात, दवा फर्रोश हसेन अरब, रेहम्, नयचेवाले, मदार नयचे वाले, इमाम पहेवाला जमालुद्दीन ने दिल्ली में स्वतन्त्रता सेनानियों की सफलता के लिये पुणे की जामा मस्जिद में नमाज अदा की। आम नमाज अदायगी के पश्चात् लगभग 10 अथवा 12 व्यक्ति मस्जिद में शेष रह गये और दिल्ली में कार्यवाही होने से पूर्व ही कार्य करने पर बातचीत प्रारम्भ की गई। सारा दल साथ-साथ नमाज के व्यवहार में हाथ मिताले हुये उठा और गदर वालों की तरफ से खुदा से दुआ माँगी। "(खुफिया पुलिस के द्वारा सरकार को रपट-नाम सईद अहमद, शेख चाँद जो मस्जिद में सरकारी आज्ञा से रहे-दोनो राजनीतिक विभाग, ग. स. 30 1857 पृ. 235-254।

पुणे में एक अफवाह, फैली कि नाना साबह पेशवा छः सप्ताह के अन्दर शहर में घूमेंगे और उसी प्रभाव के अन्तर्गत, मध्य क्षेत्र की और बुद्धवार फाटक पर एक घोषणा चिपकाई गई। मुंबई की सरकार ने सरकारी गजट में 20 मई 1857 को एक विज्ञप्ति प्रकाशित कराई कि पुणे की नगर पालिका उसी तिथि को स्थापित कर दी गई; और यह जून 1857 से कार्य करना प्रारम्भ कर देगी; कैसी भी हो, मई 1858 तक शहर की अव्यवस्थित स्थिति के कारण संभावित न हो सका।

पुणे शहर में जून 1857 में ब्रिटिश सरकार के विपरीत एक सशस्त्र विप्लव का उद्यम किया गया, परन्तु वह तुरन्त ही असफल हो गया। उस अभिलेख में मौजूद है कि एक सिपाही जो विप्लव का संगठनकर्ता थे पकडे गए और सरकार द्वारा बेंतों से पीटा गया था।

पुलिस खुफिया विभाग द्वारा अगस्त 1857 में यह सूचना दी गई कि पुणे निवासियों के जन साधारण वाचनालाय में गवर्नमेन्ट पूना कॉलेज के प्राचार्य और विद्वान बहुधा आते हैं तथा शहर के अन्य बुद्धजीवी भी वहाँ पहुँचते हैं तथा खुले रूप से 'गदर वालों' के पक्ष में और ब्रिटिश सरकार के विरोध में राजद्रोहात्मक बातें कहते रहते हैं। वाचनालय में मिलने वालों में, जिनके वार्तालाप रहस्यात्मक रूप से सरकार को प्रेषित किय गये, उनमें ऐसी हस्तियाँ सम्मिलित थी, जैसे प्रो. केरो लक्ष्ण छत्रे, प्रो. कृष्ण शास्त्री चिपकूपानकर, कृष्णाजी प्रिंबक रानडे, सम्पादक प्रतिवासरीय ज्ञान प्रकाश और बहुत सारे प्रसिद्ध व्यक्तितत्व। अपने एक मुबई सरकार को भेजे पत्र स. 27, 14 अगस्त 1857 में बेट्टिंगटन के पुलिस आयुक्त ने यह निरूपित किया कि कैसे भी हो, जहाँ तक कि वाचनालय का सम्बन्ध है यह सरकार के निश्चय के ऊपर है कि वह कैसे कदम उठाती है - क्या वह जगह स्वयं बन्द हो जाये, क्या उन व्यक्तियों के प्रति कोई कदम उठाने चाहिये, जिनमें से अनेक सरकारी सेवा में हैं, जो इस प्रकार अविश्वास एवं विद्रोही की सरकार के प्रति भावना पैदा करते हैं। मुबई सरकार ने न तो जल्दीबाजी में वाचनालय बन्द करना ही ठीक समझा और न राज्यकीय तथा उन क्षेत्रों में आलोचना रोकना उचित ठहराया।

सितम्बर 1857 को पेशवा सरकार के घोषणा पत्र की प्रतिलिपियाँ (मराठी भाषा में) महाविद्यालय तथा वाचनालय पुणे के समीप चिपका दी गई।

साथ ही यह घोषणा की गई,
1. जो कोई भी राज्यपाल (गर्वनर) को समाप्त कर देगा वह श्रीमन्त नाना साहब पेशवा से 5000 रुपये इनाम प्राप्त करेगा।
2. (इसी प्रकार) जो कोई भी सर सेनापति (कमाण्डर-इन-चीफ) को समाप्त कर देगा वह श्रीमन्त नाना साहब पेशवा से 3000 रूपये इनाम प्राप्त करेगा।
3. जो कोई भी न्यायाधीश को समाप्त कर देगा वह श्रीमन्त नाना साहब पेशवा से 3000 रूपये इनाम प्राप्त करेगा।
4. जो कोई भी जिलाधीश को समाप्त कर देगा वह श्रीमन्त नाना साहब पेशवा से 2000 रूपये इनाम प्राप्त करेगा।
5. जो कोई भी सेनानायक को समाप्त कर देगा वह श्रीमन्त नाना साहब पेशवा से 2000 रूपये इनाम प्राप्त करेगा।
6. जो कोई भी तोपखाने कर्नल को समाप्त कर देगा वह श्रीमन्त नाना साहब पेशवा से 1500 रूपये इनाम प्राप्त करेगा।
7. जो कोई भी (युरोपीय) अफसर हो, को समाप्त कर देगा वह श्रीमन्त नाना साहब पेशवा से 1000 रुपये
इनाम प्राप्त करेगा।

सरकार ने सोचा कि संभवतः कुछ पूना कॉलेज और वाचनालय के नौजवान व्यक्ति इसके भागीदार हैं, जिन्होंने ये घोषणा चिपाकाई है; परन्तु उनका न तो पता चल सका और न ही गिरफ्तार किये जा सके।

पुणे में 1857 में ब्रिटिश फौज का शस्त्रचालन विद्यालय था। पुणे विद्यालय में विभिन्न क्षेत्रों के फौजी शस्त्र विद्या प्रशिक्षण के लिये भेजे जाते थे। सन् 1857 की परिस्थितियों में यह विद्यालय क्रान्तिकारियों द्वारा ब्रिटिश विरोधी सूचनाओं का आदान प्रदान होता था। इस प्रकार जब लगभग 12 अफसर तथा सिपाही कोल्हापुर से पुणे नई कवायद सीखने के लिये भेजे गये तो उनमें से एक हल्के शस्त्र टूकडी का प्रशिक्षु जो एक परदेशी था ने, कोल्हापुर पुन: एक सूबेदार सेनदीन को सूचना भेजी कि प्रशिच्छुओं ने कारतूस काट दिये हैं और आगे कार्यवाही के लिये कह दिया है, यह सूचना भारतीय कोल्हापुर पल्टन में बहस का एक उत्तेजनात्मक मुद्दा बन गई। इसके बाद कोल्हपुर के सिपाहियों ने अपने पुणे के भाइयों से एक सूचना प्राप्त की कि कोल्हापुर पल्टन में नये कारतूस 10 अगस्त 1857 को आपूर्ति किये जाने वाले हैं। इसके ऊपर, वह दिन कोल्हापुर पल्टन के नेताओं के द्वारा नियत किया गया कि उसी दिन विद्रोह खडा कर दिया जायेगा। ब्रिटिश सरकार के अफसरों को इस योजना का सुराग लग गया, विद्रोह की तिथि 31 जुलाई 1857 बढा दी गई और उसी दिन नये कारतूस नहीं पहुँचे थे। प्रसंगवश कोल्हपुर के एक प्रमुख विद्रोही क्वार्टर मास्टर हवलदार जो कि शस्त्राशस्त्र भंडाराध्यक्ष होते हुये भली प्रकार जानते थे कि नये कारतूस नहीं पहुँचे हैं। यहाँ यह सिद्ध करते हुए ल ग्रान्ड जेकव ने कहा "कि महान क्रान्ति के प्रमुख प्रणेता नई जाति विनाशक भय को एक आधार के रुप में प्रयोग किया।" (जेकव वेस्र्‌टन इन्डिया पृ. 176)

1857 में वहावी सम्प्रदाइयों का पश्चिम भारत में पुणे में एक क्रियाशील केन्द्र था जिनके प्रमुख मौलवी नुरुल हुदा थे जो इस समय सदर बाजार पुणे में रहते थे। उस समय वहावी भारत में शक्तिशाली ब्रिटिश विरोधी आन्दोलन को संगठित कर रहे थे। नुरुल हुदा, प्रमुख ने अपने शिष्य पुणे से गुफ्तचरों के रुप में विभिन्न फौजी केन्द्रों कोल्हापुर, बेलगाँव, आदि में विद्रोह संगठित करने के लिये भेजा। उनके अनेक शिष्य 27वी उत्तर भारत पल्टन कोल्हापुर में मौजूद थे। उनमें से एक गुप्तचर मुंशी (मोहम्मद हुसैन) पुणे से भेजे गए, जो बाद में बेलगाँव में गिरफतार कर लिए गए। तत्पश्चात् ब्रिटिश सरकार के द्वारा 14 अगस्त 1857 को उनको मार डाला गया। बाद में, नुरुल हुदा पुणे के वहावी नेता स्वयं को उनकी 'राजद्रोही क्रियाओं' के लिये तथा कोल्हापुर और बेलगाँव के लोगों से पत्र व्यवहार के कारण गिरफतार कर लिया गया तथा थाने की हवालात में बन्द कर दिया।

अगस्त 1857 में, एक सरकारी लिपिक, बाल कृष्ण चिमनजी ने ज्ञान प्रकाश पुणे के एक अंक में निम्नलिखित प्रविष्टि लिखी "हमें व्यक्तिगत पत्र के आधार पर ज्ञात हुआ है कि दक्षिण में नाना साहब आयेगें और 'दशहरा' के दिन पेशवा सरकार की गद्दी संभालेंगे। तदन्तर, बालकृष्ण चिमनजी सरकारी सेवा से निकाल दिए गए और राजद्रोह की उत्तेजना फैलाने के अपराध में अभियोजित हुए।

जनवरी 1858 में ब्रह्राचारी बाबा उत्तर भारत निवासी अहमदाबाद से पुणे आये। उन्हेंे ब्रिटिश सरकार ने अहमदाबाद से इस शंका के आधार पर बाहर भेज दिया गया कि वह सिपाहियों पर पानी चढ़ा रहे थे। पुणे में 23 वीं उत्तर भारत पल्टन के लोग मिले। चूँकि उन्हें 'तीव्रतम शंकालु प्रवुत्ति'; मुंबई सरकार ने अपने आदेश सं. 245 दिनांक 21 जनवरी 1858, बाबा को गिरफ्तार कर लिया तथा पुणे जेल में धारा 25, सन् 1827 के नियम के आधार पर डाल दिया।

1857 के स्वातंन्त्रय युद्ध की तैयारियाँ पुणे में नाना साहेब पेशवा उत्तर के, साथ प्रारम्भ हो गई और दक्षिण की राजनीतिक शक्तियाँ, उन जैसे सतारा, कोल्हापुर बेलगाँव आदि, बलवन्त राव बाबाजी भोंसले, सनिवार पेठ पुणे शहर निवासी एक युद्ध के एक प्रमुख संघटक थे। उनकी गतिविधियाँ निर्भीक रूप से युद्ध काल तक चलती रहीं। उनका खुफिया पत्र पुणे से सोमवार 22 मार्च 1858, दादा साहब भोंसले, कोल्हापुर की संम्बोधित, पुणे की उपस्थित स्थिति पर अत्यधिक प्रकाश डालता है। वह लिखते है," यहाँ प्रत्येक वस्तु तैयार है, परन्तु यहाँ धन की बहुत आवश्यकता है। नग्गा रामचन्द्र मारवाडी 25,000 रुपये दे रहे है। पल्टन के अफसर हमारे पक्ष में हैं। आपकी तरफ शेष है। केवल 'देर करना' हमारे मित्र वाला साठे जो नाना साहब के साथ मिल गये थे; प्रार्थना करते हुये तैयारी, वह जिसके साथ हमारे पास व्यय के लिये भोजन है। भाऊ श्रोफ कारतूसों के लिये शीसा आपूर्ति से सहमत हो गये हैं। आप तुरन्त उत्तर दें। जब एक बार कोई बात फैल जाती है, साधन उपल्ब्ध करने के लिये कोई समय नहीं होगा, जिसके लिये प्रबन्ध तुरन्त किये जाने चाहिये यहाँ पल्टने पूर्णत: हमारे साथ हैं और शपथ ले चुके हैं और पूना की चार घटकों में अर्थात् डेढ़ घंटे में लें लेंगे। परन्तु बिना पैसे के क्या हो सकता है? हम आपके ऊपर आधारित हैं। पूना का कुछ समाज नाना साहब के साथ है और वे निरन्तर पत्र-व्यवहार में हैं। आपको मालूम होना चाहिये वरोदा की जनता ने काफी खुफिया खबरें दी हैं सातारा को एक पत्र लिखा गया। उत्तर आपको भेज दिया जायेगा। (मुंबई पुरा-अभिलेखागार पी. डी. ग्र. 24, 1858 पृ. 543 एस. एम. एफ. आई गृ. 1, 288)

पुणे से बलबन्त राव भोंसले के दादा साहब भोंसले को एक पत्र के साथ कोल्हापुर में 21 व्यक्तियों का प्रतिनिधि-दल स्त्री, पुरुषो बरोदा से स्पष्ट रूप से कोल्हापुर की रानी की सेवा में रहस्यात्मक रूप से भेजे गये। 29 मार्च को इस दल को ल ग्रान्ड जेकव कोल्हापुर के विशेष आयुक्त द्वारा गिरफ्तार करा लिया गया। दल के एक व्यक्ति के शरीर से जिनका नाम भागोराव सम्माजी पवार था, प्राप्त किया गया जिसको कि पत्र वाहक ने निगल जाने और नष्ट करने का प्रयत्न किया।

मार्च 1858 में बम्बई की सरकार ने पूना के मजिस्ट्रेट के द्वारा पूर्व पेशवा के सम्बन्धियों की पूना में एक सुची तैयार कराई। सूची में तैरह परिवारों के नाम पुरुष सदस्यों के नाम, उनकी आयु, सम्बन्धों की स्थिति एवं स्वरूप और विशेष टिप्पणी आदि सम्मिलित थे। उनमें से कुछ के लिये पुणे पुलिस को विशेष निगाह रखनी थी विशेषतः नारायण भट्ट, गोपीनाथ भट्ट कान्हेरे आयु 30 वर्ष एक परिवारीय पन्डित पूर्व पेशवा नीलकण्ठ गोविन्द खासगी वाले, आयु 40 वर्ष, बधपेठ, पुणे में कीमती सम्पत्ति अर्जित किये हुये तथा काशीनाथ बाबाजी देशमुख आयु 40 वर्ष जो पूर्व में बिठूर चले गये थे, और उनके पुणे लोटने की घटना पर ही निगाह रखनी थी।

इसी प्रकार अगस्त 1858 ई. में केसरी सिंह 10वी उत्तर भारत पल्टन के पूर्व सूबेदार, निवासी भामवुरदा (उस समय) देख-रेख में रखा गया था। बाद में उन्हें गिरफतार कर लिया गया। और उनके शंकालू चरित्र के कारण थाने जेल में रखा गया।

केशरी सिंह ने ब्रह्मचारी बाबा के मकान पर राजद्रोही बैठकों में भाग लिया; तथा उनसे कुछ व्यक्तियों को मिलाया जिन्होंने बैठकों में भाग लिया। बाबा के मकान पर वही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रिटिश संस्था के विपरीत विद्रोह के लिये उड़ खड़े होने के विषय में बतलाया था।

इन सब के बावजूद, लम्बे उबलते शहर के वातावरण में किसी स्थान पर महान विप्लव घटित नहीं हो सका जो कि स्थानीय ब्रिटिश प्रशासन को खतरा पहुँचा सकता था। कभी, 1861 में राव साहब पेशवा, नाना साहब पेशवा के भतीजे पुणे क्षेत्र में पहुँचे और क्रान्तिकारी ताकतों के साथ हैदराबाद की ओर आगे बढे।

2. कुछ नेता तथा अन्य विशेष व्यक्ति

नुरूल हुदा (पश्चिमी भारत के वहावी प्रमुख)
बलवन्त राव बाबाजी भोसले नग्गा रामचन्द्र मारवाड़ी

बालासाठ

भाउसराफ

भगरानसम्भाजीपवार

जफरमुल्ला

मोहम्मदहयात

हुसैनअरव

रहीमूनायचीवाला

मुद्दारनायचीवाला

इमामपट्टेवाला

जमालुद्दीन

केरोलक्ष्मणछत्रे

कृष्णाशास्त्रीचिपलूणकर

कृष्णाजी त्र्यम्बक रानडे

मुंशीमोहम्मदहुसैन

बालकृष्ण चिमनजी

ब्रह्राचारीबाबा

केशरीसिंह

नारायण भट् टगोपीना थभट्टकान्हैरे

नीलकण्ठगोविन्दखासगीवाले

काशीरामबाबाजीदेशमुख

3. शहीद
मोहम्मद हुसैन मुन्शी (पुणे से बेलगाँव भेजे गए।)
(बेलगाँव 14 अगस्त 1857 को तोप से उडा दिए गए)

4. कैदी

नरूलहुदा

थानेमेंरोकलिएगए

बालकृष्ण

चिमनजीपुणेजेलमें

ब्रह्राचारीबाबा

पुणेजेलमें

केशरीसिंह

थानेजेलमें

हुसैनअरब

थानेजेलमें

इमामपेरी

थानेजेलमें

शेखअब्दुलबुल्लर

थानेजेलमें

इस्माइल (जुलाहा)

थानेजेलमें

जफर

थानेजेलमें

मोहम्मदहिशीथ

थानेजेलमें

भद्दासाहब

थानेजेलमें

रईसमन (मुसलिमा)

थानेजेलमें

5. स्त्रोत
मुंबई पुर-अभिलेखागार (राज. वि. ग्र.)
1857 : ग्र. स. 25 पृ.17, 18, 21-26.
ग्र. स. 26 पृ. 369-274 = ग्र. स. 30 पृ. 235-254
ग्र. स. 31 पृ. 479-482
1858 : ग्र. स. 20 पृ. 525-529
ग्र. स. 23 पृ. 291, 407-421.
ग्र. स. 24 पृ. 543
ग्र. स. 24 पृ. 543
ग्र. स. 34 पृ. 291-232
बम्बई जिला गजेटियर ग्र. 18 पूना 2 व (बम्बई 1865)
मुंबई प्रशासन रपट 1857-58 पृ. 683 - 691
एस. एम. एच. एफ. आई. ग्र. 1, 343 - 344 पृ. 273-279, 288,
ज्ञान प्रकाश पुणे (मराठी - प्रतिवासरीय) अंक 1857, तथा 1858.
जेकव पश्चिम भारत पृ. 149-154, 175-177.

सावंतवाड़ी में विद्रोह

फरवरी - नवंबर, 1858
   1858 : 2 फरवरी, बाबादेसाई के नेतृत्त्व में फोंद सावंतो ने विद्रोह भड़काना प्रारंभ कर दिया। क्षेत्र सावंतवाड़ी से करवार तक, बेलगाव जिला और गोवा भी।
   1858 : 6 फरवरी, तलेबाड़ी की ब्रिटिश चौकी पर हमला किया गया और इसी प्रकार के हमलें बाद में किए गए।
   1858 : 20 नवंबर, सावंतों ने पुर्तगाली कमाण्डर के समक्ष समर्पण किया।
   1859 : 1 फरवरी, सावंतों को आजीवन काले पानी की सजा पर तीमोर भेज दिया गया।


प्राचीन काल से सावंत मराठा सरदार थे। भारत के पश्चिमी तट पर स्थित सावंतवाड़ी उनकी शक्ति का केंद्र स्थल था। 17 फ़रवरी, 1819 की संधि के अंतर्गत सावंतवाड़ी ब्रितानी हुकूमत के अधीन हो गई थी। वर्ष 1844 और 1845 में सावंतवाड़ी और उसके समीप स्थित कोल्हापुर में गंभीर ब्रिटिश विरोधी विद्रोह हुए। नवंबर, 1844 में सावंतवाड़ी में मनोहरगढ़ के लोगों ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह और अव्यवस्था के कारण कोल्हापुर के क्षेत्र में ब्रिटिश सरकार बड़े असमंजस में पड़ गई। देश के उस भाग में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर देने की संगठित योजना थी।

फ़रवरी, 1845 में, फोंद सावंत ताम्बोलेकर , जो ब्रितानियों के पुराने शत्रु और प्रमुख कुलीन व्यक्ति थे, अपने आठ पुत्रों के साथ, सावंतवाड़ी के 16 वर्षीय राजकुमार अन्ना साहिब सरदेसाई के साथ विद्रोह में सम्मिलित हो गए। ब्रितानियों के विरुद्ध बग़ावत में सावंतों ने प्रमुख रूप से भाग लिया और गोवा में शरण ली। पुर्तगाली सरकार ने अण्णा साहिब और सावंतों को राजनैतिक शरणार्थी माना और उन्हें ब्रितानियों को सौंपने से इंकार कर दिया। 1850 में फोंद सावंत के छोटे पुत्रों, नाना बाबा और हनुमंत देसाई को ब्रिटिश सरकार ने उनके 1845 के विद्रोह के लिए माफी दे दी, यद्यपि वे गोवा में ही रह रहे थे। वहाँ उनको दीपूजी राणे, सत्तारी महल के प्रमुख की अभिरक्षा और सहायता मिल रही थी। सावंत भाईयों ने पुर्तगाली सरकार को एक पत्र लिख कर सूचित किया कि नाना साहब पेशवा की सेना शीघ्र ही दक्षिण आने वाली है, पुर्तगाली सावंतों की सहायता करते हैं।

तो ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध आपसी सहयोग समझौता किया जा सकता है। (मद्रास, न्याय विभाग की सलाह संख्या 10, दिनांक 5-1-1859) यह कार्यान्वित नहीं हो सका।

2 फ़रवरी, 1858 की रात्रि को फोंद सावंत के पुत्र राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित होने के लिए गोवा से निकल भागे और बाबा देसाई के नेतृत्व में क्रांतिकारी कार्यवाहियों को प्रेरित करने लगे। सावंतवाड़ी से करवाड तक के जंगल की सीमांत पट्टी, विशेषतः बेलगाम ज़िले का खानपुर तालुका और सुपा तालुका जो उत्तरी कन्नड़ ज़िले में था, उनके कार्यक्षेत्र थे। उनके गोवा के संतारी महल के प्रमुख दीपूजी राणेे की सक्रिय सहायता प्राप्त थी। जैसा ब्रिगेडियर जनरल ग्रान्ड जैकब ने कहा है सावंतों ने (नाना साहब) पेशवा के नाम से लड़ाई छेड रखी थी। (जैकब, पश्चिमी भारत पृष्ठ 200) 27वीं पैदल सेना की पलटन के लोग उनके साथ आकर मिल गए। कारवार सीमांत के कूची तालुके के सोमन कोप के कुछ देसाई भी उनकी सहायता को आ गए। (एच. एल. एण्डरसन को टी. ओगिलवी के द्वारा लिखा गया पत्र दिनांक 3 जुलाई, 1858, एच. एफ. एम. के खंड 1, पृष्ठ 468-4780)

सावंतों की फ़ौज ने, जो घाट की निचली तरफ़ थे, घाट के ऊपर सुदृढ़ स्थिति ले ली ताकि वे ऊपरी क्षेत्र की राष्ट्र भक्त सेना से संपर्क बना सके।

6 फ़रवरी, 1858 को लगभग 200 व्यक्तियों ने तलेबाड़ी की पुलिस चौकी पर हमला कर दिया और टिनी दर्रे के सीमा-शुल्क भवन को जलाने का प्रयास किया जो सूपा के लगभग 30 मील उत्तर पश्चिम में था। 8 फ़रवरी को वारबुन्ड गाँव पर आक्रमण हुआ औैर डड़वाल का सीमा-शुल्क भवन जलाकर मिट्टी में मिला दिया। ब्रिटिश सरकार ने बेलगाम में 28 पैदल सेना की पलटन के दो दल नागरिक अधिकारियों के उपयोग के लिए भेज दिए और राज्य के विरुद्ध अपराधों की कानूनी जाँच के लिए एक विशेष आयुक्त को भी नियुक्त कर दिया।

सावंतवाड़ी के लोगों की सशस्त्र गतिविधियाँ अबाध रूप से चलती रहीं। वे सावंतवाड़ी के जंगलों के विभिन्न भागों में फैल गए (जो सावंतवाड़ी ही है) जिसके कारण ब्रिटिश फ़ौजी और नागरिक अधिकारी चिंतित हो उठे। जे. हार्पर ने 24 अप्रैल, 1858 को मालवन से लिखा च् सूचना मिली है कि विद्रोही बारी के जंगलों में है-वे हमारी सीमाओं से काफ़ी दूरी पर हैं-उनका एक दल राम घाट की सड़क की ओर बैतसी के आसपास है। छ मेजर आल्ड ने मि. हार्स को 25 अप्रैल, 1858 को लिखा च् नीच विद्रोही यहाँ तक आ पहुँचे थे, यद्यपि मैं नहीं समझता कि वे इतनी दूर आपकी (मालवन) सीमा तक बढ़ेंगे मैं आपको यह सूचना भेज रहा हूँ। यदि आपके पास पचास-साठ आदमी हो और वे मनोहर क़िले के आधे भाग तक फिर से कूच कर सेके, तो आप हमारे लिए सहायक हो सकेंगे (बी. ए. पी. डी. खंड 26, वर्ष 1858, पृष्ठ 212, 214)

तथापि लगातार हमलों के कारण और कदाचित् उचित साधनों की कमी के कारण भारतीय सेनाओं की शक्ति घटती जा रही थी। अँग्रेज़ों के द्वारा हनुमंत सावंत के बहुत सारे अनुयायी पकड़े गए और ब्रितानियों के द्वार मार दिए गए थे।

1857-58 की मद्रास प्रेसीडेन्सी की प्रशासनिक रपट बताती है कि सावंत विद्रोह एक राजनैतिक प्रकार का था और उसका लक्ष्य सरकार थी। उस जंगली क्षेत्र के रहने वालों की सहानुभूति और सहायता प्राप्त करने में कदापि असफल नहीं हुए और उन्होंने जो स्थिति ले रखी थी, उसकी प्राकृतिक दुर्गमता का लाभ लेकर वे उस फ़ौजी टुकड़ी के विरुद्ध वनमानुष च्ंद्व करने और अपनी स्थिति बनाए रखने में कुछ समय तक सफल रहे।"

पुर्तगालियों के सहयोग से सावंतों से निपटने के लिए ब्रिगेडियर जनरल ल ग्रान्ड जेकब 2 नवंबर, 1858 को मुम्बई से गोवा रवाना हो गया। सावंतों की सेना ने अभी तक ब्रितानी फ़ौज के मद्रास और मुम्बई के वारदातों को औैर पुर्तगाली सेना के नियमित और अनियमित दलों को मैदान में फँसा रखा था। गोवा के पुर्तगाली गर्वनर जनरल ने जैकब को आश्वासन दिया था कि जब सावंत विद्रोही समर्पण कर देंगे तो उन्हें समुद्र में दूरस्थ पुर्तगाली अधिकृत स्थानों पर भेज दिया जाएगा। पहले यह तय किया कि अन्य विद्रोहियों और नाना सावंत को पुर्तगाली अधिकृत मोजाम्बीक को ले ज़ाया जाए। परंतु बाद में, उनको भेजने का स्थान बदल कर इन्डोनेशिया कर देने के लिए विद्रोहियों को कहा गया और तब तक के लिए उनके विरुद्ध फ़ौजी गतिविधियाँ ब्रिटिश और पुर्तगाली सेना ने रोक दीं। लगातार पराजित होते रहने और कई लोगों के छोड़कर भाग जाने से सावंतों और उनके अनुयायिओं की संख्या धीरे-धीरे घटते-घटते अस्सी रह गई। अवधि के अंतिम दिन 20 नवंबर, 1858 की रात को उन्होंने सपरिवार बिना पूर्व प्रतिबंध पुर्तगाली कमांडर के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया। (गोवा में पुर्तगाली गर्वनर जनरल, विसकोंड डी टोरेस नोबास का मद्रास के गर्वनर लार्ड हैरिस को नोवा गोवा से लिखा गया 23 नवंबर, 1858 का पत्र) बाद में मुंबई सरकार ने 'प्रिन्स आर्थ' नाम के युद्धपोत को गोवा की सरकार को भेज दिया जिससे बन्दियों को 1 फ़रवरी 1859 को तीमोर ले जाया गया। इस प्रकार अन्त हुआ सावंतवाड़ी के क्षेत्र के सावंत देसाइयों के विद्रोह का।

3. अन्य विशेष व्यक्ति

फोंद सावंत
नाना सावंत (देसाई)

हनुमंत सावंत (देसाई)
सोमनकोप के देसाई

4 बंदी
(अ) तीमोर (इन्डोनेशिया) भेजे गए
(परिवारों के सभी लोग जिसमें आदमी, औरतें  और बच्चे सम्मिलित थे, उन्हें टन्डेलों के साथ (कालापानी) भेज दिया गया-अँग्रेज़ों और पुर्तगालियों दोनों के प्रजाजन इनमें सम्मिलित थे।)

1.सेक्रेटारिया डो गोवर्नो जीगल डो एसाडो डा इंडिया 3 डी फेवेरिरो डी 1859 एन 1 डोकुमेन्टो डो आफ. नो. 2. डी अन्नो डी 1859.

रिलाकेओ नोमिनल डो जेन्टे इ. कोमिटिवा डो टन्डेल्स क्वी वाओ पैरा तीमोर (तीमोर भेजे गए व्यक्तियों की सूची नामों के अक्षरो में थोड़ा अन्तर आ गया था। कोष्ठक में दी गई संख्या व्यक्तियों को आयु दर्शाती हैं।)

नाना तलेगाँवकर

(56)

अणृत राव राणे

(45)

रामचंद्र राणे

(40)

टाटु सावंत

(25)

अबा राव

(20)

बाबू राव

(12)

कृष्ण राव

(9)

आत्माराम राव

(3)

नाना देसाई

(40)

माऊदेसाई

(12)

चन्दू

(14)

नागू

(18)

अर्जुन देसाई

(19)

बाबूजी देसाई

(12)

हीर सावंत

(60)

गानोजी

 

हनुमंत सावंत भोंसले

(35)

पांडू वान्डरेकर

(4)

बाजू सावंत भोंसले

(33)

सीताराम देसाई

(5)

गानू सावंत

(0)

रामजी

(2)

बाला

(13)

सिदोबा

(21)

कृष्णा देसाई

(9)

आत्माराम (राने)

(5)

दाजी देसाई

(3)

लाखू (लक्ष्ण)

(2)

सखाराम

(9)

चान गौरो

(54)

विश्राम

(5)

अमृत सावंत

(45)

बदगो

(10)

बाबा जी

(35)

बाला देसाई

(50)

अबली

(50)

नाना अमृतकर

(35)

कोन्दी

(40)

रानी

(18)

पागुई

(16)

रेवसी

(35)

 

 

रूलु

(20)

 

 

सोगई

(25)

 

 

रानी

( - )

 

 

बालक

तुकारामविट्ठल

( - )

तुकाराम फोन्दू

(14)

भवानी राणू

(13)

दागडू विठू

(12)

धरमू

(6)

गणेश

(5)

देव

(4)

देन्या

(4)

गणपति

(2 II)

रामू

(3)

युवतियाँ


बाजी

( - )

यक्षी

(9)

राणी

(11)

कैरी

(6)

ब्याजी

(6)

आमिन

 

तारा

(6)

 

 

5. स्त्रोत :

गोवा राज्य के पुरालेख अभिलेखागार पणजी, सेक्रेटारिआ डो गोवनों जीराल : सूचियाँ 21-1-1859; 3-2-1859
तमिलनाडू के पुरालेख, अभिलेखागार  फोर्ट सेंट जार्ज, मद्रास न्यायिक सलाह 23-2-1858, 1-6-1858, 5-18-1858, 21-12-1858; 5-1-1859.
मुबई के पुरालेख पी. डी. खण्ड 6 वर्ष 1858 पृष्ठ 212-214, मद्रास प्रेसीडेन्सी की रिपोर्ट वर्ष 1857-58. मुम्बई की प्रशासनिक वर्ष 1857-58 पृष्ठ 241-2545, 1858-59 पृष्ठ 57-84
मुम्बई जिले की गजेयिटर सं . खण्ड 10 : रत्नागिरि और सावंतवाड़ी (बम्बई 1880)
खण्ड 12 : बेलगाम (मुंबई 1884) जैकब, पश्चिम भारत पृष्ठ 200, 218-235.
एच. एफ. एम. के. खण्ड 1 पृष्ठ 468-476 कामथ इतिहास दर्शन (पत्रिका) खण्ड 4, 1989 पृष्ठ 138-141.
शिरोडकर, च्राजद्रोह 1857 पश्चिमी भारत एवं पोर्तुगीज (भारत) में विप्लव छ पृष्ठ 801-833.

कोल्हापुर में 27वीं पैदल सैन्य-पलटन की बगावत

31 जुलाई, 1857

रत्नागिरि की स्थिति

अगस्त-नवम्बर, 1857
1856 : सितम्बर, अण्णा फड़णीस और तांत्या मोहिते के द्वारा कोल्हापुर की गद्दी के पुनर्स्थापन की योजना प्रारम्भ हुई।
1857 : जुलाई, पुणे के बन्दूकधारी सैनिकों के ट्रेनिंग स्कूल के प्रशिक्षणुओं ने सूचना दी कि कारतूस 10 अगस्त को पहुँचेंगे।
1857 : 31 जुलाई, 27वीं पैदल सेना की पलटन का विद्रोह।
1857 : 2 अगस्त, 27वीं पैदल सेना के लोगों ने रत्नागिरि के रास्ते में तीन यूरोपियन अफसरों को मार दिया था।
1857 : 18 अगस्त, 27वीं पैदल सेना पलटन को कोल्हापुर और रत्नागिरी में निःशस्त्र कर दिया गया था।
1857 : नवम्बर, अयोध्या के रामचार्य का विद्रोह भड़काने के उद्देश्य से रत्नगिरि आगमन।
1858 : मई, 27वीं पैदल सेना ब्रितानी सेना की सूची से खारिज हुई।


कोल्हापुर एक प्रमुख मराठा राज्य था, जिसकी परम्परा महान शिवाजी से चली आ रही थी। शिवाजी महाराष्ट्र में स्वराज्य के संस्थापक थे। 1 अकटूबर, 1812 की संधि के अन्तर्गत वह ब्रितानियों के अधीन हो गया था।

1857 से पहले लगभग एक दशक से कोल्हापुर के लोगों में ब्रितानियों के विरूद्ध असंतोष सुलग रहा था। वर्ष 1844 में कोल्हापुर में गम्भीर विद्रोह हुआ जो शीघ्र ही ब्रितानियों के विरूद्ध बगावत से बदल गया। 13 अक्टूबर, 1844 को सामनगढ़ के किले पर क्रांतिकारियों ने अधिकार कर लिया। कर्नल ओवान्स को गिरफ्तार करके 'पन्हला किले' में कैद कर लिया गया बाद में उसको ब्रितानी फौज ने मुक्त करा लिया।

1857 में, 27वी स्थानीय पैदल सेना जो कोल्हापुर में स्थापित थी उसके सिपाहियों ने देश के अन्य भागों के क्रांतिकारियों से सम्पर्क स्थापित कर लिए थे। यह बेलगाँव पलटन के सिपाहियों से परामर्श करके विद्रोह की योजन बना रहे थे। उन्हें सूचना मिली कि ग्वालियर की बैजाबाई शिंदे कोल्हापुर आकर राष्ट्रभक्त सेना का संचालन करेंगी। उनके आगमन की सूचना भी सिपाहियों के बीच चर्चा का विषय था। पलटन के अन्दर, क्रांति का नेतृत्व करने वालों के घरों में बैठकें हो रही थी। कोल्हापुर के कुछ लोग पुणे के बन्दूकधारी सेना के प्रशिक्षार्थियों में से थे। उन्होंने अपने कोल्हापुर के साथियों को संदेश भेजा कि 10 अगस्त 1857 को कोल्हापुर में कारतूस आ जायेंगे। इस पर 27वीं स्थानीय पैदल सेना के नेताओं ने नगर के स्थानीय नागरिक नेताओं से परामर्श करके उसी दिन विद्रोह निश्चित किया परन्तु यह योजना शायद ब्रितानी अफसरों को ज्ञात हो गई। फलस्वरूप 312 जुलाई को एक यहूदी एडजुटेण्ट ने अपने परिवार को सुरक्षा की दृष्टि से बाहर भेज दिया। इससे सिपाहियों को संदेह हो गया। उसी दिन (31 जुलाई) को विद्रोही नेताओं ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई। स्थानीय तारघर के एक भारतीय कर्मचारी ने यह सूचना दी कि मुंबई से कुछ युरोपवासी सिपाही कोल्हापुर भेजे जा रहे हैं। बैठक में यह निश्चित किया गया कि 31 जुलाई कि रात्रि को ही क्रांति आरम्भ कर दी जाएगी। परन्तु इतना समय नहीं था कि नगर के स्थानीय नेताओं की सहायता से कार्य पूर्ण किया जा सके, अत: विद्रोह की प्रथम रात्रि को नगरवासी इसमें सम्मिलित नहीं हो सके।

सेना में विद्रोह की शुरूवात रामजी शिरसाट, 200 सिपाही एवं कुछ अन्य लोगों ने कि। इस विद्रोह में उनका सहयोग अधिकतर मराठा तथा पलटन के घ् परदेशियों ' ने भी किया था।

निम्न उपस्थिति पंजिका के एक अंश से प्रकट होता है कि 27वीं स्थानीय पैदल पलटन से ये व्यक्ति 31 जुलाई, 1857 को कोल्हापुर में बिना अनुमति के अनुपस्थित रहे थे।

संख्या

सामान्यश्रेणी

नाम

कंपनी

लम्बाई

जाति

मूलस्थान

फुट/इंच

1088

निजी

गुरूबक्श सुकूल

गोला फेंकने

5 ' 8।। छ

परदेशी

लखनऊ

160

निजी

रामजी शिरसाट

गोला

6 ' 2 ।। छ

मरहठा

पावीश

 

 

 

 

 

 

(मालवण)

732

निजी

सम्भाजी चव्हाणँ

10 वा

5 ' 5 ।। छ

मरहठा

खेड(कोंकण)

1190

रंगरूट

गोविन्दराव मोरे

गोला

5 ' 6 ।। छ

मरहठा

खेडमल

 

 

रामवख्श पाण्डे

गोला

5 ' 9 ।। छ

परदेशी

वाकोसी

379

निज

बबली मालकर

10 वाँ

5 ' 5 ।। छ

मराठा

सावंतवाड़ी

364

निज

ढोन्डी देवकर

9वाँ

5 ' 5 ।। छ

मराठा

मालवण

499

निज

शावजी पंवार

1वाँ

5 ' 4 ।। छ

मराठा

पालघर

342

निज

तनु जगताप

7वाँ

5 ' 6 ।। छ

पालघर

(स्वर्ण दुर्ग)

654

निज

रामजी जाधव

अल्प भार

5 ' 6 ।। छ

मराठा

खेडमल

'तनु जगताप' और 'रामजी जाधव' जो कोल्हापुर की पलटन को छोड़कर भागे थे, उन्हें बाद में रत्नागिरि जिले में पकड़ गया था।

'महावीर मिसर' (निजी) जो बाद में जेल में बन्दी थे, उन्होंने जमादार इमाम खान को बतलाया कि वह स्वयं उन लोगों में से थे जिन्होंने अधिकारियों को लूटा था लेकिन जब उन्हें एड्जुुटेण्ट के ऑफिस में बुलाया गया तो उन्होंने कुछ भी बताने से इन्कार कर दिया छ (मुंबई पी. डी. खण्ड 31 वर्ष 1857 पृ. 197)

विद्रोह की शुरूवात पलटन के खजाने और यूरोपिय अधिकारियों के घरों पर आक्रमण से साथ हुई थी। घ् मारो फिरंगी को ' (यूरोपवासी को मारो) के घोष आकाश को फाड रहे हो ऐसा प्रतीत हो रहा थो। इसके बाद पागहा (अरतवल) पर आक्रमण हुआ। पुनः विद्रोही रत्नागिरी की ओर बढ़ गये, जहाँ 27वीं स्थानीय पैदल सेना के लगभग 250 सैनिको की टुकड़ी स्थापित थी। रास्ते में 2 अगस्त को सोलकर गाँव में उन तीन यूरोपीय अधिकारियों को मार डाला गया जो कोल्हापुर में विद्रोह भड़कने पर बच निकले थे।

विद्रोह के दूसरे दिन, कोल्हापुर नगर में जन साधारण को जागृत करने का प्रयास किया गया। 27वीं स्थानीय पैदल सेना के कुछ सैनिक नगर मे पहुँचे और नगरवासियों के साथ मिलकर उन्होंने किले के फाटक और महल पर कब्जा कर लिया। चीमा साहब, जो कोल्हापुर के राजा के भाई थे वे ब्रितानियों के विरूद्ध नगर तथा सेना, दोनों को विद्रोह की प्रेरणा देतेे थे।

कोल्हापुर की स्थिति से निपटने के लिए बम्बई प्रशासन ने कर्लन ल ग्रान्ड जैकब को विशेष आयुक्त नियुक्त किया और उसके हाथों में कोल्हापुर और सावन्तवाड़ी की फौजी टुकड़ियों की कमान सौंप दी। उसने  अपनी कृति च् पश्चिमी भारत गदर से पहले और पश्चात् छ जो 1871 में प्रकाशित हुई, में कोल्हापुर विद्रोह का वास्तविक विवरण दिया है।

ब्रितानी अधिकारी, प्रमाणों के आधार पर यह जान गए कि (1) गदर की आग लम्बे अन्तराल से सुलग रही थी। (2) लगभग सभी देशी अधिकारी इसमें लिप्त थें। (3) बहुत से अधिकारी बंगाल के साथ पत्र-व्यवहार में व्यस्त थे और (4) पुणे की बन्दूकधारी स्कूल के प्रशिक्षार्थियों ने, कोल्हापुर में कारतूसों के बारे में सूचना पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भाग लिया था। (वही पृ. 175)

मेजर जनरल जैकब ने, 21 मार्च, 1858 को मुंबई प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत की गई अपनी रपट में लिखा था कि- (1) 27वीं स्थानीय पैदल सेना का कोल्हापुर बेलगाँव (29वीं)  और धारवाड़ (28वीं) के मध्य परस्पर सम्पर्क था। (3) चीमा साहब का सम्पर्क नाना साहब पेशवा से था जिनका दूत उनके लिए एक जडाउ तलवार लाया था। (4) चीमा साहब के सम्पर्क ग्वालियर के नेताओं से भी थे, जहाँ से एक प्रतिनिधि मण्डल किसी बहाने से कोल्हापुर आया था और चीमा साहब ने जून, 1857 को सातारा के दूतों को बताया कि कोल्हापुर के सिपाही और कुछ मुखिया भी विद्रोह में सहयोग करने के लिए तैयार हैं औैर सतारा से संकेत मिलने की प्रतिक्षा कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि हमारे सुनने में आया है कि कोल्हापुर और पुणे का, बन्दूकधारी सेना के स्कूल से सम्पर्क था और नाना साहब के एक दूत, जो चीमा साहब के पास आए थे, उन्होंने दक्षिण के केन्द्रों का भ्रमण किया था। तथा वह उस समय तक 40 विभिन्न पलटनों से सहयोग प्राप्त कर चुके थे।

इन सभी विचारों और अन्य प्रकार की घटनाओ से प्रकट होता है कि स्वतंत्रता की लड़ाई के नेताओं ने इसे वास्तव में विदेशी प्रशासन के विरूद्ध राष्ट्रीय युद्ध का स्वरूप प्रदान किया था।

ब्रितानियों ने शीघ्र ही इस विद्रोह को दबा दिया। 18 अगस्त को 27वीं स्थानीय पैदल सेना ने कोल्हापुर के एक सार्वजनिक प्रशिक्षण विद्यालय को निःशस्त्र कर दिया। ऐसे ही 27वीं स्थानीय पैदल सेना की टुकड़ी को रत्नागिरी में भी निःशस्त्र कर दिया गया। उसी दिन 18 अगस्त को उन 120 मनुष्यों के अभियोगों के लिए फौजी अदालत बैठाई गई, जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था उन्हें तत्काल पारित एक्ट 14 वर्ष 1857 के अन्तर्गत लाया गया।

अगले दिन 21 विद्रोही अपराधी घोषित किए गए और उन्हें मृत्यु दण्ड दिया गया उनमे से आठ अपराधियों को तोप से उड़ा दिया गया। राजा की चार तोप इस कार्य के लिए उधार ली गई। दो अपराधियों को फाँसी पर लटका दिया गया और ग्यारह को बन्दूकधारी सेना ने गोली मार दी। जैकब लिखते है कि उन सभी ने अपने रहस्य बताने से इन्कार कर दिया और धैर्य के साथ मृत्यु का सामना किया।

9 सितम्बर, 1857 तक कुल मिलाकर 51 आदमी फाँसी पर लटका दिये गए, न्यायिक अभियोग प्रक्रिया बाद में भी चलती रही।

मई, 1858 में ब्रिटिश सरकार ने अपनी फौज की सूची में से 27वीं स्थानीय दल सेना की टुकड़ी को हटा दिया और इस प्रकार दक्षिण भारत में स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास के एक उज्जवल अध्याय का अन्त हुआ।

ब्रिटिश संसद दस्तावजे पर खण्ड 23, वर्ष 1859, पृ. 485 में दिये ऑकड़ों के अनुसार 27वीं स्थानीय पैदल पलटन कोल्हापुर के 31 जुलाई, 1857 के विद्रोह में सम्बन्धित फौजी अदालत के निम्नांकित निर्णय प्राप्त होते हैं-

फाँसी

63

आजीवन निष्कासन

66

बन्दी

18

सजाएँ कम हुइ

4

क्षमादान

14

योग

165

प्रमुख नेता
चीमा साहब

रामजी शिरसाट- यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक टुकड़ी के फौजी दल में थे यह विद्रोह भड़काने में प्रमुख थे। 31 जुलाई, 1857 की रात को उन्होंने अपने 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक टुकड़ी के लोगों को शास्त्रागार पर अधिकार कर लेने और पलटन के कोष को लूट लेने के लिए कहा। उन्होंने रामजी जाधव और रामचरन के साथ पलटन के यूरोपीय अफसरों को मार डालने का प्रस्ताव रखा और उस कार्य का नेतृत्व किया। विद्रोह के पश्चात् वह बच निकले। वह लोगों को निकालने में अग्रणी थे और बहुत खतरनाक थे। (रामजी के निकल भागने के बार में जैकब का एच. एल. एण्डरसन को लिख गया 25 सितम्बर, 1857 का पत्र।)

कोल्हापुर और सावन्तवाड़ी के पुलिस अधीक्षक ने उन्हेंे ढूँढ़ने के लिए तीन-तीन सौ रूपये के पुरस्कार घोषित किए। सावन्तवाड़ी पुलिस ने उनका पीछा किया और पकड़ लिया और जब उन्होंने पुनः निकल भागने का प्रायस किया तो उन्हेंे सावन्तवाड़ी स्टेट के कुडाल तालुका के पावशी गाँव के जंगल में 6 नवम्बर, 1857 को गोली से मार दिया गया।

बलवन्त राव नाईक निम्बलाकर उर्फ बाला साहेब उर्फ राव साहेब
यह एक मराठा सरदार थे इनकी आयु लगभग 40 वर्ष थी। कोल्हापुर नगर स्थित 27वीं स्थानीय पैदल सैन्य की निगरानी चौकी के पास उनकी एक बडी हवेली थी। वह अक्सर सफेद घोड़े पर सवार होकर फौज के कैम्प में आते और फौजियों से विद्रोह की योजना के विषय में विचार-विमर्श करते थे। सफलता के विषय में आस्वस्त हो जाने के पश्चात् विद्रोह से एक दिन पहले वह ग्वालिर चले गए।

उसके पश्चात् वह वहीं रहने लगे। ब्रितानी अधिकारियों ने उन्हें पकडनेे के लिए बड़े प्रयास कियें, क्योंकि उनके पास बलवन्त राव को अपराधी ठहराने के लिए पर्याप्त प्रमाण थे। उनकी अनुपस्थिति में उनके दो गाँव नेज और बदावर जिनकी वार्षिक आय 2627 रू. थी, ब्रिटिश सरकार ने कुर्क कर लिए। अन्तत उन्हें ग्वालियर दरबार ने गिरफ्तार कर लिया और 23 अगस्त, 1858 को ग्वालियर के ब्रितानी राजनैतिक प्रतिनिधि को सौंप दिया। तत्पश्चात् उन्हें असीरगढ़ और इन्दौर होते हुए कोल्हापुर लाया गया जहाँ उनके विरूद्ध नियमानुसार कार्यवाही की गई।

3. अन्य विशेष व्यक्ति

सेन दिन सिंह
यह 27वीं स्थानीय पैदल सेना की पलटन चौथी कम्पनी के एक सूबेदार थे, वह गदर के अपराधी पाए गए और 18-31858 को उन्हें मृत्यु दण्ड दिया गया व 11-31858 को उन्हें कोल्हापुर में तोप से उड़ा दिया गया।

इमाम खान
यह 27वीं स्थानीय पैदल सेना की पलटन की हथगोला कम्पनी के सूबेदार थे। उन्होंने पलटन के व्यक्तियों को बताया कि चर्बी लगे कारतूस आ गए हैं और उन्हें 10 अगस्त, 1857 को निकाला जाएगा और हम लोग फौज के ब्रिटिश अधिकारियों से इसके विरूद्ध अनुरोध करेंगे और यदि अनुकूल उत्तर नहीं मिला तो हम भी वही करेंगे जैसा हमारे साथियों ने बंगाल में किया था।

दारूद बेग
यह 27वीं स्थानयी पैदल सैनिक पलटन के सूबेदार थे यह बेलगाम  और सतारा से पत्र-व्यवहार करते थे; उन्होंने पलटन के लोगों को बताया कि चर्बी लगे कारतूस बेलगाम और सतारा में भी दिये जायेंगे और वहाँ के लोग भी विद्रोह के लिए तत्पर हैं। गदर के आरोप में उनकोे 10-3-1858 को मृत्यु दण्ड दिया गया तथा 11-3-1858 को उनको कोल्हापुर में तोप से उड़ा दिया गया।

श्रीधर सीताराम फड़णीस उर्फ आण्णा
यह चीमा साहब को सक्रिय विद्रोह की योजना के विषय नें सुझाव देते थे। 26 जुलाई 1858 को विशेष आयुक्त अदालत में उन पर अभियोग चलाया गया और उनको आजीवन निष्कासन की सजा दी गई। विशेष आयुक्त ने अपने निर्णय में लिखा कि अण्णा फड़नीस और तांत्या मोहिते ने च् सितम्बर, 1856 से ही षड्यंत्रों की एक लम्बी श्रृंखला प्रदर्शित की, जिसके पीछे उद्देश्य था; कोल्हापुर की गद्दी को पुर्नस्थापित करना, पहले सतारा के दूतों के साथ उनके शासन के उद्देश्य के लिए और बाद में पूर्व के दूतों के साथ मिलकर बड़े षड्यंत्र के लिए और यहाँ के स्थानीय फौजियों की राज भक्ति को नष्ट करने के आदि उनके उद्देश्य थे। छ मुंबई पुरालेख पी.डी. खण्ड 14 पृष्ठ 245-339 न्यायिक कार्यवाही की प्रक्रिया एस. एम. एच. एफ. एम. आई. खण्ड 1, पृष्ठ 286)

तात्या मोहिते (गंगाजी राव उर्फ हम्बीर राव उर्फ तात्या मोहिते)
यह कोल्हापुर के निवासी थे तथा दौलतराव के पुत्र चीमा साहब के गोपनीय सहायक थे। यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन के व्यक्तियों से विद्रोह की योजना के विषय में विचार-विमर्श करने आते थे। इन्हें 26 जुलाई, 1858 को कोल्हापुर के विशेष आयुक्त अदालत के द्वारा आजीवन निष्कासन की सजा दी गई।

राम सिंह
यह इन्द्रसिंह के पुत्र थे, कोल्हापुर के निवासी ब्रिटिश सरकार की धारा 11, 14 और 16 वर्ष 1857 के अंतर्गत बाबजी भुजंग भोसले नाइक, भूला और कृष्णा गोपाल चारण के साथ न्यायिक प्रक्रिया के लिए लाए गए थे। उन पर जून, 1857 को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संग्राम के लिए षड़यंत्र करने का आरोप था। वह सीता राम रागों (पुत्र रंगो बापूजी गुप्ते) सतारा आदि के साथ पत्र व्यवहार करते थे। रामसिंह पर यह भी आरोप था कि उन्होंने कर्नल मालकम के साथ धृष्टता की थी। 1857 की ग्रीष्मऋतु में रामसिंह पन्हाला में थे और महाराजा के मंदिर में ठहरे थे जहाँ पन्हाला के गदकरी लोग एक सभा में एकत्रित हुए थे। बाद में रामसिंह को आजीवन निष्कासन की सजा दी गई।

बाबजी, पुत्र भुजंग भोसले नाईक, उर्फ़ भूला
यह मराठा थे व कोल्हापुर के निवासी थे इन्हें भोरगाँव में गिरफ़्तार किया गया था। 2 जनवरी, 1858 को इनको ब्रिटिश अदालत कोल्हापुर, के द्वारा आजीवन स्वदेश निष्कासन की सजा दी गई। 

नागोजी राव, पुत्र भवानजी राव पँवार
इनकी आयु 31 थी ये मराठा थे तथा जाम बोटी (जिला बेलगाव) के निवासी थे। इन पर बाद में राजद्रोह का आरोप लगाया गया था। रामराव गंगाधर वझे जो पहले बाजीराव पेशवा की सेवा में रहे थे। उन्होंने उनके साथ राजद्रोह और विद्रोह के विषय में वार्तालाप किया तथा नाना साहब पेशवा को सैनिक उपलब्ध करवाए। वह स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित होने के लिए तैयार थे।

रामराव गंगाधर वझे
यह पहले स्वर्गीय बाजीराव पेशवा की सेवा में थे तथा नाना साहब पेशवा के लिए सैनिक एकत्रित करने की योजना के संचालक भी थे।

शिव मुकन्द सावन्त
यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन की नं. 2361 छठवीं कँपनी के हवलदार थे; यह बापू शिन्दे के साथ बलवन्त राव नाइक निम्बालकार से मिलने कोल्हापुर नगर गए और पलटन में नए कारतूसों के बाँटे जाने की संभावना के कारण इन्होंने विद्रोह करने की योजना पर विचार-विमर्श किया। इस विषय पर पलटन के अन्य नेताओं से भी वार्तालाप हुआ था। 

बाबू शिन्दे ( मराठा)
यह 27वीं पैदल सैनिक पलटन के जमादार थे। यह चीमा साहब को सूचनाएँ देते थे। उन्होंने कहा कि नए कारतूसों के वितरण से एक दिन पहले अधिकारियों को एक प्रार्थना-पत्र दिया जाना चाहिए और अनुकूल उत्तर न मिलने पर उन्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा पहले से तय था। 

बाबाजी ठाकुर (जाधव)
यह विद्रोह के समय बेलगाँव गए और वहाँ से एक पत्र लेकर आए जो पलटन की 5वीं कँपनी के सूबेदार ने दाऊद बेग को लिखा था। यह पत्र विद्रोह की योजना के बारे में था। यह पत्र सूबेदार सेनदीन सिंह शिन्दे, जमादार सचान और अन्य सिपाहियों को भी दिखाया गया था।

आत्मा राम भोंसले ( मराठा)
यह कोल्हापुर के निवासी थे तथा स्वतंत्रता संग्राम के संचालन हेतु धन उपलब्ध कराने के लिए पुणे के बलवन्तराव बाबजी के साथ पत्र-व्यवहार किया करते थे।

केशव परशुराम
यह रंगो बाबूजी के पुत्र "सीताराम" और कुछ अन्य व्यक्तियों के साथ भोर गाँव (भोरे गाँव)  और रामचंद्र डोडो के घर गए थे और वहाँ विद्रोह की योजना पर इन्होंने विचार-विमर्श किया था। वहां केशव परशुराम सीताराम रंगो, भाऊदाजी मोरे, भोरगाम के पाटिल, बलवन्त नारायण, भोरगाम के एक और पाटिल, बाबजी नाईक आदि रामचंद्र डोडो के घर में पकड़े गए थे।

4. शहीद
(6-11-1857 को कुदाल ताल्लुक़ा के पावसी गाँव के जंगलों में मार दिए गए)

सूबेदार सेनदीन सिंह
(इन्हें 11-3-1885 को कोल्हापुर में तोप से उड़ा दिया गया था।)

सूबेदार दाऊद बेग
(इन्हें 11-3-1885 को कोल्हापुर में तोप से उड़ा दिया गया था।)
उन आदमियों की कुल संख्या जिन पर अभियोग चलाया गया : 165
27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन के व्यक्ति

(i) जो 19-8-1957 को मार दिये गये :
8 को तोप से उड़ा दिया गया। :21
2 को फाँसी दी गई।
11 को बन्दूकधारी सेना ने गोली मारी।
(ii) 20-8-1857 से 9-9-1857 तक
मारे गये व्यक्ति :31
9-9-1857 तक मारे गये कुल मनुष्य : 51
(iii) 9-9-1857 के बाद मारे गये : 12
कुल मारे गये पुरूषों का योग : 63

5 बन्दी
समुद्र पार आजीवन निष्कासन
(कुल 66 आदमी 1857 में फौजी अदालत द्वारा आजीवन निष्कासित किए गए। जिन 165 व्यक्तियों पर अभियोग चला उनमें से जिनकी आजीवन निष्कासन सजा सुनिश्चित की जा चूकी है उनके नाम निम्नांकित है)
(अ) शिरदार सीतराम फड़णीस (26-7-1858)
तात्या मोहिते (26-7-1858)
गणु सावंत
(बी) फौजी अदालत कोल्हापुर (27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन आजन्म निष्कासन की सजाकी तिथि (थाना जेल के अभिलेख से प्राप्त)

भानू साठे

22-10-1857

गिरवर कुणवी

21-19-1957

रामजी जगताप

26-10-1957

गोपाल सल्वी

27-10-1957

गोपाल करसोवकर

28-10-1957

बाबाजी सावन्त

6-11-1857

राम परब

6-11-1957

मेंदी मोची

6-11-1957

कासिब खान

6-11-1957

विठू वैनगनकर

19-11-1957

त्रिम्बक आवन्त

17-12-1857

ढाकू घाटी

24-12-1857

पान्डे पादे

9-2-1858

महादेव चव्हाण

20-1-1858

गोविन्द गौडा

20-1-1858

झिल्लु कोचरकर

20-1-1858

बाप पाइकर

22-1-1858

रामसिंह इंद्रसिंह

2-1-1858

बाबाजी भुंजग भोंसले नाईक

2-1-1858

कृष्णागोपाल चव्हाण

2-1-1858

लिम्बा भवानी मोरे

8-12-1857

राम रघु शिंदे

8-12-1857

शुभना बापू जाधव

8-12-1857

नरायन पिराजी शिंदे

8-12-1857

जिवबा मीरू पवाँर

8-12-1857

(नोट: देशनिष्कासन की सजा पाए हुए अपराधी 1 जून, 1858 से अपने-अपने गन्तव्य स्थानों को भेज दिये गये- कांेकण अदालत, तनाह 3 जुलाई, 1858 हस्ताक्षर कार्यकारी सत्र न्यायाधीश)

(ii) अन्य कैदी :
कोल्हापुर में फौजी अदालत (27वीं पैदल पलटन)
आयुक्त धारा 14-1857
(कैद की अवधि और तारीख: थाना जेल के अभिलेखों से)

शिवबा सावन्त

2 वर्ष सश्रम कारावास 31-8-1857

काशी सकपाल

2 वर्ष सश्रम कारावास 31-8-1857

लक्ष्मण परब

2 वर्ष सश्रम कारावास 31-8-1857

गोविन्द राव मोरे

3 वर्ष सश्रम कारावास 27-10-1857

रघुजी हाडघई

5 वर्ष सश्रम कारावास 9-11-1857

बलवन्त बोड

2 वर्ष सश्रम कारावास 9-11-1857

येलप्पा

5 वर्ष सश्रम कारावास 4-9-1857

सत्तु शुभना नवलकर

5 वर्ष सश्रम कारावास 19-4-1858

भद्दू भगत

2 वर्ष सश्रम कारावास 19-4-1858

येसु गोडा

5 वर्ष सश्रम कारावास 19-4-1858

सखाराम डावरे

2 वर्ष सश्रम कारावास 19-4-1858

बाबू कदम

2 वर्ष सश्रम कारावास 19-4-1858

सादू सावन्त

2 वर्ष सश्रम कारावास 19-4-1858

जवबा राव

2 वर्ष सश्रम कारावास 22-12-1857

कृष्ण जी बाग्ठाकर

2 वर्ष सश्रम कारावास 22-12-1857

येसु ठोरी

2 वर्ष सश्रम कारावास 22-12-1857

चीमा धरमाजी

5 वर्ष सश्रम कारावास 22-12-1857

दाऊ नरसू

5 वर्ष सश्रम कारावास 22-12-1857

कालू नरसू

2 वर्ष सश्रम कारावास 22-12-1857

बुधा पिला जी

2 वर्ष सश्रम कारावास 22-12-1857

राया नरसू

5 वर्ष सश्रम कारावास 22-12-1857

बालू खाण्डया

2 वर्ष सश्रम कारावास 22-12-1857

कामा बोवाजी

5 वर्ष सश्रम कारावास 22-12-1857

गंगा यामाजी

7 वर्ष सश्रम कारावास 12-1-1858

अभामन भीका

5 वर्ष सश्रम कारावास 2-1-1858

ढाकू भीका

7 वर्ष सश्रम कारावास 2-1-1858

भीका काओजी

5 वर्ष सश्रम कारावास 12-1-1858

भीका रूमन

7 वर्ष सश्रम कारावास 12-1-1858

रामचंद्र

5 वर्ष सश्रम कारावास 2-1-1858

अर्जुन रत्ना

5 वर्ष सश्रम कारावास 2-1-1858

यमा ताओजी

5 वर्ष सश्रम कारावास 25-1-1858

शुभना औजी

5 वर्ष सश्रम कारावास 25-1-1858

इम्माइल मन्नू

1 वर्ष सश्रम कारावास 25-1-1858

हरदत्त पांडे

2 वर्ष सश्रम कारावास 10-12-1858

प्रशासनिक जमानत-पत्र नियम धारा 25, 1857 तथा धारा 3 वर्ष 1858 के अन्तर्गत जारी किए कुछ सरकारी कैदी जो 1 जून, 1858 को थाना जेल में थे, विभिन्न जेलों मे पकडें गए थे।

रघु विश्वनाथ

गनेशगिरि गुरू अम्बेकर

सुखलाल गुरू रामप्रसाद

गोविन्द रामचंद्र डोंगरे

शंकर रामदयाल

पुरन बंबी

रामाचार्य

विठोजी पुत्र अप्पा भगत

भगवान दास

मोटूसिंह मेरवान सिंग

कामत प्रसाद हरिलाल

लक्ष्मण धाजिया

गणेश प्रसाद

शिवलाल चोपसिंग

किशन दयाल तिवार

रामचरण

कुशल अहीर

विट्ठल दीवाण

जगन्नाथ अबाजी

शेख खिरन आजम, जमादार

अप्पजी हीराजी, सिपाही

नारायण सिंह बक्त सिंह, सिपाही

बालकिशन दामनलाल, सिहापी

विठूबापू पवार, सिपाही

कडुरका टट्ट, सिपाही

बाबू अम्बखा, सिपाही

शेख घीसा इब्राहा, सिपाही

शेख मोहिदीन, सिपाही

शेख इस्माइल भीख मियां, भालदार

 

दानिश्वर भाई विश्वनाथ भाई

 

अवधूत गुरू बाघम्बरे

सदाशिव आनन्द राव

विनायक त्रियम्बक

रामचंद्र बल्लाल

(बम्बई राजनीतिक विभाग, खण्ड 38, वर्ष 1858 पृष्ठ 5-25)

6. विद्रोह में सम्मिलित अन्य व्यक्ति
(उनमें से संभवतः कुछ को फाँसी पर लटका दिया गया या जीवन भर कालापानी या लम्बी सजा के लिए भेज दिया गया था।)  
महादेव चव्हाण
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में थे।)
साबाजी पंवार
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में थे।)
भाउदाजी मोरे
(यह भोर गाँव के पटेल थे।)
विद्रोही जो मुम्बई में (फरवरी 1847) मे पकडे गए तथा कोल्हापुर न्यायिक प्रक्रिया के लिए भेज दिए गए थे।
बलवन्त नारायण
(यह भोर गाँव के पटेल थे।)
रामचंद्र घांडो
(यह भोर गाँव के निवासी थे।)
तनुबा गुनाजी जगताप उर्फ शेलार
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन की निजी श्रेणी में थे।)
रामजी विठोजी नाईक
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में थे।)
गोविन्द खेमजी वहाविलकर
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में थे।)
बाबली उर्फ बाबू सावाजी मालकर
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में थे।)
महावीहर मिसर
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन के गोलन्दाज थे।)
अब्दुल रहमान के सूबेदार
(इन्होंने क्रांति से सम्बन्धित एक पत्र मुन्शी मुहम्मद हुसैन से जुलाई, 1857 मे प्राप्त किया था।)
मौलवी साहेब
(इनको मुन्शी मोहम्मद हुसैन ने जुलाई, 1857 में बेलगाँव से पत्र लिखा था।)
फकीर साहब
(इन पर 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन छावनी में आने-जाने पर प्रतिबन्ध लगाया गया था।)
मुन्शीदीन, मौलवी साहब
(जिनको मुन्शी मोहम्मद हुसैन ने जुलाई, 1857 में बेलगाँव से पत्र लिखा था।)
मोहिदीन बेग इनामदार-
(य्ह चिकोडी ताल्लुका के रहने वाले थे)
भूदी पान्डे
(मोहिदीन बेग और भूदी पान्डे दोनों 5-7- सौ व्यक्तियों के साथ तैयार थे।)
जामबोटी के मुस्लिम उपदेशक
(इन्होंने विद्रोहियों का पक्ष लेकर जामबोटी के देसाई को परास्त किया था।)
शोरापुर के राजा ( यह सैनिकों के साथ तैयार थे।)
खाँ साहेब
(यह राजेश बाबाजी बावट के रिश्तेदार थे जो स्थानीय पैदल सैनिक पलटन को छोड़ भागे थे।)
पुणे के परदेशी प्रशिक्षु
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन कोल्हापुर की हल्कु टुकड़ी में थे।) वह बन्दूकधारी सेना के विद्यालय में नई कवायद सिखने के लिए पुणे भेजे गए थे। इन्होंने सुबेदार सेन दिन सिंह को कोल्हापुर एक पत्र जुलाई, 1857 में नये कारतूसों के वितरण के विषय में लिखा था।
गोविन्द दलवी पुत्र भाऊ दलवी
(यह 27वीं पैदल स्थानीय पैदल सैनिक पलटन टुकड़ी में निजी श्रेणी में थे।)
बवली परब उर्फ भाऊ सदाशिव ताओला
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में थे।)
सचान
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में जमादार थे।)
सामन्त
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में हवलदार थे)
शेख
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में हवलदार थे, इन्होंने पलटन के व्यक्तियों को बतलाया कि नये चर्बी वाले कारतूसों के दो बक्से कोल्हापुर केम्प में आ गए है और उन्हें कार्यालय में जमा किया गया है।)
बलवन्त सिंह
(यह 27वीं स्थानीय पैदल पलटन में हवलदार थे। इन्होंने सूबेदार इमाम खान को कहा था, च् इन मराठो ं में क्या साहस हैं-वे कुछ नहीं करेंगे। छ प्रत्युत्तर में बापू शिन्दे ने कहा था कि वे अवश्य करेंगे।)
हजारी सिंह
(यह 27वीं स्थानीय सैनिक पलटन की छठवीं कम्पनी में सूबेदार थे। इन्होंने कहा था कि 10 अगस्त को जब नये कारतूस वितरित किए जायेंगे वे विद्रोह कर देंगे जैसा उन्होंने बंगालम में किया गया।)
लक्ष्मण
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में निजी श्रेणी में वेतन चपरासी थे।)
लक्ष्मण
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में जमादार थे, इन्होंने बताया कि पलटन को चर्बी वाले कारतूस बाँटा जाना निश्चित है।)
विठू तोमोकर
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन की छठवीं टुकड़ी में थे।)
घटकर
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन की छठवीं टुकड़ी में थे।)
बैजनाथ
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में जमादार थे बलवन्त राव नाइक निम्बलकर इनसे परामर्श करने आये थे।)
सखु
(कुन्बी-बलवन्त राव नाइक निम्बलकर इनसे परामर्श करने आये थे।)
उदबन्त सिंह
(यह 27वीं स्थानयीय पैदल सैनिक पलटन में हवलदार थे इन्होंने सिफारिश की कि पलटन के सभी यूरोपवासियो को मार डाला जाय जैसा कि बंगाल में किया गया था।)
चाँद खाँ
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन के, चाँद खाँ और उदबन्त सिंह ने पलटन के व्यक्तियों को बताया कि चर्बी वाले कारतूसों के दो थैले ऊँटों के साथ आ गए हैं।)
गनुसावन्त
(27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में थे इन्हें आजन्म निष्कासन पर अण्डमान भेज दिया गया था।)
शेखबुदिम
(यह 27वीं स्थानीय पैदल पलटन में सूबेदार थे।)
पान्डु परब
(यह 27वीं स्थानीय पैदल पलटन में हवलदार थे।)
बाबाजी अकदर
(यह गोविन्द सेठ सुनार और बाबाजी मुकरिया के साथ चीमा साहब की 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन के साथ साँठ-गाँठ में सम्पर्क रखते थे।)
गोविन्द सेठ सुनार
बाबाजी सुनार मुकरिया
रामचरन
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन की पाँचवी कम्पनी में निजी श्रेणी के पलटन के परदेशी व्यक्तियों पर मुखिया थे, इन्होंने यूरोपवासी अधिकारियों को मार डाला था।)
रामजी राधव
(27वीं स्थानयी पैदल सैनिक पलटन की हल्की टुकड़ी में निजी श्रेणी का में थे इन्होंने भी यूरोपवासी अधिकारियों को मारा था। देखें रामजी शिरसाट के के अन्तर्गत।)
मुन्शी मुहम्मद हुसैन
(बेलगाँव से कोल्हापुर के लोगों को क्रांतिकारी पत्र लिखता थे, उनमें वर्णित थी विभिन्न स्थानो ंमें तैयारी कि स्थिति यथा-सातारा, पुणे, चिकोडी, जामबोटी, राजपुर, शोरापुर, मद्रास आदि एस. एम. एच. एफ. एम. आई. खण्ड एक पृष्ठ 266-267। 14 अगस्त 1857 को बेलगाँव में मार दिया गया और भी देखें बेलगाँव में विद्रोह के अन्तर्गत।)
गुरूबख्स सुकुल
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में गोलान्दाज थे।)
सम्भाजी चव्हाण
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में थे।)
गोविन्दराव मोरे
(27वीं स्थानयी पैदल सैनिक पलटन में रंगरूट थे।)
रामबख्श पान्डे
(यह 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन में गोलान्दाज थे)
धोंडी देवकर
(27वीं स्थानयी पदैल सैनिक पलटन की नवीं टुकड़ी में निजी श्रेणी के सिपाही थे।)

7. स्त्रोत
मुंबई पुरालेख पी. डी. खण्ड 1857 खण्ड 26 पृष्ठ 181-189 मुंबई प्रशासन की कोल्हापुर, गया की रपट संख्या 346, वर्ष 1587 दिनाँक सितम्बर 1857(
खण्ड 27 पृष्ठ 277, 576
खण्ड 30 पृष्ठ 47
खण्ड 31 पृष्ठ 13, 157-191, 195-197
खण्ड 32 पृष्ठ 451 158 खण्ड 21 पृष्ठ 627-641 (रामसिंह बाबाजी नाईक, कृष्णाप्पा चव्हाण की अभियोग की प्रक्रिया)
खण्ड 23 पृष्ठ 145-150
खण्ड 24 पृष्ठ 185-197, 241, 245-284, 299-301, 535, 543.
खण्ड 26 पृष्ठ 121-135
खण्ड 33 पृष्ठ 91-101, 247-248
खण्ड 34 पृष्ठ 241-339 (अण्णा फड़नीस और तात्या मोहिते के अभियोगों की प्रक्रिया)
खण्ड 35 पृष्ठ 155-162
खण्ड 38 पृष्ठ 5-25
एस. एम. एफ. एच. खण्ड 1, पृष्ठ 258-291 बम्बई जिला गजिटियर खण्ड 24 कोल्हापुर मुंबई 1886 महाराष्ट्र स्ट्रेट गजटियर कोल्हापुर (मुंबई 1960) ग्रेट ब्रिटेन संसद पृष्ठ 1859 पूर्वी भारत फौजी अदालत जैकब, पश्विम भारत, पृष्ठ 149-203.

रत्नागिरि की स्थिति
अगस्त, 1857 में ब्रिटिश फ़ौज की 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन के 200 जवानों की टुकड़ी रत्नागिरी में स्थापित थी। पलटन की मुख्य शाखा का मुख्यालय रत्नागिरि में ही था। जैसे ही 31 जुलाई, 1857 को कोल्हापुर पलटन में विद्रोह उठा, बाग़ी रत्नागिरि की ओर बढ़े। यहाँ की सेना के लोगों में अपने साथियों के साथ स्वातंत्र्य संग्राम में सम्मिलित होने के लिए बड़ी बेचैनी थी। स्थिति गंभीर थी, अतः ब्रिटिश सरकार ने जल्दी ही एक जल-नाब मुंबई से भेजी ताकि रत्नागिरी से यूरोपवासियों को निकाला जा सके। इस प्रकार भेजी गई पानी की नाव मीरया बंदरगाह में खड़ी की गई। अँग्रेज़ सिपाहियों की एक टुकड़ी और ब्ल्युं जैकेट्स ने उतर कर स्थिति का सामना करने और यूरोपवासी महिलाओं और बच्चों को रत्नागिरी से बम्बई ले जाने का प्रयास किया। 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन की रत्नागिरी स्थित टुकड़ी को भी मुख्य रेजिमेंट के साथ ही 18 अगस्त, 1857 को निशस्त्र कर दिया गया। मई, 1858 में पूरी की पूरी पलटन को ब्रिटिश फ़ौज की सूची से निष्कासित कर दिया गया।

नवंबर, 1857 में एक व्यक्ति, जिनकी आयु 50 वर्ष थी, तथा जो अपने आपको रामाचार्य कहते थे और रामानुज पंथ के ब्राह्मण थे रत्नागिरी आए। वह अयोध्या, बिहार और कलकत्ता से परिचित थे और गुजरात, सिंध, दक्षिण और अन्य तमाम स्थानों पर घुम आए थे और कई भाषाओं को जानते थे उन्हें रत्नागिरि के मजिस्ट्रेट ने गिरफ़्तार कर लिया। रामाचार्य के बारे में बंबई के आयुक्त को लिखे गए अपने पत्र दिनांक 23 नवंबर, 1857 में मजिस्ट्रेट ने व्यक्त किया कि कोई भी दूसरा व्यक्ति असंतोष और राजद्रोह फैलाने में उनसे अधिक उपयुक्त संदेशवाहक नहीं हो सकता। छ (बंबई पी.टी. खंड 32 वर्ष 1857 पृष्ठ 71-75)। रामाचार्य के साथ ही उनके सेवक भगवान दास जो राजपूताना के निवासी थे, उन दोनों को मजिस्ट्रेट ने गिरफ़्तार कर लिया और बम्बई भेज दिया। यह पाया गया कि रामाचार्य का पुणे के गंगा प्रसाद गोस्वामी के साथ घन संबंधी कुछ-कुछ लेन-देन था। एक व्यक्ति "बोम्बाईल" पुत्र फजीर खाँ जो कोंकण-रत्नागिरी के थे, थाना जेल में 12 फ़रवरी, 1857 को राज्य बंदी के रूप में आए। बाद में 24 मार्च, 1858 को वह जेल के अस्तपताल में ही मर गए।

इस प्रकार 27वीं स्थानीय पैदल सैनिक पलटन की रत्नागिरि स्थित टुकड़ी के विद्रोह में उठ खड़े होने में असफल होने पर भी, बाद में इधर-उधर विद्रोह की वारदातें होती रहीं। मनुष्यों की गिरफ़्तारियाँ विद्रोह भड़काने और राजद्रोह के आरोप लगाकर की जा रही थी और उनको जेल में बंदी बनाया जाता था।

2. शहीद
बाम्बाईल पुत्र फूजी खाँ
(यह 24 मार्च को थाना जेल में शहीद हो गए)

3 बंदी
रामाचार्य (पुत्र कृष्णाचार्य)
भगवान दास 

4 स्त्रोत :
मुंबई पुरालेख पी. डी. खंड
26 वर्ष 1857 पृष्ठ 187-189
32 का "" 1857 का पृ. 71-75
21" 1858" 185-221
25 1858 का पृ. 217-219
(मुंबई जिला गजटियर खण्ड 10 रत्नागिरी एवं सावन्तवाड़ी-मुंबई 1880)

कोल्हापुर में विद्रोह

6-7 दिसंबर
1857 : 6 दिसंबर, स्वतंत्रता सेनानियों ने कोल्हापुर पर आक्रमण करके अपना अधिकार कर लिया।
1857 : 7 दिसंबर, ब्रितानियों ने कोल्हापुर को फिर से अपने अधिकार में ले लिया।
1869 : 15 मई, चीमा साहब की कराँची में मृत्यु।

जुलाई, 1857 में विद्रोह की असफलता के पश्चात् कोल्हापुर के राजा के छोटे भाई, ' चीमा साहब' के नेतृत्व में फिर से अपना संगठन बनाने लगे। वह जुलाई के सैनिक-विद्रोह के प्रमुख प्रेरक थे। पुराने कोल्हापुर राज्य की रानी, ताई बाई ने कोल्हापुर में पुनः क्रांति को प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। नवंबर, 1857 के मध्य में ब्रिटिश अधिकारियों को इस नए आक्रमण की भनक लग गई।

मेजर जनरल लग्राड जैकब (कोल्हापुर के विशेष आयुक्त) ने 21 नवंबर, को बेलगांव के लेफ्टिनेन्ट कर्नल पेल्बी को एक पत्र में लिखा और बताया कि च् पूूरे राज्य में ब्रिटिश सरकार के प्रति बड़ी घृणा की भावना है और किसी विपरीत स्थिति में यह घृणा संघर्ष का रूप ले सकती है। (मुंबई पुरालेख पी. डी. खंड 31 वर्ष, 1857 पृष्ठ 597-601, पत्र संख्या 216 वर्ष 1857) जैकब ने यह भी लिखा कि मुंबई से प्रकाशित होने वाले दो मराठी पत्रों (जो कोल्हापुर में चलते थे )े ने, 14 नवंबर के च् वर्तमान सार छ और 16 नवंबर, 1857 के च् वृत्तसार छ तथा आर्य समाचार-पत्र ने, इस विश्वास को जमाए रखा कि नाना साहब पेशवा शीघ्र ही स्वतंत्रता को फिर से स्थापित करने हेतु एक बड़ी सेना लायेंगे।

4 दिसंबर, 1857 को लगभग 500 सैनिक, जिनमें कोल्हापुर नगरवासी, पन्हला क़िले के सैनिक, ब्रिटिश सेना के कुछ सिपाही योजनाबद्ध विद्रोह के रूप में गुप्त रूप से कोल्हापुर से 10 मील दूर स्थित एक गाँव के जंगल में एकत्रित हुए। उनके प्रमुख नेता सोडाजी नाईक (कोल्हापुर के अंगरक्षक टुकड़ी में अधिकारी) थे। ज्योति राव उर्फ़ भाऊसाहब घाटगे ने भी विद्रोह के संचालन में मुख्य भाग लिया था। 5 दिसंबर या 6 दिसंबर, 1857 को इस एकत्रित सेना ने नगर के मुख्य द्वार पर घावा बोलकर नगर की क़िलेबंदी पर आक्रमण कर दिया। वे लोग एक तोप लेकर आए और यह धमकी दी कि यदि राजा की सरकार आत्म-समर्पण नहीं करेगी तो वे वहाँ तोप दाग़ देंगे। बिना किसी विरोध के नगर उनके कब्जे में आ गया और अँग्रेज़ अधिकारियों को संदेश मिला कि ऐसा इस कारण हुआ क्योंकि राज्य की सरकार से उनकी साँठ-गाँठ थी। मेजर जनरल ल ग्रान्ड का मत था कि च् सरकार की साँठ-गाँठ के बिना ऐसा संभव होना नामुमकिन था। छ (जैकब पश्चिमी भारत पृष्ठ 183)। देशभक्त सेनाएँ क़िले के दरवाजे पर ग्रान्ड जैकब के कैंप पर फिर से इस वहाँ आक्रमण करने के इरादे से एकत्रित हुई। इसी मध्य जैकब की सेनाएँ लड़ते-लड़ते शहर के फ़ाटक तक आ पहुँची और बाद में महल के चोराहे में प्रवेश कर गई। नगर की जेल में कई बंदी थे जिनमें कोल्हापुर के सैनिक विद्रोह के बाग़ी भी शामिल थे तथा जिन्हें समुद्र पार आजीवन निष्कासन दिया गया था, उन्हें नगर के लोगों के द्वारा छुड़ाया नहीं जा सकता क्योंकि जैकब की सेनाएँ वहाँ तुरंत ही पहुँच गई। इस विद्रोह में आठ देशभक्तों और उनके नेताओं ने जेल के पास अपनी जानें गँवा दी।

केप्टन श्नीदर, मेजर जनरल जैकब का दूत बनकर सफ़ेद झंडे के साथ महल के अंदर गया और उसने राजा से बातचीत की। अगले दिन 7 दिसंबर को जैकब की सेनाओं ने महल के अंदर प्रवेश किया। सभी जगह शहर के लोगों ने उनका सामना किया अंततः जैकब के सैनिकों ने सभी को परास्त कर दिया। सम्राट की फ़ौज से लड़ते हुए आठ देशभक्तों ने जेल के पास अपनी जानें गँवा दी। नगर के लोग बड़ी संख्या में बंदी बनाए गए। चीमा साहब से परामर्श करने आए दूतों में से तीन शीघ्र ही शहर से भाग निकले।

6 दिसंबर, 1857 के विद्रोह के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने इन लोगों को गिरफ़्तार करने के लिए इनाम घोषित किए।
(1) मन्याबापू शिर्के (100 रू.)
(2) गोडाजी जोति जी दिवेकर नायक (100 रू.)
(3) रामजी सखाराम कुलकर्णी (50 रू.)
(4) रामा तुकाराम शिन्दे (50 रू)
(5) अरोबा मानाजी मेंघरे (40 रू.)
(7) सत्तू सुभना नवलकर (30 रू.)
(8)तात्या मानाजी पटेल (30 रू.) और नवां नाना लक्ष्मण निकम (25 रू.)।

"इनमें केवल क्रमांक 7 और 8 पकड़े जा सके शेष अब भी फ़रार हैं। (ल ग्रान्ड जैकब ने मुंबई प्रशासन को अपने पत्र दिनांक 6 जुलाई, 1858 में कहा अर्थात् विद्रोह के सात महीने पश्चात्‌।) ढोल पिटवाकर फ़ौजी अदालत के द्वारा शीघ्रता से सामूहिक अभियोग प्रारंभ किए गए। इसके लिए ब्रिटिश झंडे से ढका एक बड़ा-सा ढोल महल के केंद्र में रखा गया और बंदियों की न्यायिक जाँच सामूहिक रूप में की गई। ब्रिटिश इंडिया प्रकाशन के एक्ट 8, 11, 14 और 16 का उपयोग ऐसे अभियोगों के लिए किया गया। फ़ौजी अदालत के अध्यक्ष कर्नल ग्वेटिन ने 36 व्यक्तियों को अपराधी घोषित किया जिन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था, उन्हें मृत्युदंड दिया गया।

इस प्रकार दूसरे विद्रोह की कोशिश को दबा दिया गया और चीमा साहब नई योजना को आगे नहीं बढ़ा सके। उन्हें मई, 1858 में निष्कासित करके सिंघ भेज दिया गया जहाँ 15 मई, 1869 को उनकी मृत्यु हो गई।

8 दिसंबर, 1857 में शहर के लोगों और कुछ फौजियों पर मुक़द्दमे चले, 51 को इस विद्रोह की सजा मिली।

2. प्रमुख नेता

चीमा साहब

चीमा साहब राजा 'शाहजी प्रथम' के द्वितीय पुत्र थे। उन्हें बुवा साहब के नाम से अधिक जाना जाता था और उनकी रानी का नाम नर्मदा बाई था। उनका जन्म 8 जनवरी, 1831 को हुआ और उनका नाम साहु रखा गया, परंतु बचपन से ही उन्हें चीमा साहब कहा जाता था। वे शिवाजी तृतीय के छोटे भाई थे 29 नवंबर, 1838 को बुवा साहब की मृत्यु के पश्चात् शिवाजी तृतीय गद्दी पर बैठे चीमा साहब 31 जुलाई, 1857 की फ़ौजी बग़ावत के और 6-7 दिसंबर, 1857 की कोल्हापुर की जन क्रांति के प्रमुख प्रेरकों में से एक थे। वे राजकीय बग़ीचे में 27वीं स्थानीय पैदल सेन्य-पलटन के नेताओं से गुप्त रूप से मिलते थे। बग़ीचा नगर और फ़ौजी कैंप के निकट ही स्थित था। उन्होंने ग्वालियर से आये 60 घुड़सवारो के प्रतिनिधि मंडल से भी गुप्त वार्ता की थी। वह प्रतिनिधि मंडल चीमा साहब के बड़े भाई के विवाह पर बधाई देने आया था। उस समय 27वीं पैदल सेना की टुकड़ी के बहुत विश्वसनीय माने जाने वाले लोग भी उपस्थित थे। ग्वालियर की ओर से ज्योति राव उर्फ़ भाऊँ साहब घाटगे प्रमुख व्यक्ति थे। वह ताई बाई के दूत भी थे। ताई बाई विगत कोल्हापुर की रानी थी और पुणे में निवास करती थी। चीमा साहब ने नाना साहब के संदेशवाहकों से भी मुलाक़ात की थी और उन्हें आश्वस्त किया था कि दक्षिण महाराष्ट्र और उत्तरी कर्नाटक के ब्रिटिश फ़ौज की भारतीय पल्टन के व्यक्तियों को प्रभावित कर लिया गया है। युद्ध के चिन्ह स्वरूप लखनऊ दरबार से एक चाँदी की मूठ वाली लहरदार तलवार जिसके फल पर सोने से, शिया धर्म के लेख लिखे थे, भेजी गई थी। तत्पश्चात् वह कर्नल जैकब को महल में मिली थी। परंतु वह कहते है कि मुझे खेद है कि या तो वह खो गई या फिर जिन विश्वसनीय लोगों को हथियार सँभाल कर रखने के लिए दिए गए थे उनमें से किसी ने चुरा ली। छ (जैकब, पश्चिमी भारत, पृष्ठ 204)

कोल्हापुर में दिसंबर, 1857 के दूसरे विद्रोह के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने चीमा साहब का कोल्हापुर की गद्दी पर से अधिकार छीन लिया और यह भी निर्णय किया कि चीमा साहब को किसी दूर स्थान पर भेज दिया जाए। 31 मार्च, 1858 को कर्नल जैकब ने बहाने से चीमा साहब को बुलाया और गिरफ़्तार कर लिया और उन्हें निष्कासित करने की योजना बनाई। शहर के सभी द्वार बंद कर दिए गए थे। पूरी गोपनीयता बरती गई ताकि उनके अनुयायी कोई गड़बड़ी न कर सकें। चीमा साहब की पत्नी, सक्वारबाई ने, अगले दिन जैकब से अनुरोध किया कि उन्हेंे अपने पति के साथ भेजा जाए। यह अनुरोध अमान्य कर दिया गया और सक्वार बाई ने 2 अप्रैल, 1858 को आत्महत्या कर ली।

एक पनडुब्बी-विरोधी कामों में काम आना वाला युद्धपोत बाघोटणे में पश्चिमी तट पर चीमा साहब को निष्कासित करने के लिए तैयार खड़ा था। रात्रि के समय चीमा साहब और उनके 15 व्यक्तियों को शीघ्रता से बाघोटणेे को वाष्पीय पोत च् ब्रीनीज छ पर चढ़ाने के लिए ले ज़ाया गया। इसकी ख़बर नगर में फैल गई और इससे बड़ी उत्तेजना फैल गई। बाघोटणे से चीमा साहब और उसके व्यक्तियों को मुंबई ले ज़ाया गया जहाँ से उन्हें हटा कर 12 मई को करांची ले ज़ाया गया। चीमा साहब को करांची में 11 वर्षों तक रखा गया बाद में 15 मई 1869 को उनकी मृत्यु हो गई। उनका शव हिंदू श्मशान भूमि में लिहारी नदी के तट पर अंत्येष्टि हेतु ले ज़ाया गया, उस स्थान पर कुछ वर्षों के पश्चात् स्थानीय व्यक्तियों ने एक स्मारक खड़ा कर दिया।
3 अन्य विशेष व्यक्ति
(कोल्हापुर विद्रोह, अध्याय 21 के अंतर्गत भी देखें)

गोदाजी जोतीजी दिवेकर, नाईक
यह राजा के अंगरक्षकों की टोली में अधिकारी थे। यह दिसंबर, 1857 में कोल्हापुर विद्रोह के एक नेता थे। परंतु विद्रोह के असफल हो जाने पर वह बच निकले थे। बाद में उन्हेंे पकड़वाने के लिए सौ रुपये का इनाम भी घोषित किया गया था।

जगन्नाथ वासुदेव थत्ते
इन्होंने, शायद नाना साहब पेशवा की प्रेरणा से, 13 सितम्बर, 1857 को बिठूर से कोल्हापुर के राजा को एक पत्र लिखा। अन्य बातों के अतिरिक्त उसमें कहा गया कि ' कोल्हापुर कैंप ने विद्रोह किया था, आपने कुछ भी नह़ीं किया, लेकिन अब आप ऐसी व्यवस्था करें कि पुनः विद्रोह हो। आप महान व्यक्ति हैं, उसे आप हृदयस्थ कर लें। छ (मुंबई पुरालेख, पी. टी. खंड 30 वर्ष 1857 पृष्ठ 47 एस. एम. एच. एफ. आई. खंड प्रथम पृष्ठ 269)

मन्याबापू शिर्के
इनको पकड़वाने के लिए सौ रुपये का इनाम घोषित किया गया था।

रामजी सखा राम कुलकर्णी
इनको पकड़वाने के लिए पचास रुपये का इनाम घोषित किया गया था।

राम तुकाराम शिन्दे
इनको पकड़वाने के लिए पचास रुपये का इनाम घोषित किया गया था।

अरोबा मानाजी मेठरे
इनको पकड़वाने के लिए पचास रूपये का इनाम घोषित किया गया था।

निरासू रेकु कस्बेकर
इनको पकड़वाने के लिए पचास रुपये का इनाम घोषित किया गया था।

सत्ता शुभना नवलकर
इनको पकड़वाने के लिए पचास रुपये का इनाम घोषित किया गया था।

तात्या मानजी पटेल
इनको पकड़वाने के लिए पचास रुपये का इनाम घोषित किया गया था।

नाना लक्ष्मण निकम
इनको पकड़वाने के लिए पचास रुपये का इनाम घोषित किया गया था।

ज्योति राव उर्फ़ भाऊसाहब घाटगे

ताई बाई
(विगत स्वत्वाधिकारिणी कोल्हापुर महारानी)

4. शहीद
चीमा साहब
निष्कासन 15 मई, 1869 को कराँची में इनकी मृत्यु हो गई।

पन्हाला, दुर्ग की खान्दानी गढ़ सेना के नेता
( 7-12-1857 को फाँसी पर चढ़ा दिए गए।

कोल्हापुर नगर के 8 व्यक्ति
(जिनमें उनके नेताजीं भी शामिल थे। ये 6-12-1857 को जेल के निकट लड़ते हुए मारे गए।)

कोल्हापुर नगर के 36 व्यक्ति
(फौजी अदालत के आदेश पर 7-12-1857 को बंदूकधारी फौज ने इन्हें गोली मार दी।)

कोल्हापुर नगर के 15 व्यक्ति
(7-12-1857  और वर्ष 1858 में मार दिये गए।)

4. शहीद
चीमा साहब
निष्कासन 15 मई, 1869 को कराँची में इनकी मृत्यु हो गई।

पन्हाला, दुर्ग की खान्दानी गढ़ सेना के नेता
( 7-12-1857 को फाँसी पर चढ़ा दिए गए।

कोल्हापुर नगर के 8 व्यक्ति
(जिनमें उनके नेताजीं भी शामिल थे। ये 6-12-1857 को जेल के निकट लड़ते हुए मारे गए।)

कोल्हापुर नगर के 36 व्यक्ति
(फौजी अदालत के आदेश पर 7-12-1857 को बंदूकधारी फौज ने इन्हें गोली मार दी।)

कोल्हापुर नगर के 15 व्यक्ति
(7-12-1857  और वर्ष 1858 में मार दिये गए।)

5 बंदी

चीमा साहब
(मई 1858 से 15 मई, 1869 तक करांची में, मृत्यु तक इन्हें बन्दी बना कर रखा गया।)
सत्तू शुभना नवलकर
तात्या मानजी नवलकर

6. निष्कासित

12 मई, 1858 को चीमा साहब और उनके 15 सेवक मुंबई से करांची निष्कासित कर दिये गए। इनमें से ब् ााबा जी खरे, राव जी शिन्दे, गोपाल यादव, दाजी काशीकर, कथरिया पवांर, डोन्डी शितोले, भुजंग रावत, गुरजी कामले सत्तू, मल्हारी कम्बे, राम कुराडे, अप्पा शिन्दे, बापू यादव (रसोइए), कृष्णपीरजी (धोबी) और गनू देवजी (नाई)।

7. स्त्रोत
मुंबई पुरालेख, अभिलेखागार पी. डी. खण्ड

1852 : खण्ड 22 पृष्ठ 245-258, 287-290
1857 : खण्ड 30 पृष्ठ 47
खण्ड 31 पृष्ठ 597-601
1858 : खण्ड 24 पृष्ठ 185-197, 241, 535
खण्ड 27 पृष्ठ 59-67, 93-95
खण्ड 32 पृष्ठ 203-204
खण्ड 34 पृष्ठ 241-339
जैकब, पश्चिमी भारत पृष्ठ 179-203
एस. एम. एच. एफ. एम. आई. खण्ड प्रथम पृष्ठ 271-289
मनोहर मलगाँवकर, कोल्हापुर के छत्रपति पृष्ठ 430, 502-525

 

नासिक में विद्रोह -अहमदनगर क्षेत्र

अक्टूबर, 1857 नवम्बर, 1859

1858 : 4 अक्टूबर, भागोजी नाईक के व्यक्तियों और हेनरी दल में मुठभेड़। 18 अक्टूबर,भागोजी और माकन के मध्य उलझाव। 21 दिसम्बर, भागोजी और नट्टल की मुठभेड़ भागोजी के भाई महीपत मारे गए।
1858 : 20 जनवरी, जयराम व शिवराम ने ब्रिटिश फौजी दल का मान्डुसिंर में सामना किया। 19 फरवरी, भागोजी और ब्रिटिश सेना की काकन्की में मुठभेड़।
1858 : 20 अप्रैल भागोजी और स्टुअर्ट में मुठभेड़। इस मुठभेड़ में स्टुअर्ट मारा गया।
1858 : 5 जुलाई, भागोजी और नटटल में युद्ध। जिसमें भागोजी के पुत्र यशवन्त मारे गए। 26 अक्टूबर, भागोजी का कोरहल पर आक्रमण।


दक्षिण नासिक और उत्तर अहमदनगर की दो पहाड़ी जातियाँ कोल और भील पेशवाओं के कट्टर समर्थक थे। वे 1830 से निरन्तर ब्रितानियों से युद्धरत रहे। उनके नेता थे- गोविन्दराव खारी जो पेशवा के अधीन रतनगढ़ के पहाडी दुर्ग के सेनापति थे। रामकिरवा जो बहु सम्मानित नेता थे, रामजी भांगरिया पहले ब्रिटिश पुलिस में अफसर थे औैर कोंकण तथा अन्य स्थानों में नियुक्त थे तथा अन्य 9 अक्टूबर, 1822 को ब्रितानियों को पता चला कि ग्वालियर राज्य के अहमदनगर क्षेत्र के कई गाँवो में सेनाएँ एकत्रित हो रही थीं-यथा बेलापुर जामागाँव के सानई-बोमनी में और खानदेश में नन्दरवार में; एकत्रित होकर उन सेनाओं को सासूर की ओर बढ़ना था जहाँ उत्तर भारत से और लोग आकर मिलते थे, फिर ब्रितानियों की चौकियों पर आक्रमण करना था। जनवरी, 1829 में रामजी भांगरिया और गोविन्दराव खारी के नेतृत्व में सैकड़ों कोलियों ने अकोला की पहाड़ियों में बगावत की औैर दो महीने में अहमदनगर मे प्रवेश कर गई। जुलाई, 1830 में अहमदनगर जिले के कई भागों में ब्रितानियों के विरूद्ध विद्रोह हुए और उनसे निपटने में ब्रिटिश फौज की 11वीं और 13वीं पैदल सैनिक-पल्टन को उनसे सुलझने में बड़ा कष्टमय समय बिताना पड़ा। रामजी किरवा और उनके अन्य साथियों को ब्रितानियों ने पकड़ा और 1830 में अहमदनगर में फाँसी पर लटका दिया।

1845 में ब्रितानियों के विरूद्ध नासिक और अहमदनगर के क्षेत्रों में विद्रोह राघोजी भांगरिया, नासिक, के नेतृत्व में हुआ। उन्हें ब्रितानियोंे ने 1847 में पण्डरपुर में पकड़ा और फाँसी लगा दी। भीलों और कोलियों के अन्य प्रमुखों को भी ब्रितानियों ने विदेशी शासन के विरूद्ध युद्ध करने के अपराध में सजाएँ दी। 1852 में भीलों ने बड़े गम्भीर विद्रोह किए जो मुख्यतः मालगुजारी के अन्यायपूर्ण बन्दोबस्त और सर्वेक्षण के सम्बन्ध में थे।

स्वातन्त्रय संग्राम के मध्य 1857 में ब्रिटिश विरोधी गतिविधियाँ बहुत जोरों पर थी। स्वातन्त्र सेनानियों में अधिकतर दक्षिण नासिक और उत्तरी अहमदनगर के भील थे। वे लगभग 7000 जवान थे जिन्हें युद्ध जैसी गतिविधियों के लिए उनके मुख्या और ब्राह्मण नेताओं ने आन्दोलित किया था। जो लोग ब्रितानियों के विरूद्ध लड़े उनमें रूहिल्ले, मकरानी, अरब और ठाकुर भी थे।

1857 में विभिन्न ब्रिटिश विरोधी विप्लव, जो आपस में एक-दूसरे से सम्बन्धित थे, बड़े पैमाने पर नासिक-अहमदनगर क्षेत्र के सतमाला पहाड़ो में भोगोजी नाइक के नेतृत्त्व में और सतपुड़ा पहाड़ो में काजीसिंह के नेतृत्व में हुए। काजीसिंह खानदेश के थे जो आजकल जलगाँव जिला है। ये विद्रोह 1859 तक चले। भागोजी अपने सैन्य के साथ अक्सर नासिक-अहमदनगर के बाहर भी चले जाते थे और जिन सहयोगियों को आवश्यकता होती थी उनकी अशस्त्र सहायता करते थे। यथा खानदेश के काजीसिंह और भीमा नायक, ये वैसे ही पेंठ के राजा भगवन्त राव आदि भी थे।

21 दिसम्बर, 1857 में भारतीय पक्ष और नासिक जिलों में बासिर हीरा स्थित अंग्रेजी फौज के मध्य बड़ी भयानक मुठभेड़ हुई। वहाँ भागोजी के भाई महीपत नाइक और कैप्टन नट्टल का आमने-सामने युद्ध हुआ, इसमें महीपत मारे गए। भारतीय पक्ष को और भी बहुत हानी हुई। इसके बावजूद भोगोजी नाइक का सैन्यबल बढ़ता गया। 20 जनवरी, 1858 को निजाम की रियासत में महलगाँव के जयराम पटोदा ताल्लुका के जय राम ने शिवराम के नेतृत्व में अहमदनगर जिले के मन्दुसिर गाँव के निकट ब्रिटिश फौज का समना किया । 19 फरवरी, 1858 को भागोजी के सैन्य बल और अंग्रेजी फौजों की मुठभेड़ पीयोका के निकट झाड़ियों के जंगल में हुई। वह स्थान येवला, चालीस गाँव और निजाम की रियासत की सीमाओं से लगा हुआ था। अहमदनगर में नन्दगाँव में 20 अप्रैल, 1858 को एक भयानक युद्ध 400 शक्तिशाली भील और ले. स्टुअर्ट की सेना में हुआ इसमें स्टुअर्ट की फौज में 300 जवान थे। भीलों ने ब्रिटिश फौज के कई अफसर- कैं. मान्टगुमरी, रे. चैम्बलेन, ले. स्टुअर्ट घायल हो गए। स्टुअर्ट अगले दिन 21 अप्रैल को मर गया। ब्रितानियों की तरफ 19 मौते और भारतीयों की तरफ 25 मौंते हुई। पूरे वर्ष 1858 और 1859 के अधिकांश समय तक भागोजी नाइक अपने सैन्य बल के साथ उस क्षेत्र में धूमते रहे। उन्होंने बड़े दुस्साहसी हमले किये-बड़े शहर चालीस गाँव आदि भी आक्रमणों से नहीं बचे।

5 जुलाई, 1859 को भागोजी की सेना और कैप्टन नट्टल के अन्तर्गत ब्रिटिश फौजों में संगमनेर के आठ मील दक्षिण पूर्व स्थित अम्बहोरा दारा में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में मारे गये लोगों में भोगाजी के पुत्र यशवन्त भी थे, अनेक व्यक्ति घायल हुए और तीन महत्त्वपूर्ण व्यक्ति कैद कर लिये गये जिनमें हरजी नाईक भी थे। अक्टूबर, 1859 भीलों के दल निजाम की रियासत में भागोजी की सेना के साथ मिलने के लिए एकत्रित होने लगे।

11 नवम्बर, 1859 को भागोजी के सेना और फ्रेंक साउटर, अहमदनगर के पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट के अन्तर्गत ब्रिटिश फौज में कड़ा युद्ध हुआ। युद्धस्थल मीठ सागर गाँव से लगभग पाँच मील दूर था, भारतीय पक्ष को इसमें बड़ी हानी हुई, स्वयं भागोजी और उनके 45 व्यक्ति भी मारे गए। 12 नवम्बर, 1859 को, भीलों का एक बड़ा दल नेवासा में सोनई से भागोजी की सेना से भिड़ने रवाना हुआ। परन्तु राह में जब उन्हे मीठ सागर के भयानक काण्ड की सूचना मिली तो वह वापस खानदेश को लौट गए जहाँ उनमें से कई लोगों को अंग्रेजी फौज ने पकड़ लिया। भीलों का दूसरा दल जो निजाम की रियासत में एकत्रित हुआ था और भागोजी की सेना को सहायता करने जा रहे थे उसकी मुठभेड़ ले. पेडल के अन्तर्गत ब्रिटिश फौज की हैदराबाद आकस्मिक सेना से मुठभेड़ ब्रितानियों की सीमा पर हो गई, इसमें भारतीय पक्ष के चालीस व्यक्ति मारे गये। मीठ सागर के युद्ध के पश्चात् और 11 नवम्बर, 1859 को भागोजी के युद्ध में मारे जाने पर उनके एक रिश्तेदार अनुयायी म्हारदिया ने अपने साथियों को लेकर ब्रितानियों से नेवासा में सोनई से टक्कर लेनी प्रारम्भ कर दी। वह उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन उपस्थित नहीं थे। वहाँ उन्होंने साउटर के नौकर को मार दिया। उसके तुरन्त बाद म्हारदिया पकडे गए और उन्हें और उनके पाँच साथियों को नवम्बर, 1859 को फाँसी दे दी गई।

प्रमुख नेता

भागोजी नाईक
ये नान्दुर शिंगोटे गाँव के रहने वाले थे। यह गाँव अहमदनगर की उत्तरी सीमा से पाँच मील दूर सिन्नर उपनगर में था। 1855 में वह अहमदनगर पुलिस में अफसर थे और इन पर बलवा करने और पुलिस को रोकने का अपराध लगा और कारावास की भी सजा हुई थी। बाद में उन्हें मुक्त कर दिया गया। उसके तुरन्त बाद यह नासिक-अहमदनगर क्षेत्र के भीलों के प्रमुख नेताओं में से एक बन गया। शीघ्र ही उनके साथ लगभग पचास सक्रिय अनुयायी आ मिले।

1857 में उन्होंने ब्रितानियों के विरूद्ध स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। अपने गाँव से एक मील पर, पुणे-नासिक सड़क पर उन्होंने स्थिति सम्भाल ली। इस पर 4 अक्टूबर, 1857 को इन्होंने अपने दल के सहित हेनरी की सेना के साथ सशस्त्र मुठभेड़ की। भागोजी के दल का पहला निशाना बना ले. हेनरी के पीछे खड़ा एक व्यक्ति। अंग्रेज अफसर जमीन पर उतर आये, तुरन्त ही भागोजी की तरफ से गोलियों की बौंछार हुई। ले. हेनरी के सीनें प्राण घातक मारक घाव लगा और वह गिर गए।

17 अक्टूबर, 1857 को अकोला के शमशेरपुरी पहाड़ियों में भागोजी के व्यक्तियों  और ब्रितानियों के दल में मुठभेड़ हुई जिसमें 26वीं पल्टन के कर्नल माकन, ले. ग्राहम  और एफ. एस. चैपमैन (सिविल सर्विस का) गम्भीर रूप से घायल हो गए।

21 दिसम्बर, 1857 को ब्रितानियों से युद्ध में भागोजी के भाई महीपत मारे गए। 1858 में भागोजी का सैन्य दल अधिकतर नासिक-खानदेश और निजाम की रियासत में व्यस्त रहे।

अप्रेल-मई, 1859 में भागोजी और हरजी नाईक के सैन्य दल अहमदनगर जिले के कई स्थानों पर प्रकट हो गये। 5 जुलाई, 1859 के कैप्टन नटटल के अन्तर्गत ब्रिटिश फौज से अम्होरा दर्रे के निकट मुठभेड़ में भागोजी के पुत्र यशवन्त युद्धि भूमि में मारे गए। 26 अक्टूबर, 1859 को भागोजी ने कोपरगाँव के ग्राम कोरहल पर आक्रमण करके 18,000 रूपये के मूल्य की सम्पत्ति लूट ली। भागोजी ने अपने फुर्तीले और गोपनीय अभिमानों से नहल की फौज के छक्के छुड़ा दिए।

11 नवम्बर 1859 को भागोजी और उनके प्रमुख अनुयायी ब्रिटिश फौज से, नासिक के सिन्नर उपनगर में मिठसागर में हुई आमने-सामने की लड़ाई में मर गये। इस प्रकार भागोजी नाइक के परिवार से ही भागोजी स्वयं, उनका पुत्र यशन्त, उनके भाई महीपत और अन्य कई सगे-सम्बन्धी जिनमें म्हादरिया भी थे, ने अंग्रेजी राज्य के विरूद्ध अपनी जानें न्यौछावर कर दीं।

अन्य विशेष व्यक्ति

पाथरजी नाईक

यह राहुरी क्षेत्र के एक भील नेता थे। अक्टूबर, 1857 में इन्होंने 100 अनुयायियों का एक दल तैयार किया जो भील सैन्य बल का एक भाग था। राहुरी क्षेत्र के पुलिस सुपरिन्टन्डेन्ट मेजर माँट गुमरी और पाथर जी के बीच झड़पें होती रहती थीं। उनमें कई बार पाथर जी सफल रहे।

महीपत नाईक
यह भागोजी नाईक के भाई थे और उनके सबसे विश्वासनीय सहयोगी थे। वासिर हीरा के युद्ध में वह 21 दिसम्बर, 1857 को मारे गए।

जयराम शिवराम
20 जनवरी, 1858 को हुये क्रिया-कलाप पटोदा ताल्लुका के मान्डसिर ग्राम में ब्रिटिश फौजी दल के विरूद्ध वह नेतृत्व कर रहे थे। वह राहुरी में पकडे गए और उन्हें आजीवन निष्कासन का दण्ड दिया गया।

यशवन्त नाईक
यह भागोजी नाईक के पुत्र थे। यह अम्बहोरा दर्रे में निकट युद्ध में मारे गए थे।(5 जुलाई, 1859)

हरजी नाईक
यह अहमदनगर क्षेत्र के भीलों के नेता और भागोजी नाइक के सहयोगी थे, अम्बहोरा दर्रे में 5 जुलाई, 1858 को ब्रितानियों से हुई मुठभेड़ में दुश्मन ने उन्हें बन्दी बना लिया।

पाथोजी नाईक
इनकी आयु 80 वर्ष की थी। इन्होंने अपने साथियों के साथ ब्रितानियों के ठिकानो पर आक्रमण किया। इन्होंने केप्टन हेनरी को मार दिया और पीछा करने के पश्चात् इन्होंने पुणे के एक पुलिस थाने में अप्रैल 1858 में समपर्ण कर दिया। वहाँ इन्होंने अपना अपराध स्वीकर कर लिया और कहा कि उन्हें मौत कि सजा स्वीकार है यदि उनके पुत्रों मल्हारी और येसु को छोड़ दिया जाय।

शहीद
भागोजी नाईक (मीठासागर के युद्ध में मारे गए 11-11-1859)
महीपत नाईक (वासिरहीरा के युद्ध में मारे गए, 21-12-1857)
यशवन्त नाईक (अम्बोहर दर्रे के युद्ध में 5-7-1959 को मारे गए।)
म्हारदिया (सोनई के विद्रोह में फाँसी नवम्बर, 1859)
25 नन्दगाँव के युद्ध में मारे गये, 20-4-1858
45 मीठसागर के युद्ध में मारे गये, 11-11-1859
5 सोनई के विद्रोह के पश्चात् म्हारिया के साथ फाँसी नवम्बर, 1859

बन्दी
आजीवन निष्काशित
मन्डुसिर के विद्रोह के नेतागण
अपराध दोष-सिद्धि राज्य के विरूद्ध अपराध 20 जनवरी, 1858 को ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध विद्रोह में सम्मिलित अहमदनगर जिले के, पटोदा ताल्लुका के गाँव मान्डसिर के निकट ब्रिटिश फौज के एक दल का सामन किया। इन्हें अहमदनगर लाया गया और अभियोग की कार्यवाही के बाद 27 अगस्त, 1858 को मृत्यु दण्ड दिया गया; इस अनुमोदन के साथ कि सरकार उनकी सजा कम करके आजीवन निष्कासन की सजा कर सकती है। 8 सितम्बर 1858 को सरकार ने उनके अनुमोदन को मान लिया।

जयराम पुत्र शिवराम-यह निजाम की रियासत में महलगाँव के निवासी थे।
जयराम पुत्र रामा-यह मान्डसिर के काण्ड में शामिल एक नाइक जग्ल्या भील थे, इनकी आयु 30 थी यह निजाम की रियासत में खण्डाला के निवासी थे।
तुलपिया पुत्र भैरू-इनकी आयु 30 थी, यह निजाम की रियासत में खण्डाला के निवासी थे।
(और भी देखें "अन्य कैदियों" के अन्तर्गत- अधिक विवरण हेतु)
मि. चैपमैन आयुक्त के द्वारा ब्रितानियों के विरूद्ध विद्रोह के आरोप में निम्न को मृत्यु दण्ड दिया गया था-
बाबाजी बालाजी कुलकर्णी
भाऊ पुत्र हरजी पटेल
पाण्डु पुत्र ढोंडी पटेल
लेकिन मुंबई प्रसासन ने अपने पत्र संख्या 3842 दिनाँक 25 अक्टूबर, 1858 प्रेषित अहमदनगर मजिस्ट्रेट के द्वारा सजा को हटाकर आजीवन निष्कासन में परिवर्तित कर दिया।

अन्य कैदी-

हरजी नाईक - इनको अम्बोहरा दर्रे के युद्ध में 5-71859 को दो अन्य आदमियों के साथ कैद कर लिया गया था।

अहमदनगर के कैदियों की सूची, जो 1857 में बलवों से सम्बन्धित थे और अहमदनगर की जेल में निरूद्ध किये गये ( नवम्बर, 1857) (मुम्बई पी. डी. खण्ड 31 वर्ष 1857 पृ. 281-282, 479-482)

गरीबदास शिवप्रसाद बैरागी
गुलबगिर, गुरू जयरामजी
अलीशा फकीर (रानी पेटा का)
रामजनशा, मेहाबीशा के पुत्र
हैदरखान साहब खान के पुत्र
शेख बहादुर शेख इमाम के पुत्र
बल्ला बाबा अमून साहब परदेशी केत्र
इसमाइल (नागर जिले के चिनचनी का)

1857 की बगावतों से सम्बन्धित अहमदनगर के भीलों की सूची जिन्होंने पुणे की पुलिस के समक्ष आत्म-समर्पण किया। (15 मई, 1858 मुम्बई पी. डी. खण्ड 24 वर्ष 1854 पृष्ठ 79-82)

पाथोजी-कान्होजीकेपुत्र

तहनाबादकेनिवासी

मल्हारी-पाथोजीकेपुत्र

तहनाबादकेनिवासी

येसू-पाथोजीकेपुत्र

तहनाबादकेनिवासी

लक्ष्मण-शामजीकेपुत्र

कान्हूरकेनिवासी

अन्नाजी-शामजीकेपुत्र

कान्हूरकेनिवासी

मल्हारी-शामजीकेपुत्र

कान्हूरकेनिवासी

रामजी-शामजीकेपुत्र

कान्हूरकेनिवासी

घोंडी-बापूकेपुत्र

धुरी-धुरीके

सखाराम-रामजीकेपुत्र

बबलूगाँवके

म्हादू-नाओसाजीकेपुत्र

कोनेरीके

बुद्धा-लक्ष्मणकेपुत्र

महेशगाँवके

भवानी-वालाकेपुत्र

चिंचपुरके

रानू-होणजीकेपुत्र

वेहरेपिम्पलके

धर्मा-होनाजीकेपुत्र

वेहरेपिम्पलके

यहबापूनिम्बाजीकेपुत्रथे, इनकीआयु 35 थी।

 

16 जून, 1858 को नेवासा में हिरासत में लिए गये भीलों की संख्या की तालिका (भील बन्दी जो टोका भेज दिये गये।)
(मुंबई पी. डी. खण्ड 30 वर्ष 1858 पृष्ठ 299-307)

जयराम-यह शिवराज के पुत्र थे। यह विद्रोह के एक प्रसिद्ध नेता थे,इन्होंने मान्डसिर के विद्रोह में भीलों का नेतृत्व किया। इनको ब्रितानियों के द्वारा राहुणी में पकड़ लिया गया।
जयराम- यह रामा के पुत्र थे और मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
म्हादू- यह जेठ नाईक के पुत्र थे और मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
तुलपिया-यह भेरू के पुत्र थे और मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
(यह खानदेश में पकडे गए, इन्होंने कबूल किया कि इन्होंने अपनी मैंचोंलोक से साहब () 'यूरोपियन को गिराया।'
रंगो- यह शिवराम के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
म्हादू- यह मो हाना के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
दगडू- यह बाला के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।)
बारकू- यह विश्वनाथ के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
मानू- यह विश्वनाथ के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
अफलीयि-यह गंगाराम के पुत्र थे तथा मान्डुसिर  काण्ड में शामिल थे।
सल्वा- यह सोवाजी के पुत्र थे (यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
साधू- यह बापू के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
डोन्डू-यह भीका के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त असेरहले नेवासा में रहते थे।
देवू-यह तानाजी के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
आनन्द-यह गंगराम के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
सदाशिव-यह यशवन्त के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
गोमिया-यह असनिया के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
रामा-यह जेठ नाईक के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
भांवदिया-यह विश्वनाथ के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
बलवन्ता-यह मल्हार के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
महीपति-यह गहिनाजी के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
महीपित-यह रामा के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त नेवासा में रहते थे।
रामा-यह कादू के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
मतारिया-यह रामा के पुत्र थे तथा यथोपरोक्त पहले नेवासा में रहते थे।
बलवन्ता-यह लहानू के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
आनन्द-यह लक्ष्मण के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
परवतिया-यह  मल्हारी के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
अवाजी-यह उमाजी के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
बोवादिया-यह अप्पा के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
आनन्द-यह खान्दू के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
रामा-यह सत्वा के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
लक्ष्मण-यह मोगाजी के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
बाला-यह रामा के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
म्हादू-यह रामा के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
कुशा-यह रामा के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
सोवाजी- यह शाहजी के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
चीमा-यह नागू के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
कांदू- यह नागू के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
शिवराम-यह रामा के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
यशवन्त- यह शिवराम के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
भैरूकांद- यह नाइका के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
साधू- यह बाला के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
रामा- यह खांदू के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
निम्बा- यह खांदू के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
भागू- यह खांदू के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
आनन्द- यह भागू के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
चंदिया- यह के पुत्र थे तथा मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
बुधा- यह गंगाराम के पुत्र थे और मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
मल्हारी- यह लक्ष्मण के पुत्र थे और मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
तनिया- यह भुजंग के पुत्र थे (यथोपरोक्त-निजाम की रियासत में पेडका टोस्ट के निकट ब्रिटिश फौजों से मुठभेड़ करने वाले भीलो के साथ हो गए थे।
विठू- यह अन्नाजी के पुत्र थे और मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
लक्ष्मण- यह शाने के पुत्र थे यह मान्डुसिर काण्ड में शामिल थे।
अण्णाजी-यह कोवजी के पुत्र थे तथा वृद्ध और अपाहिज थे।

क्रमांक 1 से 49 तक बन्दियों का अपराध यह था कि वे मण्डावर (मान्डसिर) के विद्रोह में भीलों के साथ थे। यह काण्ड खानदेश और अहमनदनगर की सीमा पर इस प्रकार सुनिश्चित किया गया कि यह कहना कठिन था कि किस जिले में घटित हुआ। क्रमांक 50 से 53 तक के बन्दियों का अपराध निजाम रियासत की सीमा में किया गया था। सी. ई. टी. टेलर अहमदनगर मजिस्ट्रेट, 16 जून, 1858 (मुंम्बई पी. डी. खण्ड 30 वर्ष 1858 पृष्ठ 300)

स्त्रोत
मुंबई पुरालेख अभिलेखागार पी. डी. खण्ड
1854 : खण्ड 21 पृष्ठ 71-73
1857 : खण्ड 31 पृष्ठ 281-283, 479-482
खण्ड 25 पृष्ठ 456-464
खण्ड 28 पृष्ठ 79-82
खण्ड 30 पृष्ठ 299-307
खण्ड 33 पृष्ठ 360-362
खण्ड 35 पृष्ठ 57 और 76; 363-370
मुम्बई जिला गजटिअर खण्ड 16 नासिक

(मुम्ब. 1883) खण्ड 17 अहमदनगर (मुंबई, 1884) नासिक जिला गजटिअर (पुनरीक्षित) (मुंबई 1875)

पेठ और त्र्यम्बकेश्व में विद्रोह

दिसम्बर, 1857
1857: 5 दिसम्बर, जोगलेकर के नेतृत्व में त्र्यम्बकेश्वर में विद्रोह प्रारम्भ।
6 दिसम्बर पेठ के प्रमुख भगवन्तराव के व्यक्तियों का हरसुर पर आक्रमण।
10 दिसम्बर, पेठ में ब्रिटिश सरकार के कार्यालय का घिराव।
18 दिसम्बर, नट्टल की फौजों से मुठभेड़। फल्दीखान मारे गए।
28 दिसम्बर, भगवन्तराव पकडे गए।
1858: 4 जनवरी, भगवन्तराव और उनके व्यक्तियों को फाँसी।

पेठ में विद्रोह

पेठ नासिक जिले में 24 गाँवो की एक छोटी-सी रियासत थी। उसके राजा भगवन्तराव 1857 में नाना साहब पेशवा से पत्र-व्यवहार कर रहे थें। पेठ में अधिकतर आबादी कोलियों की थी। दिसम्बर 1857 में इस क्षेत्र में भगवानदास ने भागोजी नाईक और फालदीखान के साथ मिलकर ब्रितानियों के विरूद्ध विद्रोह खड़े किये। अन्त में भगवानदास अपने बहुत से अनुयायियों के साथ पकडे़ गए और ब्रिटिश सरकार ने उनको फाँसी देकर मार दिया।

6 दिसम्बर, 1857 को स्वतन्त्रता सैनिकों ने जिनमें अधिकतर कोली थे, हरसुल पर आक्रमण किया। यह राज्य का दूसरा नगर था। उन लोगों ने मामलातदार के कार्यालय के अभिलेख नष्ट कर दिये और मामलातदार को कुछ सिपाहियों सहित पकड़ कर बन्दियों के रूप में अपने साथ ले गए। उन्होंने स्थानीय साहूकारों के व्यवसायिक ठिकानों पर भी आक्रमण किए। फिर वे पेठ की तरफ बढ गए, साथ में मामलातदार को भी ले गए। वहाँ उन्होंने ब्रिटिश खजाने पर हमला किया और राजा भगवन्तराव के समक्ष समारेहपूर्वक उपस्थित होकर विद्रोही नेताओं का एक-एक करके परिचय दिया। सांय उन्होने मामलादार को और ब्रिटिश पक्ष के अन्य सिपाहियों को मुक्त कर दिया जिन्हें बन्दी बनाया गए था। बाद में वे धर्मपुर राज्य की सीमा की पहाड़ी पर वापस चले गए।

10 दिसम्बर को, ले. ग्लासपूल के अन्तर्गत एक ब्रितानियों का दल पेठ पहुँचा। यह खबर मिलते ही कई हजार कोली जवान वापस पेठ आ गए और ब्रिटिश सरकार के परकोटे बन्द कार्यालय को घेर लिया जहाँ ग्लासपूल और उसकी फौजों ने आश्रय ले रखा था। 16 दिसम्बर को भूलगना से भागोजी नायक और उनके 60 व्यक्ति आ पहुँचे इससे भारतयी पक्ष और शक्तिशाली हो गया। इनमें अधिकतर भील थे और पुरानी चाल की बन्दूकों से लैस थे। 17 दिसम्बर को कैप्टन नट्टल की फौजों के आने से ब्रिटिश पक्ष को शक्ति मिली। 18 दिसम्बर, 1857 को जब मुठभेड हुई उसमें फालदी खान, पेठ के लोगों के मकरानी नेता और अन्य लोग मारे गए और भारतीय पक्ष के कई अन्य लोग बन्दी बना लिए गए। दिसम्बर, 1857 के विद्रोह में भाग लेने के अपराध में जिन लोगों की पेठ राज्य में जागीरें, वुटन, जमीने और धन के वित्तीय अधिकारी जब्त किये गए उनका पूर्ण विवरण निम्नवत है। (मुंबई राजनीतिक विभाग खण्ड 33, वर्ष 1858 पृष्ठ 392-409)

पेठ के भगवन्तराय राजा- 4-1-1858 को फाँसी।
हरसुल के भाऊ दाऊद- पकडे़ नहीं जा सके।
जटगाँव खुर्द के अर्जनु कृष्ण पटेल (हरसुल परगना)- 26, दिसम्बर, 1857 को फाँसी।
बारह के मानजी अर्जुन पटेल (परगना बारेह)- 19 जनवरी, 1858 को आजन्म निष्कासन।
गोपालपुर के रावजी रामजी देशमुख (परगना बारेह)- 19-1-1858 को फाँसी।
गोपालपुर के अर्जुन खण्ड नाईक (परगना वारेह)- 19-1-1858 को 7 वर्ष आजन्म कारावास की सजा।
मजरे नानिग पाड़ा के गंगा ऐक नाईक (परगना बारेह)- 10 जून 1858 को आजन्म निष्कासन।
माले गाँव के देवजी रामजी पटेल (परगना मालेगाँव)- 8 जनवरी, 1858 को फाँसी।
म्हिर गाँव के हरिचंद्र पटेल (परगना माले गाँव)- 25, जनवरी, 1858 को फाँसी।
थाना गाँव के शितरा चन्द्र नाईक (परगना बारेह) 16 जनवर 1858 को फाँसी।
कुम्भले के कट्ट सूफ पटेल- 31 दिसम्बर 1857 को फाँसी।
कुम्भले के देवजी फगुना मानभाव- 2 जनवरी, 1858 को 3 वर्ष का सश्रम कारावास।
कहन्डोल के नाथू बोवाजी सरनाईक (परनगना पेठ)- 31 दिसम्बर, 1857 को फाँसी।

प्रमुख नेता
राजा भगवन्तराय पुत्र नीलकण्ठराव
यह नाना साहब पेशवा के पत्र व्यवहार किया करते थे। पेठ में विद्रोह की योजना राजा और पेठ की रानी के दीवान ने बनाई थी जो नासिक में रहते थे। पेठ के ब्रिटिश सरकार के कार्यालय पर आक्रमण के पश्चात् राजा के पक्ष के व्यक्ति एक-एक करके राजा को अभिवादन करने पहुँचे थे। एच. हबी. कोसपेल, पेठ राज्य के सहायक जिलाधीश ने राजा को 25 दिसम्बर, 1857 को गिरफ्तार कर लिया। उन पर मुकद्दमा चला और 4 जनवरी, 1858 को (अन्य साथियों सहित) पेठ में मामलातदार कचहरी के सामने सार्वजनिक रूप से फाँसी दी गई। उनकी सम्पत्ति कुर्क कर ली गई और उनके गाँवो की मालगुजारी ब्रिटिश सरकार के नाम से वसूली जाने लगी। यहाँ तक कि उनके सेवकों को भी बन्दी बना लिया गया। वे थे-

शेख सिरम आजम जमादार,
बाबू अम्बिद खआं, सिपाही,
अप्प् जी हरजी,
सिपाहीशेख इब्राहीम, सिपाही
विठू बापू पवार, सिपारी,
अलीखान मोहिउद्दीन, सिपाही,
अर्चान सिंह बक्त सिंह, सिपाही,
शेख लाल शेख करीम, सिपाही
बालकिशन धामी लाल, सिपाही,
शेख इस्माइल भीखू मियाँ, सिपाही,
कादूखान फत्तू, सिपाही
डोंड़ी मोहाने, माशालची (टार्च वियर); घरेलू नौकर,
अमृत लक्ष्मण पूजारी,

बापू दौलतराव, हवलदार
स्त्वा गंगा, हवलदार,
पान्डु नीलकष्ठराव, खिदमतगार
म्हाद हन्मन्ता
(मुंबई राजनीतिक विभाग खण्ड 24 1858 227029 दिनाँक 24 मार्च, 1858)

अन्य विशेष व्यक्ति
भागोजी नायक
(दिसम्बर, 1857 में पेठ के विद्रोह को उन्होंने पुरानी बन्दूकों से लैस आदमियों द्वारा मदद पहुँचाई। मिठसागर गाँव के युद्ध में वह 11 नवम्बर, 1859 को मारे गये। (और विस्तृत विवरण के लिए देखिए "नासिक-अहमदनगर के विद्रोही")
फालदी खान
(एक मकरानी पेठ के लोगों के नेता, पेठ में ब्रितानियों के साथ मुठभेड़ में वह 18 दिसम्बर, 1857 को मारे गये।)

पेठ की रानी के दीवान
(पेठ के विद्रोह की योजना बनाने और उसे कार्यान्वित करने में सक्रिय भागीदारी)

भाऊ मालेकर
(सरूष्टे के पटेल, अपने भाई के साथ ब्रितानियों द्वारा गिरफ्तार किए गए इनकी जानकारी में पहले ही था कि नासिक विद्रोह की योजना एक मास पूर्व ही बन गई थी।)
पेठ के विद्रोह में जिन लोगों ने 9 दिसम्बर, 1857 को और उनके आसपास सक्रिय भूमिका निभाई उनकी सूची मुंबई प्रशासन को बी. बोसवेल सहायक कलेक्टर, पेठ स्टेट के द्वारा 4 जनवरी, 1858 को प्रस्तुत की गई। वह सूची निम्न है-

सादू सोनार, हरसुल के,
फरार
फतले मुहम्मद, पेठ पुलिम में नाईक-
भागोजी नाइक के साथ फरार।
नाथू नाइक, पेठ के सरनाइक-
फाँसी
डोंडिया बागल, पेठ के नाईक
शितारा नाईक, बारेह के सरनाइक-
फरार (बाद में फाँसी)
गाट पेटल कुम्भले के -
फाँसी 
ठुकुर पटेल, करनजले के
राष्ट्रदोह के लिए अभियोग चला।
भाऊ मालेकर, सारूष्टे के नाइक
राजद्रोह के लिए अभियोग चला।
तुकाराम, हरसुल महल के सरनाइक-
फाँसी
भाऊ गंगाराम पटेल, चिन्सवाड के -
फाँसी
अर्जुन पटेल, छोटे जटेगाँव के -
फाँसी
मानभाऊ, कुम्वाइरले के -
3 वर्ष का सश्रम कारावास।
सानु बागल,
निष्कासित
बेंगकोबा, सीमा शुल्क कार्यालय में लिपिक-
फरार
वजीर खाँ, पेठ पुलिस के सिपाही-
मोहादा में गोली मार दी गई।
मन्या कोली, हरसुल के -
निष्कासित
कालू राजिया-
निष्कासित
डुन्डल प्रधान-
फरार
बुइया गीतिया-
आभियोग की वाट।
विठोबा दामोदर, पेठ की रानी के दीवान-
अभियोग की वाट।
जगन्नाथ अब्माजी उर्फ तात्या- रानी के कारकुन-
अभियोग की वाट।

विठोबा दामोदर, जगन्नाथ आबजी, भाऊ बन्दाजी मल्हारी, लक्ष्मण बल्लाल, नासिक के रामचंद्र बल्लाल विनायक त्र्यम्बक, पेठ के मुक्तेदार और ओजर के सदाशिव आनंद राव उन लोगो में थे जिन्हें राजद्रोह आदि के आरोपों पर 1858 में थाना जेल में निरूद्ध किया गया था।

शहीद
भगवन्त  राव नीलकण्ठ, पेठ के राजा-
( 4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी)
भाऊ बोवाजी नाईक-
(26 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी)
अर्जुन कृष्णा परेल-
(26 दिसम्बर, 1857 को सरेआम फाँसी)
रावजी रामजी देशमुख-
(19 जनवरी, 1858 को पेठ में सरेआम फाँसी)
देवजी रामजी पटेल-
(8 जनवरी, 1858 को पेठ में सरेआम फाँसी)
हरीचन्द पटेल-
(25 जनवरी, 1858 को पेठ में सरेआम फाँसी)
शितारा चन्दू नाईक-
(16 जनवरी, 1858 को पेठ में सरेआम फाँसी)
गट्ट रूप पटेल
(31 दिसम्बर 1857 को पेठ में सरेआम फाँसी)
नाथी बोवाजी नाईक
(पेठ में 31 दिसम्बर 1857 सरे आम फाँसी)
डोंजिया बागल            
(4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी दी गई)
तुकाराम                   
(4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी दी गई)
भाऊ गंगाराम पटेल      
(4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी दी गई)
फकीर वाल पटेल                   
(4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी दी गई)
माओजी धर्मा              
(4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी दी गई)
सोमा नात्रिया             
(4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी दी गई)
धर्मा यशवन्त               
(4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी दी गई)
लहना डोंडिया            
(4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी दी गई)
भाऊ देवजी               
(4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी दी गई)
पाण्डया देवजी           
(4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी दी गई)
रावजी हरिया             
(4 जनवरी, 1858 को सरेआम फाँसी दी गई)
फाल्दी खाँ                
(18 दिसम्बर, 1858 को पेठ में हुई मुठभेड़ में मार गए।)
वजरी खाँ
(दिसम्बर, 1857 को मोहादा में गोली मार दी गई)

बन्दी
आजीवन निष्कासन की सजा-
माओजी अर्जुन पटेल          गंगा एक नाईक
सानू बागल                  मान्या कोली
कालू राजिया                 येसा नाधिया
धुन्डल माओजी               डोंडिया बीरबल
महादू काकदिया              डोंडू कालू
गोविन्दा विठू                 भीवा लक्मा
सत्तू चन्द                    अर्जुन मोस्या
त्र्यम्बक हरी पटेल

अन्य बन्दी-
(इस भाग में उन लोगों के नाम दिये गए हैं जिनके विषय में साक्ष्य के अभाव में यह निश्चित करना कठिन है कि वे अभियोग पर थे या फरार थे और उनमें से कुछ को बाद में कदाचित मृत्युदण्ड या निष्कासन की सजा हुई।)

भाऊ दाऊद
अर्जुन खान्दू नाईक
7 वर्ष का सश्रम कारावास
देवजी फगुना मानवभाव
3 वर्ष का सश्रम कारावास
साधू सुनार
फतले मुहम्मद
टुकुर पटेल
भाऊ मालेकर
वेंकोबा, कारकुन
डुन्डल प्रधान
बइया गीतिया
विठोबा दामोदर,
(थाना जेल में बन्दी)
जगन्नाथ,आबाजी
(थाना जेल में बन्दी)
भाऊ बन्दाजी मल्हारी
(थाना जेल में बन्दी)
लक्ष्मण बल्लाल
(थाना जेल में बन्दी)
रामचंद्र बल्लाल
(थाना जेल में बन्दी)
विनायक त्र्यम्बक म्क्केदार
(थाना जेल में बन्दी)
सदाशिव आनंद राव
(थाना जेल में बन्दी)

शेख खिरम आजम                                     (थाना जेल में बन्दी)
बापू अम्वी खान                                         (थाना जेल में बन्दी)
अप्पा जी हरजी                                        (थाना जेल में बन्दी)
शेख ब्राहीम                                           (थाना जेल में बन्दी)
विठूबापू पवार
(थाना जेल में बन्दी)
अलीखान मोहिउद्दीन खान
(थाना जेल में बन्दी)
आर्यनसिंह,बख्तसिंह
(थाना जेल में बन्दी)
शेखरलाल शेख करीम                              
(थाना जेल में बन्दी)
बाल किश धामिलाल
(थाना जेल में बन्दी)
कादूरखान फत्तू
(थाना जेल में बन्दी)
डोंडी मोहने
(थाना जेल में बन्दी)
अम्रता लक्ष्मण                                           (थाना जेल में बन्दी)
बापू दौलतराव                                          (थाना जेल में बन्दी)
सत्व गंगा                                               (थाना जेल में बन्दी)
पाण्डुनिलकण्टराव                                    (थाना जेल में बन्दी)
म्हादून्मन्ता                                           (थाना जेल में बन्दी)

स्त्रोत:
मुंबई, पुरालेख, अभिलेखागार पी. डी. खण्ड :
1858 : खण्ड 20 पृष्ठ 381-387
खण्ड 21, 65-59, 447-470
एच. बी. बोरवेल के द्वारा 4-1-1858 को 'पेठ विद्रोह पर रिपोर्ट'
खण्ड 24 पृष्ठ 227-229
खण्ड 23 पृष्ठ 392-409
खण्ड 36 पृष्ठ 70-73
मुंबई प्रशासन की रिपोर्ट वर्ष 1857-58 पृष्ठ 119-162
मुंबई जिला गजटिअर खण्ड 16 नासिक (मुंबई 1883)
नासिक जिला गजट (मुंबई 1975) पृ... 138-147
एस. एम. एच. एम. आई. खण्ड प्रथम पृष्ठ 335-338

त्र्यबकेश्वर में विद्रोह

नासिक के निकट त्र्यम्बकेश्वर में ब्रिटिश कचहरी और खजाने पर 5 दिसम्बर, 1857 की रात, को वासुदेव भगवन्त जोगलेकर, तथा अन्य नेता जैसै जीते, के नेतृत्व में भीलों और ठाकुरों के एक दल ने आक्रमण कर दिया। विद्रोह में भाग लेने वालों में से कुछ त्र्यम्बकेश्वर के आस-पास की पहाड़ियों के थे।

उनमें से एक, पंगिए पुत्र शिवाजी को त्र्यम्बकेश्वर की कचहरी पर विद्रोहपूर्ण आक्रमण के लिए एक्ट 14 वर्ष 1857 के अन्तर्गत नासिक के प्रथम सहायक कलेक्टर, एफ. एस. चैपमैन ने अपराधी घोषित किया और मृत्युदण्ड दिया। आक्रमण के दौरान पंगिए स्वयं भी घायल हो गए थे। पहले उन्हें यह मुहलत दी गई कि यदि वह अपने साथियों और नेताओं के नाम बतला दे तो उन्हें माफ कर दिया जायेगा। पहले तो उन्होंने इसके लिये इन्कार कर दिया, किन्तु अभियोग और सजा के बाद वह तैयार हो गए। उन्होंने सारी बातें स्वीकार करते हुए ऐसी सूचनाएँ दी जिनके आधार पर कई प्रभावशाली व्यक्ति अपराधी घोषित किये गये। इन परिस्थितियों में ब्रितानियों ने पंगिए को क्षमा प्रदान कर दी।

ब्रिटिश फौज की 29वीं पैदल सैनिक पल्टन के कैप्टन विशेष सेवा पर नट्टल के अन्तर्गत एक फौजी दल ने पाण्डु ठाकुर और अन्य लोगों को बन्दी बना लिया। पाण्डु ने भी खजाने पर आक्रमण में अपनी भागीदारी स्वीकार कर ली और यह भी स्वीकार किया कि त्र्यम्बेकश्वर के ब्राह्मणों की सलाह पर उन लोगों ने विद्रोह किया था।

कैप्टन नट्टल ने पुणे के पुलिस आयुक्त, पूना को लिखे गये पत्र सं. 02/1857 दिनाँक, कैम्प त्रम्बक, 11-12-1857 में त्रयम्बक खजाने पर आक्रमण की रिपोर्ट में लिखा- "ठाकुरो का एक बड़ा दल आस-पास के क्षेत्र के प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ इस आक्रमण की योजना बनाने और उसे कार्यावन्वित करने में संलिप्त था। उनमें संगरनेर के शाबिया और सोमाजी पटेल, भीकाजी पटेल, भाऊ नाम के दारूसी के पुलिस पटेल, कल्लू नामक कानुस्ता के पटेल, एक हिबाती नाम का व्यक्ति और पाण्डु ठाकुर तथा कई अन्य शामिल थे। वे पकड़े गए और अपराधी घोषित करके उन्हे विभिन्न अवधियों के कारावास का दण्ड दिया गया। इस विद्रोह में भाग लेने वाला परिवार जीते का था। उनकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ली गई। जोगलेकर, त्र्यम्बक के ब्राह्मण के नेता, जिन्होंने आक्रमण की योजना बनाई थी, उनको नट्टल ने गिरफ्तार किया और अभियोग के पश्चात् उन्हें त्र्यम्बकेश्वर में 7 दिसम्बर, 1857 को सरेआम फाँसी पर लटका दिया गया।

मुख्य नेता

वासुदेव भगवन्त जोगलेकर
वह त्रियम्बकेश्वर के एक मंदिर के प्रबन्धक थे। वह एक सर्राफ और साहूकार भी थे और समाज में उनका बड़ा प्रभाव था। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक भाग के रूप में उन्होंने क्षेत्रीय भीलों और ठाकुरों को संगठित करके खुलेआम 5 दिसम्बर, 1857 को विद्रोह कर दिया। परन्तु वह अपने प्रयास में असफल रहे; ब्रितानियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 7 दिसम्बर, 1857 को उन्हें फाँसी दे दी गई। फाँसी के तख्ते पर जाने से पूर्व उनकी अन्तिम इच्छी पूरी की गई तो उन्होंने कहा कि त्र्यम्बक मन्दिर का प्रबन्ध जोगलेकर परिवार के पास ही रहना चाहिए। उनकी अन्तिम इच्छा की पूर्ति की गई। लक्ष्मीबाई, तिलक, जो एक महान साहित्यिक लेखिका बनी, जोगलेकर की ही पोती, (पुत्री की पुत्री) थी।

अन्यविशेषव्यक्ति-
जीते, पाण्डु ठाकुर
पंगिए शिवाजी
शहीद-
वासुदेव भगवन्त जोगलेकर
(7 दिसम्बर, 1857 को त्रम्बकेश्वर में सरेआम फाँसी)
बन्दी
पाण्डु ठाकुर पुगिए
शाबिया सोमाजी
भीकाजी भाउ
कल्लू  हिबाती

स्त्रोत
मुंबई पुरालेख, अभिलेखागार राजनीतिक विभाग खण्ड
खण्ड 20 वर्ष 1858 का पृष्ठ 143-145
खण्ड 22 वर्ष 1858 का पृ. 395-399
मुंबई जिला गजटिअर खण्ड 16 नासिक (मुंबई 1883)
लक्ष्मीबाई तिलक, स्मृति चित्र पृ.13

मुंबई विद्रोह

अगस्त - अक्टूबर 1857

1857 : मुंबई में विद्रोह के लिए 30 अगस्त की तिथि निश्चित की गई, परंतु बाद में 15 अक्टूबर तक इसे स्थगित कर दिया गया था।
1857 : 26 दिसंबर को ब्रिटिश अधिकारियों को 15 अक्टूबर 1857 के विद्रोह की योजना की ख़बर मिली।
1857 : 12 अक्टूबर विद्रोह की योजना बनाने वाले नेताओं की गिरफ़्तारी हुई।
1857 : 15 अक्टूबर योजनागत विद्रोह के नेता सैय्यद हुसैन और मंगल, पोत से उड़ा दिए गए।

मई और सितम्बर 1857 में मुंबई के युरोपियन निवासियों के बीच अपनी सुरक्षा के प्रति बड़ी चिंता फैली हुई थी। ऐसा संदेह था कि जगन्नाथ शंकर सेठ (18-4-1865) सहित शहर के कई बड़े नेता विद्रोहियों के पक्ष में थे।

स्वयं जगन्नाथ शंकर सेठ, अन्य व्यक्तियों के साथ, बड़ी कठिनाई से कठोर राजद्रोह के दोष में गिरफ़्तारी से बाल-बाल बचे थे। इस मामले की जाँच चार्ल्स फोरजेट (डिप्टी पुलिस आयुक्त) ने की थी, मुंबई के गर्वनर के आदेश पर (मुंबई गजट 25 दिसंबर 1907) दूसरी और, बड़ी संख्या में प्रमुख नागरिक सरकार को पत्र भेजकर ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठा घोषित कर रहे थे।

नगर के व्यक्तियों ने सरकार में आतंक फैला रखा था। भारत के अन्य भागों में राष्ट्रभक्त भारतीय बलों की सफलता के लिए गिरफ़्तार कर लिए जाते थे। इस प्रकार बड़ी संख्या में गिरफ़्तारियाँ हुई। फोरजेन्ट ने सितम्बर 1857 में मुंबई पुलिस आयुक्त के कार्यालय के पास एक बड़ी सूली खड़ी करवाई तथा उन प्रमुख नागरिकों को बुलवाया जिन पर उसे विद्रोही होने का शक था। उसने उन्हें यह भी धमकी दी कि विद्रोह की जरा भी भनक लगी तो उन्हें तुरंत फाँसी दे दी जायेगी।

उन दिनों 10वीं और 11वीं पैदल सेना की पलटन, और ब्रिटिश सरकार की एक समुद्री बटालियन मुंबई में स्थापित थी। 10वीं पलटन ने पहले 1854 में नसीराबाद में विद्रोह किया था। सितम्बर 1857 में फोरजेट की युरोपियन पुलिस बल और देशी पलटन के सिपाहियों के बीच एक झड़प के दौरान दो भारतीय सिपाही मारे गए थे। उससे भी पहले मुंबई की भारतीय पलटन का, अजमेर और कोल्हापुर से विद्रोह की योजना के प्रश्न पर पत्र व्यवहार चल रहा था। 30 अगस्त की तिथि (मुहर्रम की रात) मुंबई में विद्रोह करने के लिए निश्चित की गई थी, परंतु धार्मिक असुविधा के कारण उसे स्थगित कर दिया गया। 31 अक्टूबर 1857 को मुंबई किले की सेना के ब्रिगेडियर जे. एम. श्रोट ने अपने के पत्र में लिखा "ऐसा आभास होता है कि तीन महीनों से भी अधिक समय से पलटन के देशी व्यक्ति मुंबई के किसी अज्ञात भाग में सेना निवास के निकट विद्रोही बैठकों में जाने लगे हैं-और अक्टूबर के आरम्भ तक पुलिस को इसकी कोई सूचना नहीं है।" (बी. ए. पी. टी. खण्ड 30 वर्ष 1857 पृष्ठ 321-327)

मुंबई में नियुक्त कई सिपाही गंगा प्रसाद के घर में नियमित रूप से गोपनीय बैठकें कर रहे थे। कई व्यक्ति ऐसी बैठकों में भाग लेकर देश की निम्न योजनाओं को कार्यान्वित करने के बारे में विचार विमर्श करते थे-

यूरोपवासियों को कत्ल करना। (मारो फिरंगी को)
मुंबई को अधिकार में लेना।
दिल्ली के बादशाह से जाकर मिलना। (चलो दिल्ली)

गुलगर धोबी इसमें अत्यधिक लिप्त थे, जब उन पर संदेह हो गया तो वह गुपचुप काम करते थे, स्वयं बैठकों में नहीं जाते थे। इनके अलावा नौ सैनिक बटालियन के सईद हुसैन तथा पैदल पलटन के मंगल तथा अन्य दो महत्त्वपूर्ण व्यक्ति भी इन बैठकों में भाग लेते थे।

6 अक्टूबर 1857 की रात को गंगा प्रसाद के घर पर हुई बैठक में निम्न विषयों पर बातचीत हुई थी।

10वीं पल्टन से कामता प्रसाद को संदेह के आधार पर हटाकर उन्हेंे ब्रिटिश पुलिस के समक्ष जाँच के लिए सौंप दिया जाना।
मुंबई पर अधिकार करने की योजना।
26वीं पैदल सेना टुकड़ी जो कुछ समय से मुंबईं में थी, उसने विद्रोह की योजना बना दी।

पुलिस आयुक्त फोरजेट ने किसी प्रकार बिना पहचाने गए इस बैठक को देखा था। मुंबई के भारतीय फौजियों ने अक्टूबर 1857 को दीपावाली के त्यौहार पर ब्रितानियों के विरूद्ध विद्रोह करना निश्चित किया। परन्तु इसकी सुचना फोरजेन्ट को 26 सितम्बर को ही ज्ञात हो चूकी थी। क्रिया कलापों पर कड़ी निगरानी रखी गई। 12 अक्टूबर 1857 को प्रातः 9 बजे निम्नांकित व्यक्ति गिरफ्तार करके फोर्ट जार्ज की कोठरियां में डाल दिये गये।

सुबेदार गुलगर धोबी, पैदल सेना की टुकड़ी जमादर शेख रहिमन, नौ सेना की बटालियन कवायद हवलदार सैय्यद हुसैन और निजी श्रेणी के मंगल 10वीं पैदल सैनिक टुकड़ी 31 अक्टूबर को सैय्यद हुसैन और मंगल पर फौजी अदालत में अभियोग चला। 15 अक्टूबर 1857 को दिपावाली के दिनों में और विद्रोह प्रत्याशित दिनों में किया जाता था उसी दिन, दोनों राष्ट्रभक्त अपराधियों को तोप से उड़ा दिये जाने का निर्णय कर लिया गया।

उसी दिन दोपहर को फौजियों और दर्शकों की भीड़ के सामने ऐसप्लेनेड मैदान (जो आजकल आजाद मैदान कहलाता है) में उन्हें सार्वजनिक रूप से किले की सेना तथा दर्शकों के समक्ष दण्ड दे दिया गया।

सर डी. ई. वाच्छा, जो उस समय केवल एक स्कूली छात्र थे, उन्होंने अपनी आत्मकथात्मक रचना "मुम्बई रेत की सीपें" में इस घटना के बारे में इस प्रकार लिखा है।

"उस तीसरे पहर जैसे ही हम अपने 'एलफिन्सटन' विद्यालय, जो कि मैदान के दूसरी ओर स्थित था....से निकले वहां एक अपार कोलाहल का दृश्य उपस्थित हुआ। खुला मैदान पूरा कबायद क्षेत्र सेना से भरा पड़ा था। जंजीरों से जकड़े हुए दो विद्रोही दो तोपों से बाँधे गये थे, उन्हे तुरन्त उड़ा दिया जाना था। सांसों को साधे हुए हम उस स्थान के पास जहाँ तक पहुँच सकते थे दौड़कर गए जहाँ वे दोनों तोपों से जकड़े हुए थे। जहाँ तक मेरी स्मृति है, तोपों एस्प्लेनेड रोड की ओर रूख किये थीं और सफेद रोमन कैथालिक क्रॉस के सीध में थी, जो दूसरे मैदान, जिसे नौ सैनिक बटालियन का कबायद मैदान कहा जाता था, में था। भीड़ में से रास्ता बनाते हुए हम ऐसी जगह पहुँच गए जहाँ से हम बंदियों को भली भाँती देख सकते थे....। युरोपीय फौजों, पैदल तथा शस्त्राशस्त्र सेना ने स्थिति संभाल रखी थी। भारतीय पलटन उस वर्ग के भीतर घिरी थी। हमारी हृदय की धड़कने तीव्र हो रहीं थी। आदेशात्मक शब्दों के साथ तोपें दाग दी गई और बँधे हुए अपराधी उड़ा दिए गए। जले हुए माँस की बदबू हमारे नथुनों में भर गई। सब कुछ समाप्त हो गया (वही पृ. 79-80)

उसी दिन, 15 अक्टूबर को, जमादार शेख रहमान का अभियोग हुआ और उन्हेंे बरी कर दिया गया।

21 अक्टूबर को सूबेदार गुलगर धोबी का अभियोग प्रारम्भ हुआ और 22 को उन्हें फाँसी की सजा दी गई। बाद में उनकी सजा को घटाकर आजीवन समुद्र पार निष्कासन में बदल दिया गया। 24 अक्टूबर को हवलदार सूबा सिंह, का अभियोग हुआ और उन्हें आजीवन निष्कासन की सजा हुई। उसी पलटन के लक्ष्मण नाइक का अभियोग हुआ और उन्हें मृत्युदण्ड दिया गया जिसे बाद में घटाकर आजीवन समुद्र पार निष्कासन में परिवर्तित कर दिया गया।

बम्बई शहर और द्वीप के गजटिअर (मुंबई पुनः प्रकाशित 1978 पृष्ठ 157-160) के अनुसार कुल मिलाकर यह सभी व्यक्ति इस मामलें मे आजीवन सजा द्वारा निष्कासित किए गए। 10वीं पैदल सैनिक पलटन के कामता प्रसाद नाइक को पलटन से निकाल दिया गया और आगे जाँच के लिए उन्हें पुलिस को सौंप दिया गया। 31 अक्टूबर 1857 को 10वीं पैदल सैनिक पलटन के एक निजी श्रेणी के व्यक्ति का अभियोग प्रारम्भ हुआ, उसकी उपस्थिति में विद्रोह की भाषा का प्रयोग हुआ था, परन्तु उसने कमान्डिंग अफसर की संज्ञान में वह बात नहीं आई। उस दिन 31 अक्टूबर 1857 को भी 10वीं पैदल सैनिक पलटन के जो लोग अपराधी घोषित किये गए थे उनके अतिरिक्त दो सूबेदार, एक हवलदार, एक नाइक और सात निजी श्रेणी के व्यक्त्तियों के विषय में ज्ञात हुआ कि वे विद्रोह की योजना बना रहे थे लेकिन उन्हें अपराधी घोषित करने का कोई प्रमाण नहीं मिलता (बी. ए. पी. डी. खण्ड 30 वर्ष 1857 पृष्ठ 321-327 11वीं सैनिक पलटन के भी घोषित अपराधियों के अतिरिक्त एक सूबेदार एक हवलदार और एक नाइक विद्रोह की योजना बनाते हुए पाये गये।

प्रमुख नेता

सैय्यद हुसैन
यह मुंबई की सेना में हवलदार थे। यह जून-अक्टूबर 1857 विद्रोह में बम्बई फौज में नेता थे। 12 अक्टूबर 1857 को इन्हें गिरफ्तार किया गया व 13 फौजी अदालत में इन पर अभियोग चला बाद में 15 अक्टूबर को इन्हें मृत्युदण्ड दिया गया। उसी दिन ऐसप्लेनेड मैदान में किले की सेना और दर्शकों की उपस्थिति में इन्हें तोप से उड़ा दिया गया।

मंगल
पैदल सैनिक पल्टन निजी श्रेणी। मुंबई की फौज के विद्रोह का नेता, 12 अक्टूबर 1857 को गिरफ्तार 13 फौजी अदालत में अभियोग और 15 अक्टूबर को मृत्युदण्ड। उसी दिन उसे भी दोपहर बाद सैंय्यद हुसैन के साथ ही तोप से उड़ा दिया गया।

गुलगर धोबी

सैनिक पल्टन मुंबई स्थित 11वीं पैदल सैनिक पल्टन के सूबेदार विद्रोह की योजना में पूरी तरह संलिप्त हो गए। उन्हेंे मृत्यु दण्ड दिया गया जिसे बाद में घटाकर आजीवन समुद्रपार निष्कासन में परिवर्तित कर दिया गया।
अन्य विशेष व्यक्ति

जगन्नाथ शंकर सेठ-इन पर स्वतन्त्रता संग्राम के हितैषी होने का सन्देह था।
गंगा प्रसाद-विद्रोह योजना की गोपनीय बैठके उनके घर में होती थी।
कामत प्रसाद-यह 10वीं पैदल सैनिक पल्टन से निष्कासित तथा पुलिस को सौंप दिए गए।
शेख रहमान-यह सामुद्रिक पल्टन में जमादार थे -अभियोग के पश्चात इन्हें बरी किया गया।
सूबा सिंह-यह 10वीं पैदल सैनिक पल्टन में थे,इन्हें आजीवन निष्कासन की सजा मिली।
लक्ष्मण-यह 10वीं पैदल सैनिक पल्टन में थे इन्हें आजन्म निष्कासन की सजा मिली।
गणेश बाबाजी बापट पंडित-यह 10वीं पैदल सैनिक पल्टन में थे।
लक्खू खेरकर-यह 10वीं पैदल सैनिक पलटन में जमादार थे।
गोपाल जाधव--यह 10वीं पैदल सैनिक पल्टन में सिपाही थे।

शहीद

सैय्यद हुसैन- इन्हें 15-1-1857 को बम्बई के एस्पलेनेड मैदान में तोप से उड़ा दिया गया।
मंगल -15-1-1857 को बम्बई के एस्पलेनेड मैदान में तोप से उड़ा दिये गए।
2 भारतीय सिपाही - यह पुलिस सह-आयुक्त फारजेट की यूरोपियन पुलिस मुठभेड़ में मारे गए सितम्बर 1857 में।

बन्दी (आजीवन समुद्र पार निष्कासन हेतु)

गुलबर धोबी ( 21-10-1857 को इनका मृत्यु दण्ड सजा घटाकर आजन्म निष्कासन दिया गया।)
सूबसिंह (24-10-1850 को दण्डित।)
लक्ष्मण ठाकुर- (24-10-1857 को मृत्यु दण्ड- सजा घटाकर निष्कासन)

इनके अतिरिक्त 3 बम्बई स्थित पलटनों और सामुद्रिक बटालियन के लोग (कुल छह लोगों को निष्कासन का दण्ड मिला था-उनमें से तीन की पुष्टि होनी शेष थी।)

नाम

थानाजेलभेजेजानेकीतारीख

शेखलालमुहम्मद

11-8-1857

अमीरसूबेदारआगा

16-12-1857

विठूपूत्रअपामेगत

2-1-1858

मोतीसिंहमेखानसिंह

2-1-1858

कामताप्रसादहरिलाल

2-1-1858

लक्ष्मणघेजेद

2-1-1858

गणेशप्रसाद

2-1-1858

शिवलालचोपसिंह

2-1-1858

किशनदयालतिवारी

2-1-1858

रामचरण (पहले 15वीं पैदल सैनिक पल्टन में थे।)
खुशाल अहीर (पहले 10वीं पैदल सैनिक पल्टन में थे।)

33 फौज के बन्दियों की सूची जो बम्बई के पुलिस से 11-16-11858 को प्राप्त हुई ओर उन्हें थाना जेल में निरूद्ध किया गया। (थाना 22 जुलाई 1858)

महादेवसिंह, गुमानसिंह

हवालदार

शालिग्रामसिंह, उदेराम,

हवालदार

राजाराममस्तीसुकुन

हवालदार

असारीपुत्रअरनुजी

हवालदार

शिवनरायनरामगुलाल

नाइक

चेगाकेसरी

नाईक

संगापासीपुत्रधर्मी

निजीश्रेणीका

बागुजपासीपुत्रमाठू

निजीश्रेणीका

भोलापासीपुत्रपाचू

निजीश्रेणीका

जमनासिंहबिम्सागोपाल

निजीश्रेणीका

सिवप्रसादआधार

निजीश्रेणीका

सालिगरामतिवारीपुत्रडेहरातिवारी

निजीश्रेणीका

शिवरामसुकुलपुत्रलज्जासुकल

निजीश्रेणीका

रामप्रसादतिवारी

निजीश्रेणीका

टंकूगिरधारियागुलाम

निजीश्रेणीका

मोहनलालकायन्त

निजीश्रेणीका

दीनदयालतिवारी

निजीश्रेणीका

हाकिमअहीर

निजीश्रेणीका

बुदियाअहीर

निजीश्रेणीका

लालासुकुर

निजीश्रेणीका

मातादीनकुरी

निजीश्रेणीका

शिवलिंगसुकुल

निजीश्रेणीका

सुमनअहीर

निजीश्रेणीका

सीतलकुन्ची

निजीश्रेणीका

रेवतीअहीर

निजीश्रेणीका

भागूसिंहछत्तासिंह

निजीश्रेणीका

औदीदीनकुन्बी

निजीश्रेणीका

अवतारतिवारी

निजीश्रेणीका

आनन्दरामतिवारी

निजीश्रेणीका

शिवचरणधोबी

निजीश्रेणीका

मुन्नामिसिर

निजीश्रेणीका

बन्दातेली

निजीश्रेणीका

रामसुचितमिसिर

निजीश्रेणीका

स्रोत
मुंबई पुरालेख अभिलेखागार पी. डी. ग्रन्थ
1857 : खण्ड 13 पृष्ठ 7-9, 11-13, 35-37, 47-48
       खण्ड 27 पृष्ठ 277
       खण्ड 28 पृष्ठ 333
       खण्ड 30 पृ. 321-327
       खण्ड 31 पृ. 277-279
1858 : खण्ड 20 पृ. 577-581
       खण्ड 32 पृ. 369-372
मुंबई शहर और द्वीप का गजयिटर
(मूल पुनर्रप्रकाशनः मूलतः मुंबई में मुद्रित 1909)
खण्ड 2 (मुंबई 1978 पृ. 157-160)
(मुंबई गजरियर पृ. 25 दिसम्बर 1907 से उद्धत)
एस. एम. एच. एफ. एम. आई. खण्ड प्रथम पृष्ठ 268, 292-296)
डी. ई. वाच्छा शैल्य फ्राम सैण्ड आफ बाम्बे पृष्ठ 79-80)

बीड में विप्लव की योजन

मार्च-जून
1859 : मार्च, राजा सातारा और नाना साहेब पेशवा के नाम पर ब्रिटिश विरोधी बगावत बीड़ में खड़ी करने की योजना।

बीड़ (भीर) में 1859 के प्रारम्भ से ही सातारा के राजा के नाम से, अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह की योजनाएँ बन रहीं थी। बड़ीं संख्या में महत्त्वपूर्ण व्यक्ति और क्रान्तिकारी इन योजनाओं की संरचना में लिप्त थे। 25 जून 1859 के 'दी इंग्लिश मैन' ने 8 जून 1859 की हैदराबाद की खबर के अन्तर्गत लिखा "हमें इतनी अधिक संख्या में षड्यंत्रकारी और विद्रोही मिलेंगे कि हमें मजबूर होकर इस अपराध की ओर से आँखे मूँद लेना ही आवश्यक प्रतीत होगा। परन्तु प्रारम्भिक उपाय के रूप में कुछ नामी और महत्त्वपूर्ण व्यक्यितों कीे सजा में कमी नहीं छोड़ी जाएगी "देशमुखो, देश पाण्डयों राजपूत रोहिल्ले प्रमुखों, एक जिलाधीश के पुत्र और इस प्रकार के अन्य भागीदार बीड़  ब्रिटिश विरोधी योजनाओं में थे।

बाबा साहब, जो बालाजी गोसावी या सेनापति के नाम से भी जाने जाते थे, अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह की योजनाएँ बनाने और विभिन्न महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सहायता तथा उन्हें कार्यान्वित करने के उद्देश्य से बीड़ में आकर रहने लगे। तात्या मुदगल, उनकी सहायता करते हुए फौजे जुटाने में लग गए। शंकर आत्माराम को 150 सैनिक भर्ती करने थे। उन्होंने एक मन गोलाबारूद और सात सेर सीसा एकत्र कर लिया जो युद्ध की तैयारी का ही भाग था। सिपाही के लिए रू. 15 प्रति माह और जमादार के लिए रू. 30 प्रतिमाह के वेतन तय किए गए। सम्बन्धित व्यक्तियों को शंकर आत्माराम ने बताया था कि वह बाजीराव अर्थात् नाना साहब पेशवा की सेवा में है और उन्हीं की ओर से सैन्यबल एकत्रित कर रहे है। दाजी कुलकर्णी निवासी (कई अभिलेखों में उन्हें दाजी खंडाला वाला बताया गया है) और रामन राव विट्ठल भी सैनिक इकट्ठे करने में लगे थे, सैय्यद चाँद के पास रंगरूटों को सेना के लिए सूची बद्ध करने का कार्य था।

सैनिकों की भर्ती के लिए कुछ राजपूतों और उनके बाजोरी नामक मुखिया से सम्पर्क साधा गया था। इस सम्बन्ध में सूल खान रोहिल्ला से भी भेंट की गई थी। गुलाम नवी उर्फ पापमियाँ बीड के जिलाधिश के पुत्र मुस्तफा खान भी इस कार्य में लिप्त थे।

देवराव किसान, वामनराव किसान और विट्ठल उर्फ आबाजी, बीड़ के देशमुख श्रीनिवास शंकारराव देश पाण्डे, बाबा पुराणिक ने भी विद्रोह की योजना बनाने में भागीदारी दी थी। जब योजनाएँ बन ही रहीं थी प्रशासन ने कुछ व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया, उनमें थे- हरिजय राम, जानू शंकर भाऊ, पापामिंया डोडी आदि, बालाघाट ताल्लुके के सनद गाँव (बड़ा) (मन्जरसां) में सेना एकत्रित की गई थी।

जिस न्यायालय ने जाँच पड़ताल की उसके अनुसार, धनाभाव के कारण योजनाएँ असफल हो गई। मोहम्मद करमत अली की न्यायालय बीड़ में निम्नांकित व्यक्तियों पर शासन के विरूद्ध युद्ध के आरोप में अभियोग चला-

नारायण राव, बीड तालुकेदार रामराव के सेवक,
शंकर आत्माराम
सैयद चाँद
सैयद रसूल खान रूहिल्ला
गुलाम नबी उर्फ पापमिया
वामनराव विठल
त्र्यम्वकराव उर्फ दाजी खरडेकर
छोटू बारिक
लाल सिंह
हार्द जयराम
जानू अजीमुद्दीन मोमिन
श्रीनिवास शंकर राव
विट्ठलराव उर्फ अम्बाजी
माधवसव किसान
वामन राव किसान
गणू आत्माराम और
एकनाथ गोविन्द

ब्रिटिश प्रतिनिधि हैदराबाद के पत्र दिनाँक 30 मई 1859, जिसमें जाँच पड़ताल का सारांश दिया गया था, उसके हवाले से कार्यवाही प्रारम्भ की गई। न्यायालय के निर्णय के अनुसार मुख्य षड्यन्त्रकारी यथा शंकर आत्माराम, तात्या मुदगल बालाजी गोसावी और दाजी खरेडकर ने सैनिक एकत्रित करने और खारडा की गद्दी पर अधिकार करने से प्रारम्भ करके सरकार के विरूद्ध युद्ध छेडने का षड्यन्त्र किया। उन लोगों ने सैयद चाँद को भी अपने षड्यन्त्र में सम्मिलित कर लिया, और उन्हेंे सेना के लिए जवान भर्ती करने और उनको भुगतान करने का काम सौंपा। बाजुरी शिलेदार और राठौड भी इस कार्य में संलिप्त थे। गोलाबारूद आदि तैयार करने के लिए पैसे का भुगतान वैयंकन भट्ट के माध्यम से होता था, जो ज्योतिषी थे। गुलाम नवीं उर्फ पापमियाँ को भी उन लोगों ने अपने कार्य में सम्मिलित कर लिया था।

न्यायालय ने आदेश दिया कि शंकर आत्माराम, दाजी खरडेकर और सैयद चाँक को जंजीरों में जकड़कर सात वर्ष का सश्रम कारावास की सजा हो। वामन राव विठ्ठल, लाल सिंह और छोटे वाटिक शंकर आत्माराम के साथ षड्यन्त्र में शामिल थे किन्तु उन्होंने प्रशासन को इसकी कोई सूचना नहीं दी, इसलिए उनको दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा (जंजीरों सहित) दी गई। माधवराव किसान, वामन राव उर्फ अम्बाजी देशमुख, हरी जयराम, जानू अजीमुद्दीन, गजू आत्माराम और नारायण राव के विषय में यह सिद्ध नहीं हो सका कि वे षड्यन्त्र में सम्मिलित थे अतः उनको स्वतन्त्र कर दिया जाय। गुलाब नवी उर्फ पापामियां के प्रशासन को षड्यन्त्र के विषय में सूचित नहीं किया अतः उन्हें एक वर्ष के सश्रम कारावास की सजा हुई। सैयद रसूल के विरूद्ध भी कोई प्रमाण नहीं था कि उन्होंने षड्यन्त्र में भाग लिया था, परन्तु न्यायालय ने उन्हेंे मुक्त करना उचित नहीं समझा।

अपराधी बीड में 8 मार्च 1859 को गिरफ्तार किये गए थे। न्यायालय ने निर्णय 16 अरबी उल अब्बाल 1276 हिजरी तद्नुसार 14 अक्टूबर 1859 ई. को सुनाया जिसके अनुसार सजाएँ गिरफ्तारी की तारीख से लागू होनी थी, अर्थात् 8 मार्च 1859 बीड़ में विद्रोह को प्रेरित करने और संचालन करने वाले तात्या मुद्गल और बालाजी गोसावी कदाचित इस समय तक पकड़े नहीं जा सके थे परन्तु बाद में बन्दी बनाये गए। जून 1859 में बीड़ में ये व्यक्ति गिरफ्तार किए गए और उन्हें सजाएँ दी गई लेकिन कुछ नेता बच निकले।

इस सन्दर्भ में नारायण विट्ठल भोकरें उर्फ नानाबुवा का नाम भी उल्लेखनीय है। वह सातारा के राजा यशवन्त राव के कार्यकर्ता थे। ऐसा समझा जाता था कि वह पैठण में रह कर सातारा के राजा की ओर से सेना एकत्रित करते थे ताकि अंग्रेजो से टक्कर ली जा सके। उनकी गिरफ्तारी के लिए बड़ी खोजबीन के बावजूद प्रशासन उन्हें पकड़ने में असफल रहा।

प्रमुख नेता       

नाना साहब उर्फ बालाजी गोसावी
सातारा के राजा जिन्हें अंग्रेजों ने सत्ता से हटा दिया था उनकी ओर से बीड़ के क्षेत्र में विद्रोह की योजनाओं को गति देने में बाला साहब का योगदान सबसे अधिक था। वह गोसावी (साधू) बन गए थे अतः उनको बालाजी गोसावी कहते थे। अपने कार्य के सम्पादन हेतु वह बीड़ में तात्या मुदगल के घर में रहते थे।

तात्या मुदगल
बीड़ के निवासी, बालाजी गोसावी के निर्देशन में कार्य करते थे; अंग्रेंजों से युद्ध करने के लिए इन्होंने सेना और धन एकत्रित करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने मकान को रू. 2000 में एकनाथ गोविन्द के पास गिरवी रख दिया और उसी धन से रसूल खाँ रोहिल्ला और बजोरी राजपूत तथा अन्य की सहायता लेकर फौजें जमा करने का प्रयत्न किया।

शंकर आत्माराम
ब्राह्मण, बीड़ शहर के एक भाग रोंडीपुरा के निवासी; सेना और गोला बारूद जमा किया, स्वयं को नाना साहब पेशवा का सेवक बताते थे। इन्हेंे बाद में सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा हुई।

अन्य उल्लेखनीय व्यक्ति
देवराज किशन, देशमुख
वामन राव किशन, देशमुख
माधव राव किसान, देशमुख
विट्ठल राव उर्फ अम्बाजी, देशमुख
श्री निवास शंकर राव, देशमुख
गुलाम नवी उर्फ पापमियां
(बीड़ में कलक्टर हाफिज गुलाम मुस्तफा के पुत्र)
सैय्यद चाँद
वामन राव विट्ठल
बाजोरी राजूपत
सैय्यद रसूल खाँ रोहिल्ला
हरी जयराम
बाब पुराणिक
अब्दुल चावस (पोवरा निवासी)
मिर्जा (बदलपुर निवासी)
सत्तम (टमटम वाला)
बालू
जानू अजीमुद्दीन
शंकर भाऊ
छोट बारिक
डोंडी
शेख चाँद, पुत्र शेख यासीन
(खरडा निवासी, शंकर आत्माराव की सेना का पैदल सैनिक)
नारायण विट्ठल भोंकरे (पैठान का)

बन्दी
बीड़ के न्यायालय के द्वारा 14 अक्टूबर 1859 को निम्नांकित सजाएँ दी गई;
सात वर्ष का सश्रम कारावास
शंकर आत्माराम                     दाजो खरडेकर
सैय्यद चाँद
दो वर्ष का सश्रम कारावास
वामन राव विट्ठल,
लाल सिंह                          छोटू बारिक
एक वर्ष का सश्रम कारावास
गुलामनवी उर्फ पापामियाँ

स्त्रोत
हैदराबाद, पत्रावली संख्या 24 दिनांक 30 नवम्बर 1859 मुंबई पुरालेख अभिलेखागार पी. डी. खण्ड 59 वर्ष 1859 घ्द्वितीयङ पृष्ठ 197-220
इग्लिश मैन, 25-6-1859
हैदरबाद अफेयर्स खण्ड 3 पृष्ठ 234 नीचे पंक्ति में एफ. एस. एच. खण्ड
2 पृष्ठ 190-192
एस. एफ. एच. एफ. आई. खण्ड प्रथम पृष्ठ 332-335

ml;न्दी)
विठू बापू पवार                                          (थाना जेल में बन्दी)
अलीखान मोहिउद्दीन खान                            (थाना जेल में बन्दी)
आर्यनसिंह बख्तसिंह                                   (थाना जेल में बन्दी)
शेखरलाल शेख करीम                                (थाना जेल में बन्दी)

बाल किश धामिलाल                                   (थाना जेल में बन्दी)

कादूरखान फत्तू                                        (थाना जेल में बन्दी)
डोंडी मोहने                                            (थाना जेल में बन्दी)
अम्रता लक्ष्मण                                           (थाना जेल में बन्दी)
बापू दौलतराव                                          (थाना जेल में बन्दी)
सत्व गंगा                                               (थाना जेल में बन्दी)
पाण्डु निलकण्टराव                                    (थाना जेल में बन्दी)
म्हादू हन्मन्ता                                           (थाना जेल में बन्दी)

 स्त्रोत:
मुंबई, पुरालेख, अभिलेखागार पी. डी. खण्ड :
1858 : खण्ड 20 पृष्ठ 381-387
खण्ड 21, 65-59, 447-470
एच. बी. बोरवेल के द्वारा 4-1-1858 को 'पेठ विद्रोह पर रिपोर्ट'
खण्ड 24 पृष्ठ 227-229
खण्ड 23 पृष्ठ 392-409
खण्ड 36 पृष्ठ 70-73
मुंबई प्रशासन की रिपोर्ट वर्ष 1857-58 पृष्ठ 119-162
मुंबई जिला गजटिअर खण्ड 16 नासिक (मुंबई 1883)
नासिक जिला गजट (मुंबई 1975) पृ... 138-147
एस. एम. एच. एम. आई. खण्ड प्रथम पृष्ठ 335-338

 
क्रांति १८५७

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ज्ञान गंगा ऑनलाइन
उदयपुर मित्र मण्डल, डा. सुरेन्द्र सिंह पोखरणा, बी-71 पृथ्वी टावर, जोधपुर चार रास्ता, अहमदाबाद-380015,
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इतिहास अध्यापक मण्डल, गुजरात

 

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